Follow by Email

Monday, 30 January 2017

सत्ता कम्बल बाँट दे, उनका ऊन उतार-

भेड़-चाल में फिर फँसी, पड़ी मुफ्त की मार।
सत्ता कम्बल बाँट दे, उनका ऊन उतार।

पैसे पद से जो जुड़े, सुख मे ही वे साथ।
जुड़ वाणी व्यवहार से, ताकि न छूटे हाथ।।

आ जाये कोई नया, अथवा जाये छोड़।
बदल जाय तब जिंदगी, रविकर तीखे मोड़।।

नीम-करैले का चखे, बेमन स्वाद जुबान।
लेकिन खुद कड़ुवी जुबाँ, रही पकाती कान।।

अम्ल लवण मधु मिर्च तक, करे पसन्द जुबान।
किन्तु करैले नीम से, निकले रविकर जान।।

Thursday, 12 January 2017

लंगड़ी मारे अपना बेटा-

बातों में लफ्फाजी देखो।
छल छंदों की बाजी देखो।।

मत दाता की सूरत ताको।
नेता से नाराजी देखो।।

लम्बी चैटों से क्या होगा।
पंडित देखो काजी देखो।।

अंधा राजा अंधी नगरी।
खाजा खा जा भाजी देखो।।

लंगड़ी मारे अपना बेटा
बप्पा चाचा पाजी देखो।।

पैसा तो हरदम जीता है
रविकर घटना ताजी देखो।।