Follow by Email

Monday, 4 June 2018

रविकर के कुछ विशेष दोहे-

रंगमंच पर दो जमा, रविकर ऐसा रंग।
 अश्रु बहे, पर्दा गिरे, ताकि तालियों संग।।

रस्सी जैसी जिंदगी, तने तने हालात |
एक सिरे पे ख्वाहिशें, दूजे पे औकात ||

धत तेरे की री सुबह, तुझ पर कितने पाप।
ख्वाब दर्जनों तोड़ के, लेती रस्ता नाप।।

चंद चुनिंदा मित्र रख, जिंदा रख हर शौक।
हारे तब बढ़ती उमर, करे जिक्र हर चौक।|

कह दो मन की बात तो, हो फैसला तुरंत।
वरना बढ़ता फासला, हो रिश्ते का अंत।।

मार्ग बदलने के लिए, यदि लड़की मजबूर |
कुत्ता हो या मर्द हो, कूचो उसे जरूर ||

हाथ मिलाने से भला, निखरे कब सम्बन्ध।
बुरे वक्त में थाम कर, रविकर भरो सुगन्ध।।

नंगे बच्चे को दिया, माँ ने थप्पड़ मार।
लेकिन नंगा आदमी, बच जाता हरबार।।

संग जलेगा शर्तिया, रविकर आधा पेड़ |
एक पेड़ तो दो लगा, अब जो हुआ अधेड़ ||

अपनी हो या आपकी, हँसी-खुशी-मुस्कान।
रविकर को लगती भली, प्रभु-वंदना समान।।

 रोटी तो लेता कमा, पहला सारोकार।
किन्तु साथ परिवार के, खाता कभी-कभार।।

बिन चंदा बेचैन कवि, नेता, बाल, चकोर।
रविकर चारो ताकते, बस चंदा की ओर।।

चढ़कर पारा काँच को, दर्पण रहा बनाय।
रविकर दर्पण दे दिखा, झट पारा चढ़ जाय।।

मिले और बिछुड़े जगत, बढ़िया रीति-रिवाज़।
मिलो न बिछड़ो तुम कभी, क्यों मेरे सरताज़।।

है पहाड़ सी जिंदगी, चोटी पर अरमान।
भ्रम-प्रमाद ले जो चढ़े, रविकर गिरे उतान।।

पैसे से ज्यादा बुरी, और कौन सी खोज |
किन्तु खोज सबसे भली, परखे रिश्ते रोज ||

अच्छी बातें कह चुका, जग तो लाखों बार।
किन्तु करेगा कब अमल, कब होगा उद्धार।।

कान लगाकर सुन रहा, जब सारा संसार।
रविकर सुनता दिल लगा, हर खामोश पुकार।।

रखे व्यर्थ ही भींच के, मुट्ठी भाग्य लकीर।
कर ले दो दो हाथ तो, बदल जाय तकदीर।।

भँवर सरीखी जिंदगी, हाथ-पैर मत मार।
देह छोड़, दम साध के, होगा बेडा पार ।।

प्रश्न कभी गुत्थी कभी, कभी जिन्दगी ख्वाब।
सुलझा के साकार कर, रविकर खोज जवाब।।

लगे कठिन यदि जिंदगी, उसको दो आवाज।
करो नजर-अंदाज कुछ, बदलो कुछ अंदाज।।

गली गली गाओ नहीं, दिल का दर्द हुजूर।
घर घर मरहम तो नही, मिलता नमक जरूर।।

फूँक मारके दर्द का, मैया करे इलाज।
वह तो बच्चों के लिए, वैद्यों की सरताज।

खले मूढ़ की वाह तब, समझदार जब मौन।
काव्य शक्ति-सम्पन्न तो, कवि को भूले कौन।।

छलके अपनापन जहाँ, रविकर रहो सचेत।
छल के मौके भी वहीं, घातक घाव समेत।।

असफलता फलते फले, जारी रख संघर्ष।
दोनों ही तो श्रेष्ठ गुरु, कर वन्दना सहर्ष।।

रविकर यदि छोटा दिखे, नहीं दूर से घूर।
फिर भी यदि छोटा दिखे, रख दे दूर गरूर।।

जब से झोंकी आँख में, रविकर तुमने धूल।
अच्छे तुम लगने लगे, हर इक अदा कुबूल।।

भाषा वाणी व्याकरण, कलमदान बेचैन।
दिल से दिल की कह रहे, जब से प्यासे नैन।।

चक्षु-तराजू तौल के, भार बिना पासंग।
हल्कापन इन्सान का, देख देख हो दंग।।

अपने मुँह मिट्ठू बनें, किन्तु चूकता ढीठ।
नहीं ठोक पाया कभी, वह तो अपनी पीठ।।

बेमौसम ओले पड़े, चक्रवात तूफान।
धनी पकौड़ै खा रहे, खाये जहर किसान।।

अधिक मिले पहले मिले, किस्मत वक्त नकार।
इसी लालसा में गये, रविकर के दिन चार।।

रुतबा सत्ता ओहदा, गये समय की बात।
आज समय दिखला गया, उनको भी औकात।।

अन्य पराजय पीर दे, पराधीनता अन्य।
पतन स्वयं के दोष से, रह रविकर चैतन्य ।।

आँख न देखे आँख को, किन्तु कर्मरत संग |
संग-संग रोये-हँसे, भाये रविकर ढंग ||

चमके सुन्दर तन मगर, काले छुद्र विचार |
स्वर्ण-पात्र में ज्यों पड़ी, कीलें कई हजार ||

लेडी-डाक्टर खोजता, पत्नी प्रसव समीप।
बुझा बहन का जो चुका, रविकर शिक्षा-दीप।।

गिरे स्वास्थ्य दौलत गुमे, विद्या भूले भक्त।
मिले वक्त पर ये पुन:, मिले न खोया वक्त।।

वैसे तो टेढ़े चलें, कलम शराबी सर्प।
पर घर में सीधे घुसें, छोड़ नशा विष दर्प।।

चले शूल पर तो चुभा, जूते में बस एक।
पर उसूल पर जब चले, चुभते शूल अनेक।।

दीन कुटुम्बी से लिया, रविकर पल्ला झाड़।
खोले पल्ला गैर हित, गाँठ-गिरह को ताड़।।

अधिक मिले पहले मिले, किस्मत वक्त नकार।
इसी लालसा से व्यथित, रविकर यह संसार।।

चाहे जितना रंज हो, कसे तंज पर तंज।
किन्तु कभी मारे नहीं, अपनों को शतरंज।।

अनुभव का अनुमान से, हरदम तिगुना तेज।
फल बिखरे अनुमान का, अनुभव रखे सहेज।।

आतप-आफत में पड़ा, हीरा कॉच समान।
कॉच गर्म होता दिखा, हीरा-मन मुस्कान।

प्रतिभा प्रभु से प्राप्त हो, देता ख्याति समाज ।
मनोवृत्ति मद स्वयं से, रविकर आओ बाज।।

