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Friday, 7 October 2016

चिंता रहे छुपाय, पिताजी मिले विहँसकर-

हँसकर विद्यालय गई, घर आई चुपचाप |
देरी होती देख माँ, करती शुरू प्रलाप |
करती शुरू प्रलाप, देवता-देवि मनाये |
सभी लगाएं दौड़, थके-माँदे-घबराये |
मिलते ही मुस्कात, बहन माँ भाई रविकर |
चिंता रहे छुपाय, पिताजी मिले विहँसकर ||

2 comments:

  1. आपको सूचित करते हुए हर्ष हो रहा है कि- आपकी इस प्रविष्टि के लिंक की चर्चा कल शनिवार (08-10-2016) के चर्चा मंच "जय जय हे जगदम्बे" (चर्चा अंक-2489) पर भी होगी!
    शारदेय नवरात्रों की हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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