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Wednesday, 31 October 2012

न्याय, व्यवस्था, कार्य, मीडिया कार्य बिगाड़ा-

आपका आशीर्वाद इस ब्लॉग को-
आभार 

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एक चुटकी- लोकतंत्र की सैर !

पी.सी.गोदियाल "परचेत" 
दिल्ली में धन-पेड़ है, चिकना सीध सपाट ।
चढ़ते हैं उद्योगपति, जोहें रक्षक बाट ।
जोहें रक्षक बाट, चार ठो चोर-किंवाड़ा ।
न्याय, व्यवस्था, कार्य, मीडिया कार्य बिगाड़ा ।
लूटे मक्खन ढेर, किन्तु बँटवाती बिल्ली ।
साईं सबका भला, दूर पर अपनी दिल्ली ।।

कान्ता कर करवा करे, सालो-भर करवाल-

 (शुभकामनाएं)
कर करवल करवा सजा,  कर सोलह श्रृंगार |
माँ-गौरी आशीष दे,  सदा बढ़े शुभ प्यार ||
   करवल=काँसा मिली चाँदी

शत्रु-शस्त्र से सौ गुना, संहारक परिमाण ।
शब्द-वाण विष से बुझे, मित्र हरे झट प्राण ।।



एक मच्छर साला आदमी को ......? ? .........>>> संजय कुमार

संजय कुमार चौरसिया  
जना जड़ैया ज्वर जबर, जनौ जान जकड़ाय |
मलेरिया मच्छर मुआ, देकर मरता जाय |
देकर मरता जाय, कहीं डेंगू ना होवे |
हिजड़ा गर हो जाय, भला बीबी क्यूँ रोवे |
पॉलिटिक्स में आय, खरीदूं बड़ी मड़ैया |
पट्टा लूँ करवाय, बड़ी कीमत है भैया ||



वक्त को संभालो.... !!!

यादें...

कैसे भूल जाऊं तेरी यादो को, जिन्हे याद करने से तू याद आए॥ 
 
गुजर-बसर में गुजरता, सारा जीवन काल ।
 किन्तु काल सिर पर खड़ा, पूछे हाल हवाल ।   
 
पूछे हाल हवाल, सवालों ने है घेरा ।
लगा  रहा रे जीव, युगों से जग का फेरा ।
 
इन्तजार क्या करे, जुटे अब इंतजाम में ।
छोड़ो काम-तमाम, देर अब नहीं शाम में ।।


 Politics To Fashion
अस्वाभाविक ग्रोथ का, सीधा सरल निचोड़ |
आम जनों के रक्त से, करते जमा करोड़ |
करते जमा करोड़, जुगाड़ी जुगल जोड़ियाँ |
करें अशर्फी जमा, बड़ी दमदार कौडियाँ |
मूत रहे ये आग, बड़ा साम्राज्य खडा है |
हाड़ मांस की नींव, आदमी दबा पड़ा है ||


थरूर की बीबी - मोदी का दर्द

Arunesh c dave 
अपनी सत्ता सुंदरी, पर कर मोदी गौर |
व्याह करा दें कहीं ना, थेथर थूर खखोर |

थेथर थूर खखोर,  पड़ा कल जबर चटकना |

बाकी रहते भोर, बंद कर उधर भटकना |

कर समाज कल्याण, खबर तेरी सब छपनी |

अरबों की माशूक, संभाले भरदम अपनी ||
 
थूरे थूथुन थोबड़ा, थेथर थोथ थरूर |
तीन बार शादी किया, यह वाली है हूर |
यह वाली है हूर, किन्तु मोदी क्या जाने |
भारत माँ जय जयतु, लगाए लाश ठिकाने |
सौदागर प्राचीन, समझता अरब रोकडा |
हूँ अधेड़ लव गुरू, चमकता किन्तु थोबड़ा ||

अस्वाभाविक ग्रोथ का, सीधा सरल निचोड़-



 Politics To Fashion
अस्वाभाविक ग्रोथ का, सीधा सरल निचोड़ |
आम जनों के रक्त से, करते जमा करोड़ |
करते जमा करोड़, जुगाड़ी जुगल जोड़ियाँ |
करें अशर्फी जमा, बड़ी दमदार कौडियाँ |
मूत रहे ये आग, बड़ा साम्राज्य खडा है |
हाड़ मांस की नींव, आदमी दबा पड़ा है ||


नहीं रूकेंगे बलात्कार

रणधीर सिंह सुमन 

मारा पहले कोख में, बिना दोष के दोस्त |
ज़िंदा बच जाए अगर, सोंधा सोंधा गोश्त |
सोंधा सोंधा गोश्त, नोच कर कच्चा खाओ |
खाप गई है खेप, इसे श्मशान भिजाओ |
मूल विषय को भूल, कुतर्की यह हत्यारा |
ठीक करे अनुपात, करे ना मारी मारा ||

वक्त को संभालो.... !!!

