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Sunday, 15 October 2017

मुक्तक

जद्दोजहद करती रही यह जिंदगी हरदिन मगर।
ना नींद ना कोई जरूरत पूर्ण होती मित्रवर।
अब खत्म होती हर जरूरत, नींद तेरा शुक्रिया
यह नींद टूटेगी नहीं, री जिंदगी तू मौजकर।।

व्यवहार घर का शुभ कलश, इंसानियत घर की तिजोरी।
मीठी जुबाँ धन-संपदा, तो शांति लक्ष्मी मातु मोरी।
पैसा सदा मेहमान सा, तो एकता ममता सरीखी।
शोभा व्यवस्था से दिखे , हल से खुशी क्या खूब दीखी।

कभी क्या वक्त रुकता है, घड़ी को बंद करने से ।
कभी क्या सत्य छुपता है, अनर्गल झूठ बकने से।
करोगे दान तो थोड़ा, रुपैया खर्च हो जाता।
मगर लक्ष्मी नहीं जाती, अपितु आनन्द-धन आता।।

Tuesday, 26 September 2017

दोहे

दानवीर भरसक भरें, रविकर भिक्षा-पात्र।
करते इच्छा-पात्र पर, किन्तु कोशिशें मात्र।।

भरता भिक्षा-पात्र को, दानी बारम्बार।
लेकिन इच्छा-पात्र पर, दानवीर लाचार।।

है सामाजिक व्यक्ति का, सर्वोत्तम व्यायाम।
आगे झुककर ले उठा, रविकर पतित तमाम।

रखे सुरक्षित जर-जमीं, रविकर हर धनवान।
रक्षा किन्तु जुबान की, कभी नहीं आसान।।

Sunday, 17 September 2017

मगर शुभचिंतकों की खुद, करो पहचान तुम प्यारे


बहस माता-पिता गुरु से, नहीं करता कभी रविकर ।
अवज्ञा भी नहीं करता, सुने फटकार भी हँसकर।
कभी भी मूर्ख पागल से नहीं तकरार करता पर-
सुनो हक छीनने वालों, करे संघर्ष बढ़-चढ़ कर।।


किसी की राय से राही पकड़ ले पथ सही रविकर।

मगर मंज़िल नही मिलती, बिना मेहनत किए डटकर।
तुम्हें पहचानते बेशक प्रशंसक, तो बहुत सारे
मगर शुभचिंतकों की खुद, करो पहचान तुम प्यारे।।



Friday, 25 August 2017

तलाक

जो जंग जीती औरतों ने आज भी आधी-अधूरी ।
नाराज हो जाये मियाँ तो आज भी है छूट पूरी।
शादी करेगा दूसरी फिर तीसरी चौथी करेगा।
पत्नी उपेक्षा से मरेगी वह नही होगी जरूरी।

पड़ी जब आँख पर पट्टी, निभाती न्याय की देवी।
तराजू ले सदी चौदह, बिताती न्याय की देवी।
मगर जब देवियाँ जागीं, मिला अधिकार तब वाजिब
विषम् पासंग पलड़े का, मिटाती न्याय की देवी।


संगीत से इलाज-

सुना दो राग दरबारी हृदय आघात टल जाये।
अनिद्रा दूर हो जाए अगर तू भैरवी गाये।
हुआ सिरदर्द कुछ ज्यादा सुना दो राग भैरव तुम
मगर अवसाद में तो राग मधुवंती बहुत भाये।

विहागी राग गा लेना अगर वैराग्य आये तो।
अजी मल्हार गा लेना गरम ऋतु जो सताये तो।
जलाया राग दीपक से दिया संगीत कारों ने।
चलो शिवरंजनी गाओ अगर विद्या भुलाये तो।

ललित से अस्थमा थमता पुराने गीत कुछ गाओ।
हुआ कमजोर तन तो राग जयवंती सुना जाओ।
बढ़े एसीडिटी जब भी खमाजी राग भाता है
करें संगीत भी उपचार प्रिय नजदीक तो आओ।।

जंगली पॉलिटिक्स

सरासर झूठ सुन उसका उसे कौआ नहीं काटा।
चपाती बिल्लियों को चंट बंदर ठीक से बाँटा।

परस्पर लोमड़ी बगुला निभाते मेजबानी जब।
घड़े में खीर यह खाया उधर वह थाल भी चाटा।

युगों से साथ गेंहूँ के सदा पिसता रहा जो घुन 
बनाया दोस्त चावल को नहीं जिसका बने आटा।।

मरा हीरा कटा मोती किसानों की बिकी खेती
खिला पीजा खिला बर्गर भरे फिर कार फर्राटा।

कभी खरगोश कछुवे को नहीं कमजोर समझा था
करा के मैच फिक्सिंग वो करेगा पूर्ण फिर घाटा।।

कुएं तक सिंह तो आया मगर झांका नही अन्दर
बुला खरगोश को रविकर अकेले में बहुत डाटा।।

Tuesday, 22 August 2017

चले यह जिंदगी लेकर हमेशा शाम तक रिश्ते-

कहीं बेनाम हैं रिश्ते, कहीं बस नाम के रिश्ते।
चतुर मानुष बनाते हैं हमेशा काम से रिश्ते।

मुहब्बत मुफ्त में मिलती सदा माँ बाप से लेकिन
लगाये दाम की पर्ची धरे गोदाम में रिश्ते।

शुरू विश्वास से होते समय करता इन्हे पक्का
अगर धोखा दिया इनको गये फिर काम से रिश्ते।।

रहो चुपचाप गलती पर, बहस बिल्कुल नही करना
खतम नाराजगी हो तो चले आराम से रिश्ते।।

बड़ा भारी लगे मतलब, निकलते ही किया हलका
कई मन के रहे थे जो बचे दो ग्राम के रिश्ते।

कभी भी जिंदगी के साथ रिश्ते चल नही पाते
चले यह जिंदगी लेकर हमेशा शाम तक रिश्ते।।

पड़ी हैं स्वार्थ में दुनिया नहीं वे याद करते हैं
पड़े जब काम तो भेजें इधर पैग़ाम वे रिश्ते।।

रवैया मूढ़ता उनकी अहम् उनका पड़े भारी
नहीं वे रख सके रविकर हमेशा थाम के रिश्ते।।