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Tuesday, 9 December 2014

हक़ है झक मारौ फिरौ, बिना झिझक दिन रात-

अ 
मन भर सोना देह पे, सोना घोड़ा बेंच । 
राम राज्य आ ही गया, जी ले तू बिन पेंच ।1। 

हक़ है झक मारौ फिरौ, बिना झिझक दिन रात |
लानत भेजौ पुलिस पर, गर कुछ घटै बलात |2। 

सब मर्जों की दवा है, पुलिस फ़ौज सरकार । 
 सावधान खुद क्यों रहें,  इसकी क्या दरकार।3| 

जीती बाजी बाज ने, नहीं आ रहा बाज |
नहीं लाज आती उसे, चला लूटता लाज || 4||


गर गरिष्ठ भोजन करे, बन्दा बिन उद्योग ।
अल्प आयु में ही मरे, नर्क यहीं पर भोग ॥१॥ 

तन में कम पानी भरे, मन में भरे फितूर ।
पथरी, कथरी, थरथरी, पानी चढ़े जरूर ।२॥ 

मोच रोक दे कदम को, दम को रोके सोच ।
सोच मोच से बुरी है, रखो  सोच में लोच॥३॥ 






2 comments:

  1. दोनों कुण्डलियाँ बहुत सार्थक और अर्थपूर्ण l
    विस्मित हूँ !

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