यादें...

कैसे भूल जाऊं तेरी यादो को, जिन्हे याद करने से तू याद आए॥ 
 
गुजर-बसर में गुजरता, सारा जीवन काल ।
 किन्तु काल सिर पर खड़ा, पूछे हाल हवाल ।   
 
पूछे हाल हवाल, सवालों ने है घेरा ।
लगा  रहा रे जीव, युगों से जग का फेरा ।
 
इन्तजार क्या करे, जुटे अब इंतजाम में ।
छोड़ो काम-तमाम, देर अब नहीं शाम में ।।
 

गोत्रज विवाह-

गुण-सूत्रों की विविधता, बहुत जरूरी चीज |
गोत्रज में कैसे मिलें, रखिये सतत तमीज ||
गोत्रज दुल्हन जनमती, एकल-सूत्री रोग |
दैहिक सुख की लालसा, बेबस संतति भोग ||
मिटते दारुण दोष पर, ईश्वर अगर सहाय |
सबसे उत्तम ब्याह हित, दूरी रखो बनाय ||
गोत्र-प्रांत की भिन्नता, नए नए गुण देत |
संयम विद्या बुद्धि बल, साहस रूप समेत ||

मेरे हिस्से की धूप

दूरी विरह शिकायतें, महायुद्ध हो जाय |
इन्तजार यादें बनीं, सही प्रेम पर्याय |
सही प्रेम पर्याय,  झाड़ भी रही स्वादमय |
झूठ-मूठ का क्रोध, हमेशा कच्चा अभिनय |
यह सब मिलकर प्यार, बने संसार हमारा |
कान्हा का उपकार, विरह भी बने सहारा ||


नारी

Minakshi Pant  
छुट्टी का हक़ है सखी, चौबिस घंटा काम |
  सास ससुर सुत सुता पति, सेवा में हो शाम |

सेवा में हो शाम, नहीं सी. एल. नहिं इ. एल. |
जब केवल सिक लीव,  जाय ना जीवन जीयल |


रविकर मइके जाय, पिए जो माँ की घुट्टी |
  ढूँढे निज अस्तित्व, बिता के दस दिन छुट्टी ||

थरूर की बीबी - मोदी का दर्द

Arunesh c dave 
अपनी सत्ता सुंदरी, पर कर मोदी गौर |
व्याह करा दें कहीं ना, थेथर थूर खखोर |
थेथर थूर खखोर,  पड़ा कल जबर चटकना |
बाकी रहते भोर, बंद कर उधर भटकना |
कर समाज कल्याण, खबर तेरी सब छपनी |
अरबों की माशूक, संभाले भरदम अपनी ||



तांडव शंकर दे मचा , नचा विश्व परिदृश्य |
विशिष्ट ऊर्जा जल भरे, करे जलजला पृश्य |
करे जलजला पृश्य, दृश्य नहिं देखा जाए |
जल जाए जब जगत, हजारों जाने खाए |
क्षिति जल पावक गगन, वायू से मंच पांडव |
छेड़ छाड़ कर बंद, नहीं तो झेल तांडव || 


पिला रही निज रक्त, मदर-विदुषी यह बोली- 
दूध मांसाहार है, अंडा शाकाहार ।
भ्रष्ट-बुद्धि की बतकही, ममता का सहकार ।
ममता का सहकार, रुदन शिशु का अपराधिक ।
माता हटकु पसीज, छद्म गौ-बछड़े माफिक ।
पिला रही निज रक्त, मदर-विदुषी यह बोली ।
युगों युगों की खोज, बड़ी शिद्दत से खोली ।।

हैं फॉलोवर ढेर, चेत हे ब्लॉगर नामी-

कामी क्रोधी लालची, पाये बाह्य उपाय ।
उद्दीपक का तेज नित, इधर उधर भटकाय ।
इधर उधर भटकाय, कुकर्मों में फंस जाता ।
अहंकार का दोष, मगर अंतर से आता।
हैं फॉलोवर ढेर, चेत हे ब्लॉगर नामी ।
पद मद में हो चूर, बने नहिं क्रोधी कामी ।।