सराहना प्रेरित करे, आलोचना सुधार।
निंदक दो दर्जन रखो, किन्तु प्रशंसक चार।

होती पाँचो उँगलियाँ, कभी न एक समान।
मिलकर खाती हैं मगर, रिश्वत-धन पकवान ।।

दल के दलदल में फँसी, मुफ्तखोर जब भेड़ ।
सत्ता कम्बल बाँट दे, उसका ऊन उधेड़ ।।

रविकर रोने के लिए, मिले न कंधा एक।
चार चार कंधे मिले, बिलखें आज अनेक।।

चाय नही पानी नही, पीता अफसर आज।
किन्तु चाय-पानी बिना, करे न कोई काज।।

पहली कक्षा से सुना, बैठो तुम चुपचाप।
यही आज भी सुन रहा, शादी है या शाप।।

रहा तरस छह साल से, लगे निराशा हाथ |
दिखी आज आशा मगर, दो बच्चों के साथ ||

पूरे होंगे किस तरह, कहो अधूरे ख्वाब।
सो जा चादर तान के, देता चतुर जवाब।।

नहीं हड्डियां जीभ में, किन्तु शक्ति भरपूर |
तुड़वा सकती हड्डियाँ, सुन रविकर मगरूर ||

भेड़-चाल जनता चले, खले मुफ्त की मार।
सत्ता कम्बल बाँट दे, उनका ऊन उतार।।

धनी पकड़ ले बिस्तरा, भाग्य-विधाता क्रूर ।
ले वकील आये सगे, रखा चिकित्सक दूर।।

धर्म-कर्म पर जब चढ़े, अर्थ-काम का जिन्न |
मंदिर मस्जिद में खुलें, नए प्रकल्प विभिन्न ||

Sunday, 3 June 2018

चित्र-विचित्र

शुभ अवसर देता सदा, सूर्योदय रक्ताभ।
हो प्रसन्न सूर्यास्त यदि, उठा सके तुम लाभ।।

रविकर उफनाती नदी, उफनाता सद्-प्यार।
कच्चा घट लेकर करे, वो वैतरणी पार।।

सूर्य उगा प्रेमी मिले, आलिंगन मजबूत।
अस्ताचल को चल पड़े, आ पहुँचे यमदूत।।

जीवन की संजीवनी, हो हौंसला अदम्य |
दूर-दृष्टि, प्रभु की कृपा, पाए लक्ष्य अगम्य ॥

जीवन की संजीवनी, हो हौंसला अदम्य |
दूर-दृष्टि, प्रभु की कृपा, पाए लक्ष्य अगम्य ॥

वायु-अग्नि-क्षिति-जल-गगन, रविकर घट में डाल |
बनी नारि कमनीय रति, रहा अनंग सँभाल ||

कुण्डलियाँ 
तन सिसकार सकार ले, अंतिम पहर विछोह।
लेकिन मन माना नही, मनमाना सम्मोह।
मनमाना सम्मोह, रहे घट कैसे रीता।
व्याकुल तनमन प्राण, नदी तट पर परणीता।
परदेशी बेचैन, बड़े असमंजस में मन।
तन आलिंगनबद्ध, काटता रविकर वेतन।।

ख़ुशी ख़ुशी कर ख़ुदकुशी, खतम खलल खटराग |
मैं भी आता साथ में, चलो चले हम भाग |
चलो चले हम भाग, खाप पंचायत खेपी |
ऊँच-नीच का भेद, देख कर आत्मा झेपी |
मिली सोहनी देह, मरा महिवाल उसी पर |
सुन जालिम संसार, जुल्म तू ख़ुशी ख़ुशी कर ||



चित्र में ये शामिल हो सकता है: एक या अधिक लोग और लोग खड़े हैं

Thursday, 10 May 2018

मेरे गुरु जी : डॉ रूपचंद शास्त्री मयंक

ड्राफ्ट 
दोहा 
दुर्बल शाखा वृक्ष की, पर "गुरु-पर" पर नाज | 
कभी नहीं नीचे गिरे, उड़े खूब परवाज ||  

कुछ तो गुरु में ख़ास है, ईर्ष्या करते आम | 
वृक्ष देख फलदार वे, लेते पत्थर थाम ||

शब्द-शब्द में भाव का, समावेश उत्कृष्ट |
शिल्प देखते ही बने, हर रचना सारिष्ट ||

यूँ ही गुरुवर रचें , हितकारी साहित्य |
प्राणि-जगत को दे जगा, करे श्रेष्ठतम कृत्य |

[227343_214708791890181_100000531853131_786758_6697912_n.jpg]
 कुण्डलियाँ 
अपने अंतरजाल पर, इक पीपल का पेड़ ।
तोता-मैना बाज से, पक्षी जाते छेड़ ।
पक्षी जाते छेड़, बाज न फुदकी आती ।
उल्लू कौआ हंस, पपीहा कोयल गाती ।
पल-पल पीपल प्राण-वायु नहिं देता थमने ।
पाले बकरी गाय, गधे भी नीचे अपने ।

करे खटीमा में सदा, पुण्य-धार्मिक कार्य |
साहित्यिक परिवार यह, करे सकल उपचार |

करे सकल उपचार, भौतिकी दैहिक दैविक |
रहे अनुग्रह नित्य, एक है सबका मालिक |

रहे सुखी-सम्पन्न, बाँध ना पाती सीमा |
रहे कर्मरत आप, याद नित करे खटीमा ||
क्रमशः 

Wednesday, 2 May 2018

दोहे,

बत्ती कली सुबुद्धि जब, गुल हो जाय हुजूर।
चोर भ्रमर दीवानगी, मौज करें भरपूर।।
कलियों के सौंदर्य का, करे मधुप गुणगान।
गुल बनते ही वह कली, करे कैद ले जान।

