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Thursday, 22 September 2016

अपराध ये करता रहा

हो सर्व-व्यापी किन्तु मैं तो खोजता-फिरता रहा।
तुम शब्द से भी हो परे पर नाम मैं धरता रहा ।
हो सर्व ज्ञाता किन्तु इच्छा मैं प्रकट करता रहा।
अपराध ये करता रहा पर कष्ट तू हरता रहा।।

4 comments:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शनिवार (24-09-2016) को "जागो मोहन प्यारे" (चर्चा अंक-2475) पर भी होगी।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट अक्सर नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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