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Tuesday, 29 May 2012

"उच्चारण" पर हाय, पड़े गर्दन पर फंदा-


"महँगाई-छः दोहे" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')



मुंह की और मसूर की, लाल लाल सी दाल |
डाल-डाल पर बैठकर, खाते रहे दलाल |

खाते रहे दलाल, खाल खिंचवाया करते |
निर्धन श्रमिक किसान, मौत दूजे की मरते |

"उच्चारण" पर हाय, पड़े गर्दन पर फंदा |
सिसक सिसक मर जाय, आज का सच्चा बंदा ||



तभी पढ़ें जब आपके पास प्रमाण-पत्र हो !



चना अकेला चल पड़ा, खड़ा बीच बाजार |
ताल ठोकता गर्व से, जो फोड़ा सौ भार |


जो फोड़ा सौ भार, लगे यह लेकिन सच ना |
किन्तु रहे हुशियार, जरा घूँघट से बचना |


केवल मुंह को ढांप, निपटती प्रात: बेला |
सरे-शाम मैदान, सौंचता चना अकेला ||





घूँघट बुर्का डाल के, बैठ चौक पर जाय |
टिकट ख़रीदे क्लास जो, वो ही दर्शन पाय |

वो ही दर्शन पाय, आपकी  मेहरबानी  |
रविकर सा नाचीज, ढूँढिये बेहतर जानी |



सज्जन का क्या काम, निमंत्रित कर ले मुंह-फट |
दो सौ डालर डाल, उठा देंगे वे घूँघट ||

हुलकी आवैं !!


हुलकी जिसे कहते हैं ...!




हुलकी जैसे शब्द के, भारी भारी अर्थ |
प्रान्तों का कर के भ्रमण, पहुँच गए हम पर्थ |

पहुँच गए हम पर्थ, अर्थ जो रविकर भाये |
ताक-झाँक में मस्त, नजर कुछ सुन्दर आए |

लेख लगे गंभीर,चुटकियाँ हल्की-फुलकी |
चले अली के तीर, कभी ना आवैं हुलकी ||

Sunday, 27 May 2012

पड़ी जलानी आग, गणेशा ताप रहा है

गंग-चन्द्र तन भस्म है, गले में डाला नाग |

गले में डाला नाग, हुए कैलाश निवासी |
मना रहे आनंद,बने है घट घट वासी |

पर शंकर परिवार, ठंड से कांप रहा है |
पड़ी जलानी आग, गणेशा ताप रहा है || 

              

आए तुम याद मुझे --जिंदगी के ३६ साल बाद --







महत्वपूर्ण है जिंदगी, घर के दर-दीवार |
छत्तीस से विछुड़े मगर, अब तिरसठ सट प्यार |


अब तिरसठ सट प्यार, शिला पर लिखी कहानी |
वह खिडकी संसार,दिखाए डगर जवानी |


आठ साल की ज्येष्ठ, मगर पहला था चक्कर |
चल नाले में डाल, सुझाता है यह रविकर ||

Thursday, 24 May 2012

भगवन गर नाराज, पड़े डाक्टर के द्वारे-

हास्यफुहार

तुम रूठा न करो मेरी जान निकल जाएगी

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बड़ा मस्त अंदाज है, सीधी साधी बात |
अट्ठाहास यह मुक्त है, मुफ्त मिली सौगात |

मुफ्त मिली सौगात, डाक्टर हों या भगवन |
करिए मत नाराज, कभी दोनों को श्रीमन |

भगवन गर नाराज, पड़े डाक्टर के द्वारे |

डाक्टर गर नाराज, हुए भगवन के प्यारे||

दिवस्पति की दिल्लगी से- झूम झूरे झेर झूरे-

लोमड़ी के दिवस पूरे !


