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Sunday, 25 September 2016

दाता अपने नाम, भेजते रहिए डाटा-


डाटा जैसे अॉन हो, हे दाता भगवान।
प्राप्त परमगति झट करे, यह मूरख इंसान।
यह मूरख इंसान, ध्यान योगासन रोजा।
भूले धर्म विभेद, खुदा डाटा में खोजा।
परिजन स्वजन बिसार, चाहता है सन्नाटा।
दाता अपने नाम, भेजते रहिए डाटा।।

Thursday, 22 September 2016

अपराध ये करता रहा

हो सर्व-व्यापी किन्तु मैं तो खोजता-फिरता रहा।
तुम शब्द से भी हो परे पर नाम मैं धरता रहा ।
हो सर्व ज्ञाता किन्तु इच्छा मैं प्रकट करता रहा।
अपराध ये करता रहा पर कष्ट तू हरता रहा।।

Monday, 19 September 2016

माँ कालिका

दुर्मुख असुर दारुण दुखों से साधु मन छलने लगा।
वरदान पा कर दुष्ट आ कर विश्व को दलने लगा।
ब्रहमा वरुण यम विष्णु व्याकुल इंद्र को खलने लगा।
सुर साधु बल-पौरुष घटा विश्वास जब ढलने लगा।

तब हो इकट्ठा देवता कैलास पर्वत पर गये।
गौरा विराजे रूप छाजे सर्व आनंदित भये।
बोले सकल सुर एक सुर मे कर कृपा जगदम्बिके।
दुर्मुख असुर संहार कर दीजै अभय माँ कालिके।

सुन कर विनय निर्णय करे माँ रूप मारक धर रही।
एकांश शिव मुख मे गया विषपान मैया कर रही।
आकार सम्यक रंग काला कंठ में शिव के बने।
तब तीसरा शिव नेत्र खोलें युद्ध अति-भीषण ठने।

माँ कालिके के माथ पर भी नेत्र शिव सम तीसरा।
शुभ चंद्र रेखा भाल पर विष शिव कराली था भरा।
धारे विविध आभूषणों को अस्त्र-शस्त्रों को लिए।
क्रोधित भयंकर रूप धारे रक्त खप्पर में पिए।।

यह देख कुल सुर-सिद्ध भागे कालिके हुंकार दे।
हुंकार से दुर्मुख मरे कुल दैत्य माँ संहार दे।
पर क्रोध बढ़ता देखकर सुर साधुजन घबरा गये।
तब रूप शिशु का धार कर पैरों तले शिव आ गये।

ममतामयी माँ ले उठा शिशु को पिलाती दुग्ध है।
यह दृश्य पावन देख कर नश्वर-जगत भी मुग्ध है।
शिव दुग्ध के ही साथ मॉ का क्रोध सारा पी गये।
माँ कालिका मूर्छित हुई शिव नृत्य फिर करते भये।

तांडव-भयंकर हो शुरू चैतन्य हो माँ कालिके ।
खुद मुंडमाला डालकर तांडव करे चंडालिके।
मॉ योगिनी मॉ कालिके कुल कष्ट भक्तों का हरो।
इस देश रविकर ग्राम पर कुल पर कृपा माता करो।

Tuesday, 30 August 2016

कब से 'रविकर' तन-बदन तलता रहा -

रात दिन जीवन मुझे खलता रहा | प्यार और विश्वास भी छलता रहा | क्या बुझाएगी हवा उस दीप को जो सदा तूफान में जलता रहा | तेल की बूंदे इसे मिलती रही मुश्किलों का दौर यूँ टलता रहा -- कुछ थी हिम्मत और कुछ थे हौंसले अस्थिया-चमड़ी-वसा गलता रहा खून के वे आखिरी कतरे चुए जिस बदौलत दीप यह पलता रहा अब अगर ईंधन चुका तो क्या करें कब से 'रविकर' तन-बदन तलता रहा ||

Thursday, 28 July 2016

विद्वानों से डाँट, सुने रविकर की मंशा

सुने प्रशंसा मूर्ख से, यह दुनिया खुश होय |
डाँट खाय विद्वान की, रोष करे दे रोय |

रोष करे दे रोय, सहे ना समालोचना |
शुभचिंतक दे खोय, करे फिर बंद सोचना |

विद्वानों से डाँट, सुने रविकर की मंशा |
करता रहे सुधार,  और फिर  सुने प्रशंसा ||



Monday, 18 July 2016

गले हमेशा दाल, टांग चापे मुर्गे की-

मुर्गे की इक टांग पे, कंठी-माला टांग |
उटपटांग हरकत करो, कूदो दो फर्लांग |

कूदो दो फर्लांग, बाँग मुर्गा जब देता |
चमचे धूर्त दलाल, विषय के पंडित नेता |

रहे चापते माल, सोचते हैं आगे की |
गले हमेशा दाल, टांग चापे मुर्गे की ||

पड़ा तरुण तब बोल, अलग रहिये अब पापा-

पापा सब कुछ जानते, वे तो हैं विद्वान।
बच्चा बच्चों से कहे, मेरे पिता महान ।

मेरे पिता महान, शान में पढ़े कसीदे।
कहता किन्तु किशोर, ध्वस्त जब हो उम्मीदें।

कम व्यवहारिक ज्ञान, किया चिड़चिड़ा बुढ़ापा।
पड़ा तरुण तब बोल, अलग रहिये अब पापा।।