Tuesday, 30 October 2012

पिला रही निज रक्त, मदर-विदुषी यह बोली-

 दूध मांसाहार है, अंडा शाकाहार ।
भ्रष्ट-बुद्धि की बतकही, ममता का सहकार ।
ममता का सहकार, रुदन शिशु का अपराधिक ।
माता हटकु पसीज, छद्म गौ-बछड़े माफिक ।
पिला रही निज रक्त, मदर-विदुषी यह बोली ।
युगों युगों की खोज, बड़ी शिद्दत से खोली ।।



कामी क्रोधी लालची, पाये बाह्य उपाय ।
उद्दीपक के तेज से, इधर उधर बह जाय ।
इधर उधर बह जाय, कुकर्मों में फंस जाता  ।
अहंकार का दोष, मगर अंतर से आता।
हैं फॉलोवर ढेर, चेत हे ब्लॉगर नामी ।
पद मद में हो चूर, बने नहिं क्रोधी कामी ।।


 काव्य मंजूषा
 मांसाहारी सकल जग, खाता पशु प्रोडक्ट ।
कुछ देशों में व्यर्थ ही, लागू उल्टा एक्ट ।

लागू उल्टा एक्ट, *कपूतों खून पिया है ।

हाड़-मांस खा गए, कहाँ फिर भेज दिया है ।

फिर से माँ को ढूँढ, दूध की चुका उधारी ।

**मथुरा में जा देख, नोचते मांसाहारी ।। 
*माँ की ओर संकेत करने की कोशिश  
**विधवा आश्रमों के लिए भी  जानी जाती है मथुरा नगरी 
जहाँ एक रोटी के लिए दिन भर कीर्तन  करती हैं माताएं-
क्रियाकर्म टुकड़ों में काट कर किया जाता  है- 

  1. जब एनीमल प्रोडक्ट खाने से नहीं कोई गुरेज़
    फिर गुड खावें गुल्गुल्ले से कहते करो परहेज़
    कितनी दवाओं में होता है, नीरीह एनिमल पार्ट
    आदि काल से आयुर्वेद भी था इसमें एक्सपर्ट
    पाषण युग में खेत नहीं थे, तब का खाते थे पुरखे ?
    आज भी जो रहते बर्फ, मरु में, क्या रहेंगे भूखे ?
    जिसको जो रुचता है खाने देवो अपनी देखो लल्ला
    सामिष, निरामिष की काहे की बिन बात का हल्ला
    कोई उल्टा एक्ट नहीं है सब सीधा है मेरी मईया
    वो दूध को सामिष कहते हैं और मांस को भी सामिष भईया



    1. एक समाचार पढ़ा था -
      बिधवा माँ को बेटा  मथुरा छोड़ आया था-
      और दूसरी खबर-
      विधवाओं  का अंतिम संस्कार भी नहीं किया जाता -
      टुकड़े टुकड़े कर के चीलों के खाने के लिए छोड़ दिया जाता है- मथुरा से ही यह खबर भी-
      उधर ही इशारा था -
      त्वरित कुंडली शायद भाव स्पष्ट नहीं कर पाई-
      क्षमा -
      अर्थ का अनर्थ हो गया ||
      सादर -
      इस ब्लॉग पर अबतक 

      २५०० काव्यमयी टिप्पणियां हैं लिंक सहित 
      कभी कभी आते रहिये-

छले नहीं यह रूप, धूप चहुँ ओर बिखेरे

 कौन सुनता है ? 

खोता रविकर ढोयगा, कब तक अपना बोझ ।
अब उतार कर रख चला, पीठ कर रहा सोझ ।

पीठ कर रहा सोझ, खोज अब कोई दूजा ।

होती चिक चिक रोज, करूँ नहिं तेरी पूजा ।

 काटेगा इंसान, जिन्दगी में जो बोता ।
कहते हैं विद्वान, मजे में जीता खोता ।।

"रूप छलता रहा" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण)  
 सुबह सवेरे ओस भी, बनती गंगा धार ।
बहा रहे गुरुवर यहाँ, पावन छंद बयार ।
 पावन छंद बयार, बड़ी आकर्षक दीखे ।
नव-कवि कुल आ जाव , यहाँ कविताई सीखे ।
छले नहीं यह रूप, धूप चहुँ ओर बिखेरे ।
रविकर गुरुकुल जाय, आज तो सुबह सवेरे ।।