लोमड़ी के दिवस पूरे-
पड़े-घूरे, उसे घूरें ||
रात बाकी-दिवस पूरे |
सदा थू-रे, बदा थूरे ||


घूर के भी दिन बहूरे-
लट्ठ हूरे, नग्न-हूरें ||
आँख सेकें, भद्र छोरे |
नहीं छू-रे, चलें छूरें ||


मस्त हैं अंगूर लेकिन
खले तू-रे, नहीं तूरे ||
दिवस्पति की दिल्लगी से-
झूम झूरे झेर झूरे ||

Wednesday, 23 May 2012

लपटें उठती उद्ध, जला पेट्रोल छिड़ककर-

पलायमान ब्लॉगर्स

  ZEAL

कक्षा में डांटे गए,  डटे रहे डग खूब |
पक्षपात शिक्षक करे, जात-पांत में डूब |

जात-पांत में डूब, ऊबते लेकिन सारे  |
करूँ टेंथ में टॉप, प्रभू संकल्प सहारे |

छोड़ बढ़ो नैराश्य,  यही रविकर की इच्छा  |
जीवन का संघर्ष, हमेशा बेढब कक्षा |।

टैकल पेट्रोल हाइक मक्खन स्टाइल...खुशदीप

Khushdeep Sehgal

मोहन माखन खा गए, मोहन पीते दुग्ध ।
आग लगा मोहन गए, लपटें उठती उद्ध ।

लपटें उठती उद्ध, जला पेट्रोल छिड़ककर ।
होती जनता क्रुद्ध, उखाड़ेगी क्या रविकर ।

बड़े कमीशन-खोर, चोर को हलुवा सोहन ।
दाढ़ी बैठ खुजाय, अर्थ का शास्त्री मोहन ।। 

दाढ़ी बैठ खुजाय, अर्थ का शास्त्री मोहन-

टैकल पेट्रोल हाइक मक्खन स्टाइल...खुशदीप

Khushdeep Sehgal

मोहन माखन खा गए, मोहन पीते दुग्ध ।
आग लगा मोहन गए, लपटें उठती उद्ध ।

लपटें उठती उद्ध, जला पेट्रोल छिड़ककर ।
होती जनता क्रुद्ध, उखाड़ेगी क्या रविकर ।

बड़े कमीशन-खोर, चोर को हलुवा सोहन ।
दाढ़ी बैठ खुजाय, अर्थ का शास्त्री मोहन ।। 

नहीं पांचवा साथ, सदा पूंजी-पति राक्षस

"शिव का डमरू बन जाऊँगा" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')



 शीर्ष कैबिनेट ब्रह्म का, पञ्च मुखी हैं माथ ।
चार देवता पक्ष के, नहीं पांचवा साथ ।

नहीं पांचवा साथ, सदा पूंजी-पति राक्षस ।
देता टांग अड़ाय, होय अच्छा बिल वापस ।

शंकर से फिर बोल, छुडाओ मारक राकेट ।
कटे गधे का शीश, ठीक हो शीर्ष कैबिनेट ।।

खुद को बांधा है शब्‍दों के दायरे में - - संजय भास्कर

संजय भास्कर at आदत...मुस्कुराने की


बड़ा कठिन यह काम है , फिर भी साधूवाद |
करे जो अपना आकलन , वही बड़ा उस्ताद |

वही बड़ा उस्ताद, दाद देता है रविकर |
रच ले तू विंदास, कुशल से चले सफ़र पर |

मात-पिता आशीष, आपकी सुधी कामना |
हो जावे परिपूर्ण, सत्य का करो सामना ||


 "उल्लूक टाईम्स "


डाला सेल या दिल दिया, बीच घडी के डाल |
टाइम से आकर करे, इकदम नया बवाल |

इकदम नया बवाल, पती सब खेले खाए |
पा पत्नी से काम, काम में मगन सिधाए |

रविकर नेक सलाह, डाल जा हेरिसन-ताला |
कर ले यार विवाह, साज के भेजो डाला ||


अन्‍नाबाबा बोल गए


अन्ना बाबा बोलते, हुए धरा से गोल |
पैग सिद्ध अंतिम हुआ, क्या षड्यंत्री रोल |

क्या षड्यंत्री रोल, बरस सौ उनको जीना |
टैक्स दिया न टोल, छोड़ क्यूँ गए काबीना |

अब अंतिम सन्देश, सुनाते लास्ट तमन्ना |
परिकल्पना में फर्स्ट, जरा रुक जाते अन्ना ||