तेज छात्र मैं मैथ का, करना कठिन प्रपोज़।
तुम हो मेरी प्रियतमा, करता रोज सपोज।।

बिजली गुल, गुल का नशा, और शोर-गुल तेज।
बाँट गुलबदन गुलगुला, सजी गुलगुली सेज।।

रास रचाई कल तलक, आज न आये रास।
बात बात पर दे करा, गर्मी का अहसास।।
गर मीसे अमिया पकी, नमक पुदीना नीर।
गरमी के अहसास से, तब हो मुक्त शरीर।।
अर्थ वन्दना के छले, खले धूप की गंध।
मदन बदन पर जो चढ़े, तोड़े हर कटिबंध।।
झूठ प्रफुल्लित हो रहा, आनंदित व्यभिचार।
सत्य बिछा के पाँवड़े, नीति करे सत्कार।।
दर्पण शुचिता-सादगी, से होकर के रुष्ट।
आडम्बर को कर रहा, दिन प्रति दिन सन्तुष्ट।।
है उत्तरदायित्व बिन, व्यर्थ ज्ञान भंडार।
वितरित कर जिज्ञासु को, कर खुद पर उपकार।।
मरती अपनी जिंदगी, कैसे अपने-आप।
उलटें जब वरदान सब, पलटें कुल अभिशाप।।
कुम्भकर्ण की जीभ पर, वागेश्वरी सवार।
करे निवेदन सुपनखा, देते राम नकार।।
सूर्पनखा सी नारि जब, रविकर खाये खार।
कुल पुलस्त्य पांडित्य का, करवाती संहार।।
वन्दनीय वन्दन करे, आराधन आराध्य।😊😊
तुनुकमिजाजी नारि की, है अन्यथा असाध्य।
ठंडा ठंडाई पिये, किन्तु व्यग्र सुकुमारि।
जब पति से मनभर लड़ी, तब ठंडाई नारि।
क्षमा माँगना वीरता, देना शक्ति प्रतीक।
रहें सुखी फिर भूलकर, रविकर सूक्ति सटीक।।
दर्पण शुचिता-सादगी, से होकर के रुष्ट।
आडम्बर को कर रहा, दिन प्रति दिन सन्तुष्ट।।
है उत्तरदायित्व बिन, व्यर्थ ज्ञान भंडार।
वितरित कर जिज्ञासु को, कर खुद पर उपकार।।
मरती अपनी जिंदगी, कैसे अपने-आप।
उलटें जब वरदान सब, पलटें कुल अभिशाप।।
लेकर हंड़िया इश्क की, चला गलाने दाल।
खाकर मन के गुलगुले, रहा बजाता गाल।।
समझ सके समझा सके, नहीं शब्द शब्दार्थ।
बढ़ा गए तब दूरियाँ, वे व्याख्या भावार्थ।।
संशोधित
समझ सके समझा सके, नहीं शब्द शब्दार्थ।
बढ़ा गए वे दूरियाँ, कर व्याख्या भावार्थ।।
सच्चाई वेश्या सरिस, मन तो लेती जीत।
अपनाता कोई नहीं, यद्यपि करते प्रीत।।
मर्दाना कमजोरियाँ, इश्तहार चहुँओर।😊😊
औरत को कमजोर कह, किन्तु हँसे मुँहचोर।।
सीधे-साधे को सदा, सीधे साधे व्यक्ति।
टेढ़े-मेढ़े को मगर, साधे रविकर शक्ति।।
बत्तिस तक मस्ती मगर, चालिस तक आश्वस्त।
पैतालिस जब पार हो, करे ताप-वय पस्त।
लात मारता पेट में, हँसकर सहती पीर।
लात मारता पेट पर, देती त्याग शरीर।।
सुख दुख जो तूने दिए, लूँ सप्रेम मैं स्वाद।
सुख में करता शुक्रिया, दुख में कर फरियाद।।
छह अंको में आय है, है संतुलित दिमाग ।
खाने वाली चाहिए, विज्ञापन अनुभाग !!
छह अंको में आय है, है संतुलित दिमाग ।
खाने वाली चाहिए, विज्ञापन अनुभाग !!
किस सांचे में तुम ढले, यौवन बढ़ता नित्य।
देह ढले हर दिन ढले, करूँ कौन मैं कृत्य।।
भार "तीय" का दे दबा, भारतीय बेहाल।
किन्तु "रती" तो फूल सी, रहा सहर्ष सँभाल।।
रविकर भोजन-भट्ट का, दिखा खीर से प्यार।
दो दो खीरा खा रहा, रा का हटा अकार।।
मृग-मरीचि की लालसा, घुटने पे दौड़ाय।
दम घुटने से अक्ल भी, घुटने में मर जाय।।
चीरहरण की पढ़ खबर, करें शहर जो बंद।
शीलहरण को देखकर, उठा रहे आनन्द।।
भावार्थ:
सुनी सुनाई पर करे, जो प्रतिक्रिया अनेक।
देख देख घटना घृणित, आँख रहे वे सेक।।
षडयंत्रों के गाँव मे, दिखे दाँव दर दाँव।
काँव-काँव से शीघ्र ही, लगा गूँजने गाँव।।
खाऊँ मैं मैदा नही, करूँ न मदिरा पान।
यही खेल-मैदान ही, मेरा धर्म-इमान।।
खाऊँ मैं "मैदा नही", खाऊँ पौष्टिक अन्न।
रखे खेल-"मैदान ही", रविकर मुझे प्रसन्न।।
बिन डगमग करते रहें, दो डग मग में कर्म।
गर्व नहीं अगला करे, पिछला करे न शर्म।
शहर ख्वाहिशों का बड़ा, रहा रात-दिन जाग।
पकड़ जरूरत की गली, छोड़ो भागमभाग।।
अब तो आजा बाज रे, मैदा खाना छोड़।
चने बेझड़े बाजरे, की रोटी बेजोड़।
गेहूं ने तो बीस में, बहुत दिखाया भाव।
अब बेझड में खुद मिले, रविकर ठंडा ताव।।
संशोधन
गेहूं ने तो बीस में, बहुत दिखाया भाव।
बेझड से इक्कीस में, करे भला बर्ताव।।
हर मियाद के दरमियाँ, प्यार खुशी आबाद।
जीने से जीवन बने, खो देने से याद।।
शब्द शब्द लेता समझ, रविकर ज्ञान अपार।
अर्थ हेतु लेकिन उसे, अनुभव की दरकार।
पति से लड़ने में उसे, आया जो आनन्द।
छोड़ दुआ-ताबीज वह, करे रोज छल-छन्द।।
दुविधा जिज्ञासा खुशी, शांति क्रोध भय युद्ध।
करे न पत्नी बात तो, अनुभव करें प्रबुद्ध।।
पति से लड़ने में मिले, अगर खुशी हर बार।
करे दुआ-ताबीज क्यों, क्यों न रहे तैयार।।
लगे बोझ यदि बुद्धि में, रहता रविकर ज्ञान।
किन्तु अगर व्यवहार में, हो आचरण समान।।
उतरा जब व्यवहार में, हुआ सफल तब ज्ञान।
मात्र बुद्धि में ही अगर, तो वह बोझ समान।
असफलता फलते फले, जारी रख संघर्ष।
दोनों ही गुरु श्रेष्ठ हैं, निश्चित है उत्कर्ष।।
शिशु के रोने पर हँसी, मैया पहली बार।
किन्तु पुनः इस मूल्य पर, हुई न वो तैयार।।
या
शिशु के रोने पर हँसी, मैया पहली बार।
किन्तु हँसी हित फिर रुदन, उसे नहीं स्वीकार।।
उधर तमन्ना रो उठी, इधर सिसकती पीर।
कहाँ करे फरियाद फिर, रविकर अधर अधीर।।
लगी "महान गरीयसी", सोच महानगरीय।
किन्तु महानगरीय दिल, की हालत दयनीय।।
उछल-उछल अट्टालिका, ले शहरों को घेर।
वायु-अग्नि-क्षिति-जल-गगन, आँखे रहे तरेर।।
सोते सूखे प्राकृतिक, भोजन डब्बा बंद।
करे शोरगुल शाँति गुल, सोते घण्टे चंद।।
सत्तरसाला नीम की, असहनीय अब पीर।
अंदर होती खोखली, बाहर बहता नीर।
सत्तरसाला मकबरा, चित्र उकेर उकेर।
गौ हलधर पंजा कमल, मचा रहे अंधेर।।
सत्तरसाला मकबरा, खुरच खुरच दीवाल।
छाप रहे पंजा कमल, बजा बजा के गाल।।
रही बेखुदी में कसक, खली बेरुखी खूब।
दे नकार सनकारना, गया सनक में डूब।।।😊
सम्पर्कों की सूचिका, लंबी-चौड़ी मित्र।
किन्तु शून्य सम्बद्धता, *यात्रा चित्र विचित्र।।
*जीवन यात्रा
रविकर विनय विवेक बिन, सब सद्गुण बेकार।
जिस भी चोटी पर चढो, ये उसके आधार।।
सिद्ध प्रतिज्ञा का करो, पितृ-भक्त औचित्य।
चीर-हरण अम्बा-मरण, लाक्षा-गृह दुष्कृत्य।।
खस की टट्टी खास हित, किन्तु खुले में आम।
या तो वे आँधी सहें, या तो काम-तमाम।।
रही बेखुदी में कसक, खली बेरुखी खूब।
व्यर्थ हुआ सनकारना, गया सनक में डूब।।।😊
सीते हा सीते किया, दिया शत्रु-मद तोड़।
फिर क्यों सीते ओंठ तुम, उस सीते को छोड़।।
साकी सा की प्रेम-छल, पिला पिला कुछ घूँट।
प्यास बढ़ाके प्रियतमा, ली तन मन धन लूट।।
संशोधित
प्यास नहीं रविकर बुझी, कर से प्याला छूट।
साकी सा की प्रेम-छल, ली तन मन धन लूट।।
😊
जगमग-जगमग तन रतन, गए पतंगे जूझ।
जल-जल कर मरते रहे, कारण किन्तु अबूझ।।
जहाँ धनात्मक सोच पर, सारे विष बेकार।
वहीं ऋणात्मक सोच पर, गई दवाएं हार।।
देख मुसीबत में तुझे, छोड़ गए जो मीत।
बड़ा भरोसा है उन्हें, होगी तेरी जीत।।
बराबरी पर वश नहीं, रविकर परवश लोग।
करे बुराई विविध-विधि, करें न बुद्धि प्रयोग।।
बराबरी पर वश नहीं, रविकर परवश मूढ़।
करे बुराई विविध-विधि, होकर ईर्ष्यारूढ़।।