खता,,,
खता बता कर क्या करें, ख़त खतियाना ख़त्म ।
खेल ख़तम पैसा हजम, यही पुरानी रश्म ।
यही पुरानी रश्म, कुबूला जैसी हो तुम ।
शायद भूला रूल, सीध होती नहिं यह दुम ।
तेरे द्वारे आय, भौंकता रविकर प्यारी ।
गरज गरज ठुकराय, रही क्यूँ गरज हमारी  । 

तांडव शंकर दे मचा , नचा विश्व परिदृश्य |
विशिष्ट ऊर्जा जल भरे, करे जलजला पृश्य |
करे जलजला पृश्य, दृश्य नहिं देखा जाए |
जल जाए जब जगत, हजारों जाने खाए |
क्षिति जल पावक गगन, वायू से मंच पांडव |
छेड़ छाड़ कर बंद, नहीं तो झेल तांडव || 

छले नहीं यह रूप, धूप चहुँ ओर बिखेरे-



 कौन सुनता है ? 

खोता रविकर ढोयगा, कब तक अपना बोझ ।
अब उतार कर रख चला, पीठ कर रहा सोझ ।
पीठ कर रहा सोझ, खोज अब कोई दूजा ।
होती चिक चिक रोज, करूँ नहिं तेरी पूजा ।
 काटेगा इंसान, जिन्दगी में जो बोता ।
कहते हैं विद्वान, मजे में जीता खोता ।।



"रूप छलता रहा" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण)  

 सुबह सवेरे ओस भी, बनती गंगा धार ।
बहा रहे गुरुवर यहाँ, पावन छंद बयार ।
 पावन छंद बयार, बड़ी आकर्षक दीखे ।
नव-कवि कुल आ जाव , यहाँ कविताई सीखे ।
छले नहीं यह रूप, धूप चहुँ ओर बिखेरे ।
रविकर गुरुकुल जाय, आज तो सुबह सवेरे ।।


खता,,,
खता बता कर क्या करें, ख़त खतियाना ख़त्म ।
खेल ख़तम पैसा हजम, यही पुरानी रश्म ।
यही पुरानी रश्म, कुबूला जैसी हो तुम ।
शायद भूला रूल, सीध होती नहिं यह दुम ।
तेरे द्वारे आय, भौंकता रविकर प्यारी ।
गरज गरज ठुकराय, रही क्यूँ गरज हमारी  । 

तांडव शंकर दे मचा , नचा विश्व परिदृश्य |
विशिष्ट ऊर्जा जल भरे, करे जलजला पृश्य |
करे जलजला पृश्य, दृश्य नहिं देखा जाए |
जल जाए जब जगत, हजारों जाने खाए |
क्षिति जल पावक गगन, वायू से मंच पांडव |
छेड़ छाड़ कर बंद, नहीं तो झेल तांडव || 


करवाचौथ की फुलझड़ियाँ ("माहिया" में पति पत्नी की चुहल बाजी

Rajesh Kumari  
 पूछा अपने दोस्त से, ओ पाजी सतवंत ।
सन बारह का हो रहा, दो महीनों में अंत ।
दो महीनों में अंत, बुरा दिन एक बताना ।
और कौन सा भला, दिवस वह भी समझाना ।
कहता है सतवंत, बुरा दिन साल गिरह का ।
बढ़िया करवा चौथ, बोल कर पाजी चहका ।। 


इश्क

expression 
झूठा चंदा खा रहा, जहाँ व्यर्थ सी कौल ।
वहीँ चांदनी दे जमा, वहीँ पीठ पर धौल ।
वहीँ पीठ पर धौल, छला था नारि गौतमी ।
कभी नहीं बन सका, शकल से सही आदमी ।
छुपते छुपे छुपाय, छकाये छली अनूठा ।
धीरे शकल दिखाय, बनाए बातें झूठा ।।

अधूरे सपनों की कसक (22) !

रेखा श्रीवास्तव  
दीदी संगीता पुरी जी  
  विदुषी ज्योतिष से जुड़ी, गत्यात्मक सन्दर्भ ।
एक एक जोड़ें कड़ी, पढ़ें समय का गर्भ ।
पढ़ें समय का गर्भ , समर्पित कर दी जीवन ।
वैज्ञानिक सी दृष्टि, देखता श्रेष्ठ समर्पण ।
पूज्य पिता का क्षेत्र, जोड़ संगीता हरषी ।
शुभकामना अपार, जरा स्वीकारो विदुषी ।।