भाभियाँ

Anita at मन पाए विश्राम जहाँ

भाभी माँ के हाथ की, पूरी साग अचार |
स्नेहसिक्त पा भोग को, खाय मार चटकार |

खाय मार चटकार, बड़ी बढ़िया है भाभी |
बनी मूल आधार, सभी भैया की चाभी |

मइके का यह प्रेम, पाइए हरदम जाके |
माँ का स्वास्थ्य शिथिल, जाइए भाभी माँ के ||


मेरा मन

sangita at panchnama  
 

मनहर यह रचना लगी, इच्छा बोध विचार |
सहे वेदना मन सभी, बढ़िया ये उदगार |


बढ़िया ये उदगार, बोझ मन भर मन धरते |
यह जीवन संसार, कभी न पार उतरते |


उत्सव का एहसास, कराये हरदम रविकर |
मन ही सच्चा दोस्त, भरोसा मन का मनहर || 


"गॄहकाज"

निवेदिता श्रीवास्तव at संकलन
मन्त्र-मुग्ध पढता गया, शब्द-अब्द नि:शब्द |
काम घरेलू छोड़ दो, गिरा गिरा मन गद्द |


गिरा गिरा मन गद्द , भला सुनने में लागे |
लेकिन पति श्री पन्त, काम जब बाकी आगे |


कैसे कोई नार, करे सपनों में विचरण |
ख़तम करूंगी काम, काम का देखूं दर्पण || 

Tuesday, 22 May 2012

ढूँढ़ सके अस्तित्व, बिता के दस दिन छुट्टी-

चल मन ....लौट चलें अपने गाँव .....!!

छुट्टी का हक़ है सखी, चौबिस घंटा काम |
बच्चे पती बुजुर्ग की, सेवा में हो शाम |

सेवा में हो शाम, नहीं सी. एल. ना इ. एल. |
जब केवल सिक लीव,  जाय ना जीवन जीयल |

रविकर मइके जाय, पिए जो माँ की घुट्टी |
ढूँढ़ सके अस्तित्व, बिता के दस दिन छुट्टी ||



हँसना तो बनता है !!

वाणी गीत at गीत मेरे

मूंगफली भरपेट खा, मुफ्तखोर की खीज |
खांसी जकड़ी गले को, बड़ी बुरी यह चीज |
बुरा लगे भाई |

चापे गुड़ की रेवड़ी, चारबाग़ में बैठ |
बाढ़े गर मधुमेह तो, जाए मुझसे ऐंठ |
मेरी क्या खता ?


पानी का इतिहास

  न दैन्यं न पलायनम् 
पानी की तरह धन बहाना, ना चलेगा यह बहाना |
धन की तरह पानी बहाना, आया यही अब ज़माना  ||

पानी के बुलबुले सा मिटे, चाहता है क्या नादान-
बंद कर सूखे में डूब के, पानी में आग लगाना || 



Roshi: देखा आज एक पूर्ण पल्लवित पलाश का एक वृक्ष अपने पूर...

  Roshi 

मनभावन यह सीनरी,  देख सीन री  देख |
नख शिख तक सज्जा किये, प्रेम मयी आलेख |

प्रेम मयी आलेख, बुलाया भी प्रेयसी को |
लेकिन तूफाँ-शेख, रिझाए वह बहशी को |

पेट्रो-डालर थाम, छोड़ कर प्यारा सावन |
चुका प्रेम का दाम, गई दे गम-मनभावन ||

यह किसी मुहावरे का वाक्य प्रयोग नहीं है प्रिय

sidheshwer at कर्मनाशा -  
 

लगा आलता पैर में, बना महावर लाख |
मार आलथी पालथी, सेंके आशिक आँख |


सेंके आशिक आँख, पाख पूरा यह बीता |
शादी की यह भीड़, पाय ना सका सुबीता |


बिगड़े हैं  हालात, प्रिये पद-चाप सालता |
आओ फिर चुपचाप, तनिक दूँ लगा आलता ||


"उल्लूक टाईम्स "
http://ulooktimes.blogspot.in/2012/05/blog-post_22.html
 चप्पल चोरी हो गई, इसीलिए कुछ देर |
शाम का भूला आ गया, होते तनिक सवेर |

