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Sunday, 13 August 2017

हथियार के सौदागरों यूँ खून तुम पीते रहो।

ग्राहक तुम्हें मिलते रहें, हर मौत के सामान के ।
व्यापार खुब फूले फले संग्राम बर्बर ठान के।
जब जर जमीं जोरू सरीखे मंद कारक हो गये।
तब युद्ध छेड़े जाति के कुछ धर्म के कुछ आन के।
विध्वंश हो होता रहे नुकसान मत रविकर सहो।।
हथियार के सौदागरों यूँ खून तुम पीते रहो।।

आदेश दे उपदेश दे हर देश का शासक सदा।
जनता भरे सैनिक मरे परिवार भोगे आपदा।
दुल्हन नई नवजात भी करता प्रतीक्षा अनवरत्
करते रहेंगे जिन्दगी भर युद्ध की कीमत अदा।
दस लाख देकर धन्य है इस देश का शासक अहो।
हथियार के सौदागरों यूँ खून तुम पीते रहो।।

7 comments:

  1. दिनांक 15/08/2017 को...
    आप की रचना का लिंक होगा...
    पांच लिंकों का आनंद पर...
    आप भी इस चर्चा में सादर आमंत्रित हैं...
    आप की प्रतीक्षा रहेगी...

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  2. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल मंगलवार (15-08-2017) को "भारत को करता हूँ शत्-शत् नमन" चर्चामंच 2697 पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट अक्सर नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    स्वतन्त्रता दिवस और श्रीकृष्ण जन्माष्टमी की
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  3. दस लाख देकर धन्य हैं देश के शासक अहो.....
    सटीक....
    लाजवाब।

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  4. उम्दा ! सत्य का अनावरण करती आपकी रचना ,आभार ''एकलव्य"

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  5. आदेश दे उपदेश दे हर देश का शासक सदा।
    जनता भरे सैनिक मरे परिवार भोगे आपदा।
    सटीक !

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