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Friday, 1 June 2012

लगे गुरु को ठण्ड, अलावी बने सहारा -



क्वचिदन्यतोSपि...


चेले चैले हो रहे, ले मुगदर का रूप |
दोनों हाथों भांजते, पर सम्बन्ध अनूप | 

पर सम्बन्ध अनूप, परसु से भय ना लागे |
त्यागा जब से कूप, गोलियां भर भर दागे |

चेला यह उद्दंड, गुरू को अतिशय प्यारा |
लगे गुरु को ठण्ड, अलावी बने सहारा |




हमको भी पुस्तक मिली, जय जय मेरे गीत |
एक एक प्रस्तुति पढ़ी, जागी प्रीत-प्रतीत |


जागी प्रीत-प्रतीत, मुबारक होवे भैया |
रविकर प्रचलित रीत, भाव की लेत बलैया |


हर्षित मन-अरविन्द, पटल-मानस पर चमको |
बस्तर वाले अनिल, विषय भय भाया हमको ||






“रूप” न ऐसा हमको भाता 

(डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')



सकल जगत जल जल जला,
 बदन-जल जला जाय |

जीव जंतु जंगल जकड, 
जीवन दिया जलाय ||

Tuesday, 29 May 2012

"उच्चारण" पर हाय, पड़े गर्दन पर फंदा-


"महँगाई-छः दोहे" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')



मुंह की और मसूर की, लाल लाल सी दाल |
डाल-डाल पर बैठकर, खाते रहे दलाल |

खाते रहे दलाल, खाल खिंचवाया करते |
निर्धन श्रमिक किसान, मौत दूजे की मरते |

"उच्चारण" पर हाय, पड़े गर्दन पर फंदा |
सिसक सिसक मर जाय, आज का सच्चा बंदा ||



तभी पढ़ें जब आपके पास प्रमाण-पत्र हो !



चना अकेला चल पड़ा, खड़ा बीच बाजार |
ताल ठोकता गर्व से, जो फोड़ा सौ भार |


जो फोड़ा सौ भार, लगे यह लेकिन सच ना |
किन्तु रहे हुशियार, जरा घूँघट से बचना |


केवल मुंह को ढांप, निपटती प्रात: बेला |
सरे-शाम मैदान, सौंचता चना अकेला ||





घूँघट बुर्का डाल के, बैठ चौक पर जाय |
टिकट ख़रीदे क्लास जो, वो ही दर्शन पाय |

वो ही दर्शन पाय, आपकी  मेहरबानी  |
रविकर सा नाचीज, ढूँढिये बेहतर जानी |



सज्जन का क्या काम, निमंत्रित कर ले मुंह-फट |
दो सौ डालर डाल, उठा देंगे वे घूँघट ||

हुलकी आवैं !!


हुलकी जिसे कहते हैं ...!




हुलकी जैसे शब्द के, भारी भारी अर्थ |
प्रान्तों का कर के भ्रमण, पहुँच गए हम पर्थ |

पहुँच गए हम पर्थ, अर्थ जो रविकर भाये |
ताक-झाँक में मस्त, नजर कुछ सुन्दर आए |

लेख लगे गंभीर,चुटकियाँ हल्की-फुलकी |
चले अली के तीर, कभी ना आवैं हुलकी ||

Sunday, 27 May 2012

पड़ी जलानी आग, गणेशा ताप रहा है

गंग-चन्द्र तन भस्म है, गले में डाला नाग |

गले में डाला नाग, हुए कैलाश निवासी |
मना रहे आनंद,बने है घट घट वासी |

पर शंकर परिवार, ठंड से कांप रहा है |
पड़ी जलानी आग, गणेशा ताप रहा है || 

              

आए तुम याद मुझे --जिंदगी के ३६ साल बाद --







महत्वपूर्ण है जिंदगी, घर के दर-दीवार |
छत्तीस से विछुड़े मगर, अब तिरसठ सट प्यार |


अब तिरसठ सट प्यार, शिला पर लिखी कहानी |
वह खिडकी संसार,दिखाए डगर जवानी |


आठ साल की ज्येष्ठ, मगर पहला था चक्कर |
चल नाले में डाल, सुझाता है यह रविकर ||

Thursday, 24 May 2012

भगवन गर नाराज, पड़े डाक्टर के द्वारे-

हास्यफुहार

तुम रूठा न करो मेरी जान निकल जाएगी

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बड़ा मस्त अंदाज है, सीधी साधी बात |
अट्ठाहास यह मुक्त है, मुफ्त मिली सौगात |

मुफ्त मिली सौगात, डाक्टर हों या भगवन |
करिए मत नाराज, कभी दोनों को श्रीमन |

भगवन गर नाराज, पड़े डाक्टर के द्वारे |

डाक्टर गर नाराज, हुए भगवन के प्यारे||

दिवस्पति की दिल्लगी से- झूम झूरे झेर झूरे-

लोमड़ी के दिवस पूरे !


लोमड़ी के दिवस पूरे-
पड़े-घूरे, उसे घूरें ||
रात बाकी-दिवस पूरे |
सदा थू-रे, बदा थूरे ||


घूर के भी दिन बहूरे-
लट्ठ हूरे, नग्न-हूरें ||
आँख सेकें, भद्र छोरे |
नहीं छू-रे, चलें छूरें ||


मस्त हैं अंगूर लेकिन
खले तू-रे, नहीं तूरे ||
दिवस्पति की दिल्लगी से-
झूम झूरे झेर झूरे ||

Wednesday, 23 May 2012

लपटें उठती उद्ध, जला पेट्रोल छिड़ककर-

पलायमान ब्लॉगर्स

  ZEAL

कक्षा में डांटे गए,  डटे रहे डग खूब |
पक्षपात शिक्षक करे, जात-पांत में डूब |

जात-पांत में डूब, ऊबते लेकिन सारे  |
करूँ टेंथ में टॉप, प्रभू संकल्प सहारे |

छोड़ बढ़ो नैराश्य,  यही रविकर की इच्छा  |
जीवन का संघर्ष, हमेशा बेढब कक्षा |।

टैकल पेट्रोल हाइक मक्खन स्टाइल...खुशदीप

Khushdeep Sehgal

मोहन माखन खा गए, मोहन पीते दुग्ध ।
आग लगा मोहन गए, लपटें उठती उद्ध ।

लपटें उठती उद्ध, जला पेट्रोल छिड़ककर ।
होती जनता क्रुद्ध, उखाड़ेगी क्या रविकर ।

बड़े कमीशन-खोर, चोर को हलुवा सोहन ।
दाढ़ी बैठ खुजाय, अर्थ का शास्त्री मोहन ।।