होते तनिक सवेर, बड़ी  चिंता चप्पल की |
होय सर्जरी हर्ट, हास्य की देके झलकी |

जाए अन्दर जूझ, गया दर्शन समझा के |
है पूरा विश्वास, पहनना चप्पल आके ||

छी छी छी हालात, काट के बोटी-बोटी-

भ्रूण जीवी स्वान


मुंडे डाक्टर मारता, गर्भ-स्थिति नव जात |
कुक्कुर को देवे खिला, छी छी छी हालात |

छी छी छी हालात, काट के बोटी-बोटी |
मारो सौ सौ लात, भूत की छीन लंगोटी |

करिहै का कानून, अभी जब कातिल गुंडे |
रहम याचिका थाम, पाक ले छूटे मुंडे || 

जुड़े लोकहित आय, एकजुट रहिये ब्लॉगर-



ब्लॉगर भी बँटने लगे, भैया क्या इस बार |
बाँट-बूट के पॉलटिक्स, जैसा  बंटाधार |

जैसा  बंटाधार, बदलिए रविकर फितरत |
बँटते रहे सदैव, होइए अभिमत सम्मत |

होवे जड़ चैतन्य, पहल रचनात्मक सादर |
जुड़े लोकहित आय, एकजुट रहिये ब्लॉगर ||



लेखकीय स्वाभिमान के निहितार्थ


दम्भी ज्ञानी हर सके, साधुवेश में नार |
नीति नियम ना सुन सके, झटक लात दे मार |

झटक लात दे मार, चाहता लल्लो-चप्पो |
झूठी शान दिखाय, रखे नित हाई टम्पो |

जाने ना पुरुषार्थ, करे पर बात सयानी |
नहीं शमन अभिमान, करे ये दम्भी-ज्ञानी ||

भ्रूण जीवी स्वान

veerubhai at कबीरा खडा़ बाज़ार में 
 
मुंडे डाक्टर मारता, गर्भ-स्थिति नव जात |
कुक्कुर को देवे खिला, छी छी छी हालात |

छी छी छी हालात, काट के बोटी-बोटी |
मारो सौ सौ लात, भूत की छीन लंगोटी |

करिहै का कानून, अभी जब कातिल गुंडे |
रहम याचिका थाम, पाक ले छूटे मुंडे ||


Monday, 21 May 2012

माली बनकर छले, खले मालिक मदमाता-

मतदाता , मालिक या माली ?

S.N SHUKLA at काल चिंतन
मतदाता दाता नहीं, केवल एक प्रपंच |
एक दिवस के वास्ते, मस्का मारे मंच |

मस्का मारे मंच, महा-मुश्किल में *मालू |
इसका क्या विश्वास, बिना जड़ का अति-चालू |


माली बनकर छले, खले मालिक मदमाता |
मालू जाय सुखाय, मिटे मर मर मतदाता ||
*लता

करे शमन अभिमान, नहीं ये दम्भी-ज्ञानी-

लेखकीय स्वाभिमान के निहितार्थ



(1)

दम्भी ज्ञानी हर सके, साधुवेश में नार |
नीति नियम ना सुन सके, झटक लात दे मार |

झटक लात दे मार, चाहता लल्लो-चप्पो |
झूठी शान दिखाय, रखे नित हाई टम्पो |

जाने ना पुरुषार्थ, करे पर बात सयानी |
नहीं शमन अभिमान, करे ये दम्भी-ज्ञानी ||

(2)
एम् टेक एड्मिसन लई, अरुण निगम सह पूत |
मेजबान मेरे बने, पाया स्नेह अकूत |

पाया स्नेह अकूत, बिदाई  हुई आज है |
था पहला कर्तव्य, हुआ संपन्न काज है |

रविकर है निश्चिन्त, करेगा नियमित दर्शन |
सादर सुज्ञ प्रणाम, करूं टिप्पण का सृजन || 


Sunday, 20 May 2012

कृष्णा छलिया श्रेष्ठ, भजूँ वो लगे मनोरम -


चिर प्रतीक्षित रह गया एकांत

ऋता शेखर मधु at मधुर गुंजन

लगे मनोरम अति-प्रिये, खिन्न मनस्थिति शांत |
रमे *कांत-एकांत में, अब भावे ना **कांत |