Tuesday, 10 April 2018

चमत्कार हो कथ्य में, हो दोहे में धार-


उधर तमन्ना रो उठी, इधर सिसकती पीर।
कहाँ करे फरियाद फिर, रविकर अधर अधीर।।

लगी "महान गरीयसी", सोच महानगरीय।
किन्तु महानगरीय दिल, की हालत दयनीय।।

उछल-उछल अट्टालिका, ले शहरों को घेर।
वायु-अग्नि-क्षिति-जल-गगन, आँखे रहे तरेर।।

सोते सूखे प्राकृतिक, भोजन डब्बा बंद।
करे शोरगुल शाँति गुल, सोते घण्टे चंद।।

रही बेखुदी में कसक, खली बेरुखी खूब।
दे नकार सनकारना, गया सनक में डूब।।।😊

सम्पर्कों की सूचिका, लंबी-चौड़ी मित्र।
किन्तु शून्य सम्बद्धता, *यात्रा चित्र विचित्र।।
*जीवन यात्रा

रविकर विनय विवेक बिन, सब सद्गुण बेकार।
जिस भी चोटी पर चढो, ये उसके आधार।।

सिद्ध प्रतिज्ञा का करो, पितृ-भक्त औचित्य।
चीर-हरण अम्बा-मरण, लाक्षा-गृह दुष्कृत्य।।

खस की टट्टी खास हित, किन्तु खुले में आम।
या तो वे आँधी सहें, या तो काम-तमाम।।

रही बेखुदी में कसक, खली बेरुखी खूब।
व्यर्थ हुआ सनकारना, गया सनक में डूब।।।😊

सीते हा सीते किया, दिया शत्रु-मद तोड़।
फिर क्यों सीते ओंठ तुम, उस सीते को छोड़।।
प्यास नहीं रविकर बुझी, कर से प्याला छूट।
साकी सा की प्रेम-छल, ली तन मन धन लूट।।😊

जगमग-जगमग तन रतन, गए पतंगे जूझ।
जल-जल कर मरते रहे, कारण किन्तु अबूझ।।

जहाँ धनात्मक सोच पर, सारे विष बेकार।
वहीं ऋणात्मक सोच पर, गई दवाएं हार।।

देख मुसीबत में तुझे, छोड़ गए जो मीत।
बड़ा भरोसा है उन्हें, होगी तेरी जीत।।

बराबरी पर वश नहीं, रविकर परवश लोग।
करे बुराई विविध-विधि, करें न बुद्धि प्रयोग।।

बराबरी पर वश नहीं, रविकर परवश मूढ़।
करे बुराई विविध-विधि, होकर ईर्ष्यारूढ़।।
स्वर्ण-हिरण की लालसा, दी पति को दौड़ाय।
स्वर्ण-दुर्ग फिर क्यों नहीं, बिन पतिदेव सुहाय।।
लगा पकड़ने यंत्र जब, रविकर का सच-झूठ।
टूट गए सपने सकल, गए स्वजन सब रूठ ||
प्रभु से सबने पा रखी, दो पारखी निगाह।
समलोचना एक से, दे दूसरी सलाह।।।
दस दिन दौड़ाता रहा, आई जब लैट्रीन।
खा ली ग्राम-प्रधान ने, पी ली बोतल तीन ।।
चोर छात्र गुरु कवि नहीं, नहीं अँगूठा टेक।
"तौल कबाड़ी पुस्तकें", कहे समीक्षक नेक।।😊

