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एक चुटकी- लोकतंत्र की सैर !पी.सी.गोदियाल "परचेत"
दिल्ली में धन-पेड़ है, चिकना सीध सपाट ।
चढ़ते हैं उद्योगपति, जोहें रक्षक बाट ।
जोहें रक्षक बाट, चार ठो चोर-किंवाड़ा ।
न्याय, व्यवस्था, कार्य, मीडिया कार्य बिगाड़ा ।
लूटे मक्खन ढेर, किन्तु बँटवाती बिल्ली ।
साईं सबका भला, दूर पर अपनी दिल्ली ।। |
कान्ता कर करवा करे, सालो-भर करवाल-
(शुभकामनाएं)
कर करवल करवा सजा, कर सोलह श्रृंगार |
माँ-गौरी आशीष दे, सदा बढ़े शुभ प्यार ||
करवल=काँसा मिली चाँदी
![]() |
शत्रु-शस्त्र से सौ गुना, संहारक परिमाण ।
शब्द-वाण विष से बुझे, मित्र हरे झट प्राण ।।
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एक मच्छर साला आदमी को ......? ? .........>>> संजय कुमार
संजय कुमार चौरसिया
जना जड़ैया ज्वर जबर, जनौ जान जकड़ाय |
मलेरिया मच्छर मुआ, देकर मरता जाय |
देकर मरता जाय, कहीं डेंगू ना होवे |
हिजड़ा गर हो जाय, भला बीबी क्यूँ रोवे |
पॉलिटिक्स में आय, खरीदूं बड़ी मड़ैया |
पट्टा लूँ करवाय, बड़ी कीमत है भैया ||
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वक्त को संभालो.... !!!यादें...
कैसे भूल जाऊं तेरी यादो को, जिन्हे याद करने से तू याद आए॥
गुजर-बसर में गुजरता, सारा जीवन काल ।
किन्तु काल सिर पर खड़ा, पूछे हाल हवाल ।
पूछे हाल हवाल, सवालों ने है घेरा ।
लगा रहा रे जीव, युगों से जग का फेरा ।
इन्तजार क्या करे, जुटे अब इंतजाम में ।
छोड़ो काम-तमाम, देर अब नहीं शाम में ।।
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Politics To Fashion
अस्वाभाविक ग्रोथ का, सीधा सरल निचोड़ | आम जनों के रक्त से, करते जमा करोड़ | करते जमा करोड़, जुगाड़ी जुगल जोड़ियाँ | करें अशर्फी जमा, बड़ी दमदार कौडियाँ | मूत रहे ये आग, बड़ा साम्राज्य खडा है | हाड़ मांस की नींव, आदमी दबा पड़ा है || |
थरूर की बीबी - मोदी का दर्द
थूरे थूथुन थोबड़ा, थेथर थोथ थरूर |
Arunesh c dave
अपनी सत्ता सुंदरी, पर कर मोदी गौर |
व्याह करा दें कहीं ना, थेथर थूर खखोर | थेथर थूर खखोर, पड़ा कल जबर चटकना | बाकी रहते भोर, बंद कर उधर भटकना | कर समाज कल्याण, खबर तेरी सब छपनी | अरबों की माशूक, संभाले भरदम अपनी || तीन बार शादी किया, यह वाली है हूर | यह वाली है हूर, किन्तु मोदी क्या जाने | भारत माँ जय जयतु, लगाए लाश ठिकाने | सौदागर प्राचीन, समझता अरब रोकडा | हूँ अधेड़ लव गुरू, चमकता किन्तु थोबड़ा || |










फिर गुड खावें गुल्गुल्ले से कहते करो परहेज़
कितनी दवाओं में होता है, नीरीह एनिमल पार्ट
आदि काल से आयुर्वेद भी था इसमें एक्सपर्ट
पाषण युग में खेत नहीं थे, तब का खाते थे पुरखे ?
आज भी जो रहते बर्फ, मरु में, क्या रहेंगे भूखे ?
जिसको जो रुचता है खाने देवो अपनी देखो लल्ला
सामिष, निरामिष की काहे की बिन बात का हल्ला
कोई उल्टा एक्ट नहीं है सब सीधा है मेरी मईया
वो दूध को सामिष कहते हैं और मांस को भी सामिष भईया