अब भावे ना कांत, ***कांती-कष्ट-कांदना |
छोड़ चलूं यह प्रांत, करूँगी कृष्ण-साधना |


मन में रही ना भ्रांत, छला जो तुमने हरदम  |
कृष्णा छलिया श्रेष्ठ, भजूँ वो लगे मनोरम ||
*मनोरम
**पति
***बिच्छू का दंश


धन्य-धन्य भाग्य तेरे यदुरानी ,तुझको मेरा शत-शत नमन



यदुरानी तू धन्य है, धन्य हुआ गोपाल ।
दही-मथानी से रही, माखन प्रेम निकाल ।

माखन प्रेम निकाल, खाय के गया सकाले ।
ग्वालिन खड़ी निढाल, श्याम माखन जब खाले ।

जकड कृष्ण को लाय, पड़े  दो दही मथानी ।
बस नितम्ब सहलाय, हँसे गोपी यदुरानी ।।

"चोरवा विवाह और मास्टर"

शनै: शनै: शनीचरा, गुरुवर हुआ  समाप्त |
मासिक वेतन पा रहे, अभी रईसी व्याप्त |

अभी रईसी व्याप्त, पकडुआ व्याह रचाए |
पाया नहीं दहेज़, किन्तु किडनेप हो जाए |

दो रविकर दस लाख, शुरू टीचर की बारी
किस्मत जाए जाग, बढ़ा  रूतबा संसारी  ||
 


प्रिये प्राण पर पाय, प्राण-प्रिय बुरी गती की-

"वट सावित्री"


श्रीमती की बात से , बाढ़े मन अनुराग |
वट-सावित्री की कथा, बाग़-बाग़ बड़-भाग |

बाग़-बाग़ बड़-भाग, छुडा कब्जे से यम के |
सावित्री का तेज, माँग में दुति-सम दमके |


प्रिये प्राण पर पाय, प्राण-प्रिय बुरी गती की |
मुट्ठी रखे दबोच, भयंकर श्रीमती की ||

Saturday, 19 May 2012

अरुण निगम जी साथ हैं, पुत्र भी आया साथ -

दोहे  
अरुण निगम जी साथ हैं, पुत्र भी आया साथ ।
एम् टेक एडमीशन यहाँ, दिखा रहा हूँ पाथ ।

तीन दिनों का है यहाँ, उनका सकल प्रवास ।
इसीलिए ना आ रहा, मित्र तुम्हारे पास ।।

कुंडली 
शुक्रवार की रात में,  आई छुक छुक रेल ।
तीन घंटे थी लेट पर,  कर दी गड़बड़ खेल ।
कर दी गड़बड़ खेल , कवर दो घंटा कर ली ।
पहली यह अनुभूति, रात  आशंका भर दी ।
बीस मिनट में किन्तु,  हुआ सब सही नियंत्रित ।
हों टेशन के पास, बिना टेंशन एकत्रित ।।