ठोकर खाकर जब हुईं, चीजें चकनाचूर।
ठोकर खा तब आदमी, कामयाब भरपूर।।

तेरह- ग्यारह दीर्घ-लघु, यति-गति-लय बेकार।
चमत्कार हो कथ्य में, हो दोहे में धार।।

सुई सूत बिन व्यर्थ है, सूत्रधार बिन सूत।
काया-कथरी कब सिले, कब होगी मजबूत।।

कागज का गज लो सुमिर, रचो लोक हित छन्द।
छोड़-छाड़ छलछन्द छल, छको अमिय-मकरन्द।

जब सीखा था बोलना, रही उम्र दो साल।
किन्तु बोलना क्या किसे, सीख न पाया लाल।।

सकते में है जिंदगी, क्या कर सकते नेक।
जलसे में जल से करें, जब नंगे अभिषेक।।

परमात्मा दिखता नहीं, कहे सभी शंकालु।
जब कुछ भी सूझे नहीं, दिखते वही कृपालु।
रहें ख़्वाहिशों के सदा, आसमान पर भाव |
सस्ती खु़शियों से सदा, रविकर रखो लगाव ||

रविकर ख्वाहिश के सदा, आसमान पर भाव।
खुशियाँ तो सस्ती बिकें, फिर भी नहीं अघाव।।

रविकर ख्वाहिश के सदा, आसमान पर भाव।
किन्तु कभी मँहगा नहीं, खुशियाँ का बर्ताव।।

रविकर ख्वाहिश के सदा, आसमान पर भाव।
खुशियाँ तो सस्ती बिकें, एक टके में पाव।।

कंधे पर चढ़ बाप के, जो छूता आकाश।
उनको कंधा दे वही, करे जमीन तलाश।।

रोते-रोते आगमन, रुला-रुला प्रस्थान।
यही सत्य तो बाँटिये, नित्य हँसी-मुस्कान।।

Thursday, 22 March 2018

बुझी-बुझी आँखे लिए, ताके दुर्ग बुजुर्ग-

सह सकता सारे सितम, सुन सम्पूरक स्नेह।
किन्तु कृपा-करुणा-दया, सह न सके यह देह।।

इंद्रजाल पर भी किया, जो कल तक विश्वास।
उसे हकीकत भी नहीं, अब आती है रास।।

हौले हौले हौसले, हों प्रियतम के पस्त।
हो ली होली में प्रिया, भाँग छान अलमस्त।।

पहले कुल पत्ते झड़े, फिर गिरते फल-फूल।
पुन: यत्न करता शुरू, तरु विषाद-दुख भूल ।

चढ़े घमंड-शराब तो, जाने सकल जहान।
किन्तु चढ़े जिसपर नशा, वही दिखे अंजान।।

मियाँ प्राप्त प्रभुता करो, करो शुरू उत्पात।
धरो धरा पर क्यूँ कदम, करो हवा से बात।

दायें रखकर शून्य को, हुआ दस गुणित अंक।
सज्जन भी तो शून्य सम, दायें रखो निशंक।।

जी जी कर जीवन जिए, मर मर जीवन पार।
जो परहित जीवन जिए, पढ़ उनके उद्गार।।

मेहनत थककर चूर है, हुई बुद्धि नाकाम।
भाग्य दखल देने लगा, चलो बाँह लो थाम।।

भले मनुज भी कब भला, दिखे बनाते भीड़।
कई भले लेते बना, किन्तु भीड़ में नीड़।।

रविकर मरने का मिला, जब सु-प्रीम अधिकार।
कातिल नैनों का गिरा, भाव बीच बाजार।।

वे जब खोए ही नहीं, रहा उन्हें क्यों खोज ।
बहुत बदल वे तो गए, दिखें गली में रोज।।

रविकर वह बो कर चरस, करे जिंदगी झंड।
रहो होश में बोल कर, करती जुल्म प्रचंड।।
😊
आकांक्षा छूने चली, उछल उछल आकास |
लेकिन नखत प्रयास का, उड़ा रहे उपहास ।।

प्रश्न मोक्ष का है खड़ा, लेकर गजब तिलिस्म |
कई तीन-तेरह हुवे, सड़ता रविकर जिस्म||

सुनी सनाई बात पर , मत करना विश्वास |
अंतर-आत्मा जो कहे, वही सत्य-अहसास ||

धूप-हौसले से अगर, पिघले हिम-परवाह |
जल-प्रवाह में भी मिले, रविकर जीवन थाह ।।

शादी की संभावना, घटा गए उस्ताद।।
खुश रहने का दे गए, कल ही आशीर्वाद।
😊
बुझी-बुझी आँखे लिए, ताके दुर्ग बुजुर्ग।
बुर्ज-बुर्ज पे घर बने, घर घर में कुछ दुर्ग।।

बुरे वक्त में बुद्धि भी, रविकर चरती घास।
इसीलिए तो आदमी, सदा वक्त का दास।।

सागर सी कठिनाइयाँ, जामवंत आधार।
याद कराये शक्ति तो, पाते हनुमत पार।।

हँसी अश्रु धीरज क्षमा, सहनशीलता त्याग।
मिटी सकल कमजोरियाँ, शक्ति नारि की जाग।।

हरे, पनीले दृश्य दुख, हँसे शिशिर-हेमंत ।
अधर-गुलाबी रस भरे, पी ले पिया-बसंत॥

नजर-तराजू तौल दे, भार बिना पासंग।
हल्कापन इन्सान का, करे हमेशा दंग।।

दाम चुका दाम्पत्य का, अस्त-व्यस्त पति पस्त।
पीर लिखी तकदीर में, नैन-बैन से त्रस्त।।

चतुराई छलने लगे, ज्ञान बढ़ा दे दम्भ।
सोच भरे दुर्भाव तब, पतन होय प्रारम्भ।।

लसा लालसा लाल सा, कहीं नहीं मद-द्वेष।
मनके मनके खोज के, माला गूँथ विशेष।।

समय शब्द उपयोग में, दुनिया लापरवाह।
ये अवसर दे कब पुनः, रविकर सुनो सलाह।।

हवा चक्र हैंडिल धुरी, प्राण हस्त पद नैन।
चले सायकिल जिंदगी, किन्तु जरूरी चैन।।

प्रभु सुंदरता सोम में, रवि में प्रभु की शक्ति।
सुंदरतम कृति ईश की, है रविकर हर व्यक्ति।।

