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Monday, 30 October 2017

तलाशे घूर में रोटी, गरीबी व्यस्त रोजी में।-

तलाशे घूर में रोटी, गरीबी व्यस्त रोजी में।
अमीरी दूर से ताके डुबा कर रोटियाँ घी में।
प्रकट आभार प्रभु का कर, धनी वो हाथ फिर जोड़े।
गरीबी वाकई रविकर, कहीं का भी नहीं छोड़े।।

विचरते एक पागल को गरीबी दूर से ताकी।
कई पागल पड़े पीछे, बड़े बूढ़े नहीं बाकी।
प्रकट आभार प्रभु का कर, गरीबी फिर व्यथित होकर ।
कहे प्रभु से मुझे पागल बनाना मत कभी प्रभुवर।

गया पागल दवाखाने विविध रोगी वहाँ दीखें।
विविध बीमारियाँ घेरे, सुनाई पड़ रही चीखें।
ठिकाने होश आ जाते, कृपा प्रभु जी तुम्हारी है।
नहीं असहाय रोगी मैं, बड़ी शेखी बघारी है।

दिखी इक लाश ट्राली पर, नहीं बीमार घबराया ।
प्रकट आभार प्रभु का कर, मिली थी जो दवा खाया।
बड़े विश्वास से कहता, अभी तो आस बाकी है।
महज बीमार ही तो हूँ, अभी तो साँस बाकी है।

Sunday, 15 October 2017

मुक्तक

जद्दोजहद करती रही यह जिंदगी हरदिन मगर।
ना नींद ना कोई जरूरत पूर्ण होती मित्रवर।
अब खत्म होती हर जरूरत, नींद तेरा शुक्रिया
यह नींद टूटेगी नहीं, री जिंदगी तू मौजकर।।

व्यवहार घर का शुभ कलश, इंसानियत घर की तिजोरी।
मीठी जुबाँ धन-संपदा, तो शांति लक्ष्मी मातु मोरी।
पैसा सदा मेहमान सा, तो एकता ममता सरीखी।
शोभा व्यवस्था से दिखे , हल से खुशी क्या खूब दीखी।

कभी क्या वक्त रुकता है, घड़ी को बंद करने से ।
कभी क्या सत्य छुपता है, अनर्गल झूठ बकने से।
करोगे दान तो थोड़ा, रुपैया खर्च हो जाता।
मगर लक्ष्मी नहीं जाती, अपितु आनन्द-धन आता।।