Friday, 18 May 2012

बस नितम्ब सहलाय, हँसे गोपी यदुरानी -

धन्य-धन्य भाग्य तेरे यदुरानी ,तुझको मेरा शत-शत नमन



यदुरानी तू धन्य है, धन्य हुआ गोपाल ।
दही-मथानी से रही, माखन प्रेम निकाल ।

माखन प्रेम निकाल, खाय के गया सकाले ।
ग्वालिन खड़ी निढाल, श्याम माखन जब खाले ।

जकड कृष्ण को लाय, पड़े  दो दही मथानी ।
बस नितम्ब सहलाय, हँसे गोपी यदुरानी ।।

Thursday, 17 May 2012

किन्तु सके सौ लील, समन्दर इन्हें समूचा-

ऊंचा वही है जो गहराई लिए है

veerubhai at ram ram bhai

(1)
ऊँचा-ऊँचा बोल के, ऊँचा माने छूँछ |
भौंके गुर्राए बहुत, ऊँची करके पूँछ |

ऊँची करके पूँछ, मूँछ पर हाथ फिराए |
करनी है यह तुच्छ, ऊँच पर्वत कहलाये |

किन्तु सके सौ लील, समन्दर इन्हें समूचा | |
जो है गहरा शांत, सभी पर्वत से ऊँचा ||

(2)
पर्वत की गर्वोक्ति पर, धरा धरे ना धीर |
चला सुनामी विकटतम, सागर समझे पीर |

सागर समझे पीर, किन्तु गंभीर नियामक |
पाले अरब शरीर, संभाले सब बिधि लायक | 

बड़वानल ले थाम, सुनामी की यह हरकत |
करे तुच्छ एहसास, दहल जाता वो पर्वत |।

(3)
तथाकथित उस ऊँच को, देता थोडा क्लेश |
शान्त समन्दर भेजता, मानसून सन्देश | 


मानसून सन्देश, कष्ट में गंगा पावन |

जीव-जंतु हलकान, काट तू इनके बंधन |

ब्रह्मपुत्र सर सिन्धु, ऊबता मन क्यूँ सबका  ?
अपना त्याग घमंड, दुहाई रविकर रब का ||  


(4)

तप्त अन्तर है भयंकर |
बहुत ही विक्षोभ अन्दर |
जीव अरबों है विचरते-
शाँत पर दिखता समंदर ||

पारसी छत पर खिलाते |
सुह्र्दजन की लाश रखकर |
पर समंदर जीव मृत से -
ऊर्जा दे तरल कर कर || 

(5)

बढ़ी समस्या खाद्य की, लूट-पाट गंभीर |
मत्स्य एल्गी के लिए, चलो समंदर तीर |


चलो समंदर तीर, भरे भण्डार अनोखा |
बुझा जठर की आग, कभी देगा ना धोखा |


सागर अक्षय पात्र, करेगा विश्व तपस्या |
सचमुच हृदय विशाल, मिटाए बढ़ी समस्या || 


(6)

लम्बी-चौड़ी हाँकते, बौने बौने लोग |
शोषण करते धरा का, औने-पौने भोग |

औने-पौने भोग, रोग है इनको लागा |
रखता एटम बम्ब, दुष्टता करे अभागा |

रविकर कर चुपचाप, जलधि के इन्हें हवाले |
ये आफत परकाल, रखे गहराई  वाले ||


(7)
धरती भरती जा रही, बड़ी विकट उच्छ्वास |
बरती मरती जा रही, ले ना पावे साँस |

ले ना पावे साँस, तुला नित घाट तौलती |
फुकुसिमी जापान, त्रासदी रही खौलती |

चेतो लो संकल्प, व्यर्थ जो आपा खोते |
मिले कहाँ से आम, अगर बबुरी-बन बोते ||


फुहार....

बदनसीबी
221221  22122
यूँ तो मुहब्बत किया जान देकर-
पर ख़ुदकुशी ने रुलाया बहुत है |

गम गलत गर कर न पाए हसीना-
गम को खिला जल पिलाया बहुत है ||

तड़पा किया जब हुआ लाश रविकर-
तन ठोकरों से हिलाया बहुत है ||

गाया गजल गुनगुनाया गुनाकर -
फिर मर्सिया तूने गाया बहुत है ||

होंठो पे तेरे सुधा की जो शबनम-
जिद से पिला के जिलाया बहुत है ||

चीनी कडुवी होय, कहाँ अब प्रेम-सेवइयां -

"कड़वी चीनी"


नमक खाय के भी करें, लुच्चे हमें हलाल ।
घूस खाय के ख़ास-जन, खूब बजावें गाल । 

खूब बजावें गाल, चाल टेढ़ी ही चलते।
आम रसीले चूस, भद्र-जनता को छलते ।

कडुआहट भरपूर, भरें जीवन में भैया  ।
चीनी कडुवी होय,  कहाँ अब प्रेम-सेवइयां ।।

"देश में हम जहर उगलते हैं" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')