देरी में हामी भरें, जल्दी में इनकार।
रविकर यह आदत बुरी, कर ले शीघ्र सुधार।।

बिन गलती मांगी क्षमा, दिया कलह को टाल।
है रिश्ते की अहमियत, रविकर नहीं मलाल।।

Sunday, 25 February 2018

असफलता बोती रहे, नित्य सफलता बीज-

शुभ अवसर देता सदा, सूर्योदय रक्ताभ।
हो प्रसन्न सूर्यास्त यदि, उठा सके तुम लाभ।।

असफलता बोती रहे, नित्य सफलता बीज।
उगे बढ़े निश्चय फले, रे रविकर मत खीज।।

रविकर इच्छा स्वप्न का, यूँ मत करना खून।
बल्कि काट नाखून सम, पा ले खुशी सुकून।

रस्सी जैसी जिंदगी, तने तने हालात |
एक सिरे पे ख्वाहिशें, दूजे पे औकात ||

सकते में है जिंदगी, दिखे सिसकते लोग | 
भाग भगा सकते नहीं, आतंकी उद्योग ||

असफल जीवन पर हँसे, रविकर धूर्त समाज।
किन्तु सफलता पर यही, ईर्ष्या करता आज।।

है पहाड़ सी जिन्दगी, चोटी पर अरमान।
रविकर झुक के यदि चढ़ो, हो चढ़ना आसान।।

इम्तिहान है जिन्दगी, दुनिया विद्यापीठ।
मिले चरित्र उपाधि ज्यों, रंग बदलते ढीठ।।

छूकर निकली जिन्दगी, सिहरे रविकर लाश।
जख्म हरे फिर से हुए, फिर से शुरू तलाश।।

जी जी कर जीते रहे, जग जी का जंजाल।
जी जी कर मरते रहे, जीना हुआ मुहाल।।

लगे कठिन यदि जिंदगी, उसको दो आवाज।
करो नजर-अंदाज कुछ, बदलो कुछ अंदाज।।

दुख में जीने के लिए, तन मन जब तैयार।
छीन सके तब कौन सुख, रविकर से हरबार।।

जीवन की संजीवनी, हो हौंसला अदम्य |
दूर-दृष्टि, प्रभु की कृपा, पाए लक्ष्य अगम्य ॥

अस्त-व्यस्त यह जिन्दगी, रविकर रहा सँभाल।
डाल डाल खुशियाँ टंगी, पात पात जंजाल।।

चलो उड़ायें जिन्दगी, माँझा चकरी संग।
कटे नहीं काटो नहीं, रविकर कभी पतंग।।

भरा हुआ जब कण्ठ तक, छल-प्रपंच मल मैल।
तब सद्गुण का रायता, गया मेज पर फैल ||

तमस बुढ़ापा मौत से, हो जब दो-दो हाथ |
छाया, तन, धन छोड़ते, क्रमशः रविकर साथ ।।

भँवर सरीखी जिंदगी, हाथ-पैर मत मार।
देह छोड़, दम साध के, होगा बेडा पार ।।

चार दिनों की जिन्दगी, बिल्कुल स्वर्णिम स्वप्न।
स्वप्न टूटते ही लुटे, देह नेह धन रत्न।।

प्रश्न कभी गुत्थी कभी, कभी जिन्दगी ख्वाब।
सुलझा के साकार कर, रविकर खोज जवाब।

रोज़ खरीदे नोट से, रविकर मोटा माल।
किन्तु भाग्य को आँकता, सिक्का एक उछाल।।

लगे कठिन यदि जिंदगी, उसको दो आवाज।
करो नजर-अंदाज कुछ, बदलो कुछ अंदाज।।

चढ़े बदन पर जब मदन, बुद्धि भ्रष्ट हो जाय।
खजुराहो को देखते, चित्रकूट पगलाय।।

प्रश्न कभी गुत्थी कभी, कभी जिन्दगी ख्वाब।
सुलझा के साकार कर, खुद ही खोज जवाब।।

रखे व्यर्थ ही भींच के, मुट्ठी भाग्य-लकीर।
करे हथेली कर्म तो, बदल जाय तकदीर।।

चक्षु-तराजू तौल के, भार बिना पासंग।
हल्कापन इन्सान का, देख देख हो दंग।।

कई साल से गलतियाँ, रही कलेजा साल।
रविकर जब गुच्छा बना, अनुभव मिला कमाल।।

अनुभव का अनुमान से, हरदम तिगुना तेज।
फल बिखरे अनुमान का, अनुभव रखे सहेज।।

कशिश तमन्ना में रहे, कोशिश कर भरपूर।
लक्ष्य मिले अथवा नही, अनुभव मिले जरूर।।

छलके अपनापन जहाँ, रविकर रहो सचेत।
छल के मौके भी वहीं, घातक घाव समेत।।

रविकर यदि छोटा दिखे, नहीं दूर से घूर।
फिर भी यदि छोटा दिखे, रख दे दूर गरूर।।

पानी मथने से नहीं, निकले घी श्रीमान |
साधक-साधन-संक्रिया, ले सम्यक सामान ||

सत्य बसे मस्तिष्क में, होंठों पर मुस्कान।
दिल में बसे पवित्रता, तो जीवन आसान।।

खड्ग तीर चाकू चले, बरछी चले कटार।
कौन घाव गहरा करे, देखो ताना मार ।।

करो प्रार्थना या हँसो, दोनो क्रिया समान।
हँसा सको यदि अन्य को, देंगे प्रभु वरदान।।

आँख न देखे आँख को, किन्तु कर्मरत संग |
संग-संग रोये-हँसे, भाये रविकर ढंग ||

अच्छी आदत वक्त की, करता नहीं प्रलाप।
अच्छा हो चाहे बुरा, गुजर जाय चुपचाप।।

नींद शान्ति पानी हवा, साँस खुशी उजियार।
मुफ्तखोर लेकिन करें, महिमा अस्वीकार।।

सबको देता अहमियत, ले हाथों में हाथ।
बुरे सिखा जाते सबक, भले, भले दें साथ।।

गिरे स्वास्थ्य दौलत गुमे, विद्या भूले भक्त।
मिले वक्त पर ये पुन:, मिले न खोया वक्त।।

कभी सुधा तो विष कभी, मरहम कभी कटार।
आडम्बर फैला रहे, शब्द विभिन्न प्रकार।।

वैसे तो टेढ़े चलें, कलम शराबी सर्प।
पर घर में सीधे घुसें, छोड़ नशा विष दर्प।।

चाहे जितना रंज हो, कसे तंज पर तंज।
किन्तु कभी मारे नहीं, अपनों को शतरंज।।

प्रतिभा प्रभु से प्राप्त हो, देता ख्याति समाज ।
मनोवृत्ति मद स्वयं से, रविकर आओ बाज।।

