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Wednesday, 19 June 2019

पैसों में गर्मी बहुत, रही जमाती धाक


नानी के घर ही नहीं, छुट्टी किया व्यतीत।
दादी के घर भी गया, तोड़ पुरातन रीत।।

प्यार एकतरफा जहाँ, पुष्पित होती चाह।
दोतरफे का हश्र तो, रविकर केवल व्याह।।😊

सदियों से रविकर बड़े, रहे बड़प्पन ओढ़।
अगर बिछाते तो कभी, उन्हें न होता कोढ़।।

हर साया घोषित करे, खुद को असली राम।
इंतजार रविकर करे, ताकि खत्म हो घाम।।

उतावलेपन पर लगा, अपने-आप लगाम।
सुबह-सुबह क्यों ला रहा, रविकर मादक शाम।।

पैसों में गर्मी बहुत, रही जमाती धाक।
रविकर रिश्तों को यही, करे जलाकर खाक।।

कूलर में कितने घड़े, डाल रहे जल आप।
सींचे होते पेड़ यदि, कभी न बढ़ता ताप।।


अजब मुहब्बत का गणित, दो से घटता एक।
बचे मात्र तब शून्य ही, हैं दृष्टांत अनेक।।

गलतफहमियों के भरे, किस्से कई हजार।
सोच यही हर ईंट की, मुझपर टिकी दिवार।।

चेहरे से करते प्रथम, रविकर परिचय प्राप्त।
वाणी कर्म विचार से, करते उसे समाप्त।।

सुनी न जाती चीख भी, ऐसा जब परिवेश।
व्यर्थ सीख साखी सहित, रविकर हर उपदेश।।
प्रियतम के मुस्कान की, देती कीमत बोल।
पर आँसू के मूल्य पर, करती टालमटोल ||

मुर्दे से बदतर दिखा, जीवन जोश-विहीन।
जो जीवन मदहोश वो, अंधे से भी दीन।।

मत पालो खुद शत्रुता, पा लो उच्चस्थान।
शत्रु मिलें खैरात में, हों पूरे अरमान।।

रविकर प्रायः गिफ्ट में, देता अपना वक्त।
वक्त नहीं, जीवन अपितु, करता सतत विभक्त।।

जिसके तन-मन से कभी, पा न सका वह पार |
चाहे उसकी रूह से, करना साक्षात्कार ||


😊😊
हाय- हाय री नौकरी, बिडम्बना भरपूर।
अपने घर जाना, करें, अब दूजे मंजूर।।

देह-पर्स में श्वांस-धन, दोनो करे गुमान।
दोनों किन्तु उधार के, सका न रविकर जान।।