गिरगिटान ने गिलट से,  गिला किया है दूर |
गिरहबाज गोते लगा, मजा करे भरपूर |


मजा करे भरपूर, चूर कलई करवा कर |
पद-मद चढ़ा शुरूर, चना थोथा बजवाकर |


पर कलई जिस रोज, खुलेगी रविकर तेरी |
*गिलगिल मार भगाय, नहीं किंचित भी देरी |

*घड़ियाल / मगरमच्छ



रोजगार गहरे जुड़े, हिन्दी का व्यवहार |
जार जार बेजार हो, हिंदी बिन बाजार |

हिंदी बिन बाजार, अर्थ भी जब जुड़ जाता |
रहा विरोधी घोर, शीश खुद चला नवाता |

हिंदी तन मन प्राण, राष्ट्र की मंगल-रेखा |
तुलसी सूर कबीर, प्रेम जय देवी देखा ।।

Wednesday, 16 May 2012

लाश रहे दफ़नाय, काट के बोटी-बोटी-

माँ के दूध का कर्ज़

Maheshwari kaneri at अभिव्यंजना  

तीर्थ-यात्रा का बना, मनभावन प्रोग्राम |
दादी सुमिरन में रमी,  जय राधे घनश्याम |

जय राधे घनश्याम, चले मथुरा से काशी |
दादी गई भुलाय, बाल-मन परम उदासी |

पढ़ी दुर्दशा आज, भजन से मिलती रोटी |
लाश रहे दफ़नाय, काट के बोटी-बोटी ||


मरणोपरांत

Mridula Harshvardhan at Naaz

मात्र कल्पना से सिहर, जाती भावुक देह |
अब मसान की आग भी, जला सके ना नेह |


जला सके ना नेह, गेह अब खाली खाली |
तनिक नहीं संदेह, मोक्ष रविकर ने पाली |


लेकिन एक सवाल, तुम्हारा मुझको ठगना |
कैसे जाते छोड़, किया क्या कभी कल्पना ?? 


बदले ज़माने देखो - कविता



जुबाँ काटे गला काटे, कलेजा काट कर फेंके |
जले श्मशान में काँटा, वहां भी हाथ वो सेंके ||

रही थी दोस्ती उनसे, गुजारे थे  हंसीं-लम्हे
उन्हें हरदम बुरा लगता, वही जो रास्ता छेंके ||

कभी निर्द्वंद घूमें वे, खुला था आसमां सर पर
धरा पर पैर न पड़ते, मिले आखिर छुरा लेके ||


मुहब्बत को सितम समझे, जरा गंतव्य जो पूंछा-
 गंवारा यह नहीं उनको, गए मुक्ती मुझे देके ।।

Tuesday, 15 May 2012

हिंदी तन मन प्राण, राष्ट्र की मंगल-रेखा-


रोजगार गहरे जुड़े, हिन्दी का व्यवहार |
जार जार बेजार हो, हिंदी बिन बाजार |

हिंदी बिन बाजार, अर्थ भी जब जुड़ जाता |
रहा विरोधी घोर, शीश खुद चला नवाता |

हिंदी तन मन प्राण, राष्ट्र की मंगल-रेखा |
तुलसी सूर कबीर, प्रेम जय देवी देखा ।।

"छँट जाएगा, दलाली का आवरण" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) at उच्चारण - 1 hour ago
शोक काल की ग्रह-दशा, हो हलचल दरबार |
भ्रष्ट आचरण ले बना, ड्राफ्ट लाभ अनुसार | 

ड्राफ्ट लाभ अनुसार, लोक न लोक-तंत्र में |
तंत्र ऊर्जा-हीन, शक्ति न बची मन्त्र में |

खाल खींचता पाल, बकरियाँ लोकपाल की |
मने खैर कब तलक, खबर है शोक-काल की ||


ब्लॉग जगत का चुनाव आयोग फ़र्ज़ी है ?


क्या हिंदी ब्लॉग जगत सचमुच बच्चा है जी ?

करें यहाँ गम गलत सब, सच्ची दुनिया छोड़ |
ढोंगी दुर्जन स्वार्थी, देखे वहाँ करोड़ |

देखे वहाँ करोड़, होड़ अब यहाँ देखता |
तुलसी स्वांत-सुखाय, यज्ञ लहलहा देखता | 

पुरस्कार का लोभ, क्षोभ ना  होता भैया |
रविकर जो पा जाय, बजाऊं द्वार बधैया ||

मेरे फैन भी मुझसे कोई नहीं छीन सकता है 

 (प्रवीण पाण्डेय) at न दैन्यं न पलायनम्
पटरंगा आर एस पता, डिस्ट्रिक्ट फ़ैजाबाद |
पास होम-सिग्नल खड़ा, होम वहीँ  आबाद |