सिया सती के साथ में, सियासती षडयंत्र।
रक्तबीज रावण बढ़े, मौन खड़ा गणतंत्र।।

रविकर क्यों खींचे भला, कोई लक्ष्मण रेख।
बाहर निकलो शौक से, बुरा-भला लो देख।।

कशिश तमन्ना में रहे, कर कोशिश भरपूर।
लक्ष्य मिले अथवा नहीं, अनुभव मिले जरूर।।

चतुर काग-कागज पढ़े, फिर कागज में काज।
कागज का गज अतिबली, कागज पूजो आज।।

कागज की कश्ती बना, चाहे बना जहाज।
कागज का गज ले सुमिर , होय सिद्ध हर काज।।

गुरु बिन मिले न मोक्ष सुन, रविकर करे कमाल।
गुरु-गुरूर लेता बढ़ा, बनता गुरु-घंटाल।

कहो नहीं कठिनाइयाँ, प्रभु से सुबहो-शाम।
कठिनाई को बोल दो, रविकर सँग हैं राम।।

क्षमा माँगना वीरता, देना शक्ति प्रतीक।
रहें सुखी फिर भूलकर, रविकर सूक्ति सटीक।।

गलती पर बक-बक सुना, किया सबक स्वीकार।
गया नहीं बेकार कुछ, हुआ तजुर्बेकार ।।

साँपनाथ को नेवला, दिया अभय वरदान।
नागनाथ को नाथ के, देता बदल विधान।।

पानी मथने से नहीं, निकले घी श्रीमान |
साधक-साधन-संक्रिया, ले सम्यक सामान ||

सत्य बसे मस्तिष्क में, होंठों पर मुस्कान।
दिल में बसे पवित्रता, तो जीवन आसान।।



खड्ग तीर चाकू चले, बरछी चले कटार।

कौन घाव गहरा करे, देखो ताना मार ।।

मार बुरे इंसान को, जिसकी है भरमार।
कर ले खुद से तू शुरू, सुधर जाय संसार।।

चमके सुन्दर तन मगर, काले छुद्र विचार |
स्वर्ण-पात्र में ज्यों पड़ी, कीलें कई हजार ||

सबको देता अहमियत, ले हाथों में हाथ।
बुरे सिखा जाते सबक, भले, भले दें साथ।।

शत्रु छिड़क देता नमक, मित्र छिड़कता जान।
बड़े काम का घाव प्रिय, हुई जान-पहचान।।

चाहे जितना रंज हो, कसे तंज पर तंज।
किन्तु कभी मारे नहीं, अपनों को शतरंज।।

आतप-आफत में पड़ा, हीरा कॉच समान।
कॉच गर्म होता दिखा, हीरा-मन मुस्कान।

कलमबद्ध हरदिन करें, वह रविकर के पाप।
किन्तु कभी रखते नहीं, इक ठो दर्पण आप।।

गम का ले अनुभव विकट, चलो तलाशें हर्ष।
करो भरोसा स्वयं पर, तब रविकर उत्कर्ष।।

कई साल से गलतियाँ, रही कलेजा साल।
रविकर जब गुच्छा बना, अनुभव मिला कमाल।।

नारि भूप गुरु अग्नि के, रह मत अधिक करीब।
रहमत की कर आरजू, जहमत लिखे नसीब।।

नारि भूप गुरु अग्नि के, रह मत अति नजदीक।
मध्यमार्ग से हो भला, बरसे रहमत नीक।

पड़े पुष्प प्रभु-पाद में, कण्ठ-माल से खिन्न।
सहे सुई की पीर जो, वो ही भक्त-अभिन्न।।

गारी चिंगारी गजब, दे जियरा सुलगाय।
गा री गोरी गीत तू , गम गुस्सा गुम जाय।।

शिल्पी-कृत बुत पूज्य हैं, स्वार्थी प्रभु-कृत मूर्ति।
शिल्पी-कृत करती दिखे, स्वार्थों की क्षतिपूर्ति।

