Follow by Email

Thursday, 5 February 2015

जब ताने में धार, व्यर्थ क्यों बेलन ताने

मेरी टिप्पणियां 
(२)
ताने बेलन देख के, तनी-मनी घबराय  |
पर ताने मारक अधिक, सुने जिया ना जाय |
सुने जिया ना जाय, खाय ले मन का चैना |
रविकर गया अघाय, खाय के चना च बैना |
मनमाने व्यवहार, नहीं ब्रह्मा भी जाने |
जब ताने में धार, व्यर्थ क्यों बेलन ताने || 
(१)
सिहरे रविकर तन-बदन, भयकारी यह चित्र |
चिमटा बेलन तवा का, नाम न लीजै मित्र |
नाम न लीजै मित्र, हृदय कमजोर हमारा |
वो तो बड़ी विचित्र, रोज चढ़ जाता पारा |
अभी हमारी मौज, गई जो बीबी पिहरे | 
पढूं आप का काव्य, बदन रह रह कर सिहरे ||

दोहे 
खोटे सिक्के चल रहे, गजब तेज रफ़्तार |

गया जमाना यूँ बदल, अब इक्के बेकार || 

10 comments:

  1. आपकी यह उत्कृष्ट प्रस्तुति कल शुक्रवार (06.02.2015) को "चुनावी बिगुल" (चर्चा अंक-1881)" पर लिंक की गयी है, कृपया पधारें और अपने विचारों से अवगत करायें, चर्चा मंच पर आपका स्वागत है।

    ReplyDelete
  2. सुन्दर शब्द रचना
    http://savanxxx.blogspot.in

    ReplyDelete
  3. your writing skills and thoughts are heart touching keep it up dear
    our blog portal is http://www.nvrthub.com

    ReplyDelete
  4. बहुत ही बढ़िया !

    ReplyDelete
  5. वाह बहुत सुन्दर रचनाएँ ।

    ReplyDelete
  6. मनमाने व्यवहार, नहीं ब्रह्मा भी जाने |
    जब ताने में धार, व्यर्थ क्यों बेलन ताने |
    अच्छी सार्थक प्रस्तुति

    ReplyDelete
  7. Nice Article sir, Keep Going on... I am really impressed by read this. Thanks for sharing with us.. Happy Independence Day 2015, Latest Government Jobs.

    ReplyDelete