होम वहीँ आबाद, बगल विद्यालय साजे |
घंटा तो था व्यर्थ, रेल की छुक छुक बाजे |  

जम्मू देहरादून,  करे तेजी  मनचंगा |
मिलता रहा सुकून, बड़ा प्यारा पटरंगा || 


बदले ज़माने देखो - कविता



जुबाँ काटे गला काटे, कलेजा काट कर फेंके |
जले श्मशान में काँटा, वहां भी हाथ वो सेंके ||

रही थी दोस्ती उनसे, गुजारे थे  हंसीं-लम्हे
उन्हें हरदम बुरा लगता, वही जो रास्ता छेंके ||

कभी निर्द्वंद घूमें वे, खुला था आसमां सर पर
धरा पर पैर न पड़ते, मिले आखिर छुरा लेके ||


मुहब्बत को सितम समझे, जरा गंतव्य जो पूंछा-
 गंवारा यह नहीं उनको, गए मुक्ती मुझे देके ।।

संतानों के सृजन से, माँ का जीवन धन्य-

कविवर डी तन्गवेलन की हिन्दी कविता --मातृत्व की महक ... डा श्याम गुप्त

गमला पौधा सुमन खुश, आँगन भी अन्यान्य |
संतानों के सृजन से, माँ का जीवन धन्य |

माँ का जीवन धन्य, किया बढ़िया विश्लेषण |
तंगवेलन कविराज, मस्त भावों का प्रेषण |

बहुत बहुत आभार, डाक्टर श्याम पुरौधा |
प्रस्तुत रचना पाठ, खिला मन-गमला-पौधा ||


अकेली स्त्री -- समाज और असहिष्णुता

ZEAL at ZEAL  
दुर्घटना के गर्भ में, गफलत के ही बीज |
कठिनाई में व्यर्थ ही, रहे स्वयं पर खीज |

रहे स्वयं पर खीज, कठिन नारी का जीवन |
मौका लेते ताड़, दोस्ती करते दुर्जन |

कर रविकर नुक्सान, क्लेश देकर के हटना |
इनसे रहो सचेत, टाल कर रख दुर्घटना ||
चुपड़ी ललचाती रहे, रुखा- सूखा खाव |
दरकिनार नैतिक वचन, बेशक नहीं मुटाव | 

बेशक नहीं मुटाव, चढ़ी चर्बी है भारी |
डूब रही है नाव, ढेर  काया बीमारी |

यह प्रस्तुत सन्देश,  घुसा के रखियो खुपड़ी |
लगे हृदय पर ठेस, बुरी है भैया चुपड़ी ||

किशोरों में बढ़ती अपराध प्रवृति

Kailash Sharma at Kashish - My Poetry  
नैतिक शिक्षा पुस्तकें, सदाचार आधार  |
इन से भी ज्यादा महत्त्व, मात-पिता व्यवहार |



मात-पिता व्यवहार, पुत्र को मिले बढ़ावा |
पति-पत्नी तो व्यस्त, बाल मन बनता लावा |



खेल वीडिओ गेम, रहे एकाकी घर पर |
मारो काटो घेर, चढ़े फिर उसके सर पर ||


मत पूछ मेरे हौसलों की हदों के बारे में

रश्मि प्रभा... at वटवृक्ष  
भरपूर हौसला साथ लिए, जोखिम को तत्पर भैया ।
ख्वाहिश है आकाश सरीखी, बाधा लेती रही बलैया |

दर्द दवा से रहे चुराते, तकलीफें ताकत बनती -
देख हौसले मेरे ऊंचे, तक़दीर कहे दैया रे दैया ||


"कार्टून और लंगोट "

Sushil at "उल्लूक टाईम्स "
कार्टून के भूत से, लक्ष्मण है हैरान |
दलित प्रेम के प्रेत ने, ले ली उनकी जान |
ले ली उनकी जान, बड़ी चुड़ैल भी गुस्सा |
गिने "चुने" ये लोग, भरा गोबर या भुस्सा ||
भागे रविकर भूत,  लंगोटी खूब संभाली |
रही भली मजबूत, ढील होवे ना साली ||