बिन डगमग करते दिखे, दो डग मग में कर्म।
गर्व नहीं अगला करे, पिछला करे न शर्म।।

सज्जन तो पारा सरिस, परख न बारम्बार।
जाए बिन टूटे फिसल, बिन उगले उद्गार।।

हो रोमांचित जिन्दगी, नई चुनौती देख |
करके फिर जद्दो-जहद, खींचे लम्बी रेख ||

भरता भिक्षा-पात्र को, दानी बारम्बार।
लेकिन इच्छा-पात्र पर, दानवीर लाचार।।

है सामाजिक व्यक्ति का, सर्वोत्तम व्यायाम।
आगे झुककर ले उठा, रविकर पतित तमाम।

रखे सुरक्षित जर-जमीं, रविकर हर धनवान।
रक्षा किन्तु जुबान की, कभी नहीं आसान।।

जब गठिया पीड़ित पिता, जाते औषधि हेतु।
डॉगी को टहला रहा, तब सुत गाँधी सेतु।।

यदि दुख निन्दा अन्न सुख, पचे न अपने-आप।
बढ़े निराशा शत्रुता, क्रमश: चर्बी पाप ।।

अपनी गलती पर बने, रविकर अगर वकील।
जज बन के खारिज़ करे, पत्नी सभी दलील।।

प्रीति-पीर पर्वत सरिस, हिमनद सा नासूर।
रविकर की संजीवनी, रही दूर से घूर।।

जीवन-नौका तैरती, भव-सागर विस्तार।
लोभ-मोह सम द्वीप दस, रोक रहे पतवार।।

किया बुढ़ापे के लिए, जो लाठी तैयार।
मौका पाते ही गयी, वो तो सागर पार।

रविकर पल्ला झाड़ दे, देख दीन मेह`मान।
लेकिन पल्ला खोल दे, यदि आये धनवान।

इनके मोटे पेट से, उनका मद टकराय।
कैसे मिल पाएं गले, रविकर बता उपाय ।।

सरिता जैसी जिन्दगी, रास्ता रोके बाँध।
करो सिंचाई रोशनी, वर्ना बढ़े सड़ाँध।।

है पहाड़ सी जिन्दगी, हैं नाना व्यवधान।
रविकर झुक के यदि चढ़ो, होवे आत्मोत्थान।।

रस्सी जैसी जिन्दगी, तने तने हालात्।
एक सिरे पर ख्वाहिशें, दूजे पे औकात।।

है पहाड़ सी जिन्दगी, चोटी पर अरमान।
रविकर जो झुक के चढ़े, वो मारे मैदान ।।

है पहाड़ सी जिन्दगी, हैं नाना व्यवधान।
रविकर झुक के यदि चढ़ो, हो चढ़ना आसान।।

है पहाड़ सी जिन्दगी, फिसलन भरी ढलान।
सँभल सँभल झुक के चढ़ो, होगा आत्मोत्थान ।।

है पहाड़ सी जिन्दगी, देखो सीना तान।
लेकिन झुक कर के चढ़ो, भली करें भगवान।।

है पहाड़ सी जिन्दगी, हिमनद जंगल झील ।
मिले यहीं संजीवनी, यहीं मौत ले लील ।।

सच्चाई परनारि सी, मन को रही लुभाय।
किन्तु झूठ के साथ तन, धूनी रहा रमाय।।

मर्दाना कमजोरियाँ, इश्तहार चहुँओर।
औरत को कमजोर कह, किन्तु हँसे मुँहचोर।।

लेकर हंड़िया इश्क की, चला गलाने दाल।
खाकर मन के गुलगुले, लगा बजाने गाल।।

सीधे-साधे को सदा, सीधे साधे व्यक्ति।
टेढ़े-मेढ़े को मगर, साधे रविकर शक्ति।।

विषय-वासना विष सरिस, विषयांतर का मूल।
करने निकले हरि-भजन, रहे राह में झूल।।

जार जार रो, जा रही, रोजा में बाजार।
रोजाना गम खा रही, सही तलाक प्रहार।।

छलके अपनापन जहाँ, रविकर रहो सचेत।
छल के मौके भी वहीं, घातक घाव समेत।।

पल्ले पड़े न मूढ़ के, मरें नहीं सुविचार।
समझदार समझे सतत्, चिंतक धरे सुधार।।

चतुराई छलने लगे, ज्ञान बढ़ा दे दम्भ।
सोच भरे दुर्भाव तब, पतन होय प्रारम्भ।।

किस सांचे में तुम ढ़ले, जोबन बढ़ता जाय।
देह ढ़ले हर दिन ढ़ले, रविकर बता उपाय।।

पूरे होंगे किस तरह, कहो अधूरे ख्वाब। 
सो जा चादर तान के, रविकर दिया जवाब।।

क्वांरेपन से शेर है, रविकर अति खूंखार ।
किन्तु हुआ अब पालतू, दुर्गा हुई सवार।।

कइयों की कलई खुली, उड़ा कई का रंग।
हुई धुलाई न्याय की, घूमें मस्त मलंग।।

जी भर के कर प्यार तू, कह रविकर चितलाय।
जी भर के जब वह करे, उनका जी भर जाय।।
भय
रही अनिश्चितता डरा, रविकर डर धिक्कार।
कहो इसे रोमांच तो, करे व्यक्ति स्वीकार।।
ईर्ष्या
दूजे की अच्छाइयाँ, कौन करे स्वीकार।
बना सको यदि प्रेरणा, ईर्ष्या जाये हार।।
क्रोध
चीज नियंत्रण से परे, तो रविकर रिसियाय।
करे तथ्य मंजूर यदि, वह सहिष्णु कहलाय।।

बापू को कंधा दिया, बस्ता धरा उतार।
तेरह दिन में हो गया, रविकर जिम्मेदार।।

कर्तव्यों का निर्वहन, किया बहन का ब्याह।
भाई पैरों पर खड़ा, बदले किन्तु निगाह ।।

मैया ले आती बहू, पोती रही खिलाय।
खींचतान सहता रहा, सूझे नही उपाय।।

आँगन में दीवाल कर, बँधी खेत में मेड़।
पट्टीदारों से हुई, शुरू रोज मुठभेड़।।

खेत बेंच के कर लिया, रविकर जमा दहेज।
कल बिटिया का ब्याह है, आँसू रखे सहेज।।

शीघ्र गिरे दीवार वह, जिसमें पड़े दरार।
पड़ती रिश्तो में जहाँ, खड़ी करे दीवार।।

एक एक कण अन्न का, हर क्षण का आनन्द। 
कर ग्रहण रविकर सतत्, रख हौसले बुलन्द।।

करे शशक शक जीत पर, कछुवा छुवा लकीर।
छली गयी मछली जहाँ, मेढक ढकता नीर ।

 नारि भूप गुरु अग्नि के, रह मत अधिक करीब।
रहमत की कर आरजू, जहमत लिखे नसीब।।

सर्प व्याघ्र बालक सुअर, भूप मूर्ख पर-श्वान।
नहीं जगाओ नींद से, खा सकते ये जान।।

कठिन समस्या के मिलें, समाधान आसान।
परामर्शदाता शकुनि, किंवा कृष्ण महान।।

शिल्पी-कृत बुत पूज्य हैं, स्वार्थी प्रभु-कृत मूर्ति।
शिल्पी-कृत करती दिखे, स्वार्थों की क्षतिपूर्ति।

गारी चिंगारी गजब, दे जियरा सुलगाय।
गा री गोरी गीत तू , गम गुस्सा गुम जाय।।

भेड़-चाल में फिर फँसी, पड़ी मुफ्त की मार।
सत्ता कम्बल बाँट दे, उनका ऊन उतार।

पैसे पद से जो जुड़े, सुख मे ही वे साथ।
जुड़ वाणी व्यवहार से, ताकि न छूटे हाथ।।

आ जाये कोई नया, अथवा जाये छोड़।
बदल जाय तब जिंदगी, रविकर तीखे मोड़।।

नीम-करैले का चखे, बेमन स्वाद जुबान।
लेकिन खुद कड़ुवी जुबाँ, रही पकाती कान।।

अम्ल लवण मधु मिर्च तक, करे पसन्द जुबान।
किन्तु करैले नीम से, निकले रविकर जान।।

दिया दूसरों ने जनम, नाम, काम, सद्ज्ञान।
ले जायें शमशान भी, तू क्यों करे गुमान ।।

दनदनाय दौड़े मदन, चढ़े बदन पर जाय।
खजुराहो को देखकर, काशी भी पगलाय।।

कैसे कोई अन्न जल, कर सकता बरबाद।
संसाधन साझे सकल, रखना रविकर याद।।

शशि में सुंदरता दिखे, दिखे सूर्य में शक्ति।
सुंदरतम कृति ईश की, दर्पण में जो व्यक्ति।।

ठोस कदम ऐसा उठा, पुल में पड़ी दरार।
फूंक फूंक रविकर कदम, रखे राज्य सरकार।।

ढेर ज्ञान संग्रह किया, लेकिन रविकर व्यर्थ।
करे वरण कुछ आचरण, होगा तभी समर्थ।।

नहीं मिलें इक वक्त पर, कभी रुदन-मुस्कान |
जिस क्षण ये दोनों मिलें, वह क्षण प्रभु वरदान || 

सबक सिखाये जिन्दगी, रिश्ते मित्र किताब।
रविकर सच सबके सबक, सबका समझ हिसाब।।

सबक सिखाये जिन्दगी, पुस्तक रिश्ते मित्र ।
रविकर सच सबके सबक, सबके सबक विचित्र।।


श्रीमति से मति भिन्न यदि, घटे मान श्रीमान।
श्री भी होती खिन्न तब, छिन जाती मुस्कान।