Follow by Email

Sunday, 25 February 2018

असफलता बोती रहे, नित्य सफलता बीज-

शुभ अवसर देता सदा, सूर्योदय रक्ताभ।
हो प्रसन्न सूर्यास्त यदि, उठा सके तुम लाभ।।

असफलता बोती रहे, नित्य सफलता बीज।
उगे बढ़े निश्चय फले, रे रविकर मत खीज।।

रविकर इच्छा स्वप्न का, यूँ मत करना खून।
बल्कि काट नाखून सम, पा ले खुशी सुकून।

रस्सी जैसी जिंदगी, तने तने हालात |
एक सिरे पे ख्वाहिशें, दूजे पे औकात ||

सकते में है जिंदगी, दिखे सिसकते लोग | 
भाग भगा सकते नहीं, आतंकी उद्योग ||

असफल जीवन पर हँसे, रविकर धूर्त समाज।
किन्तु सफलता पर यही, ईर्ष्या करता आज।।

है पहाड़ सी जिन्दगी, चोटी पर अरमान।
रविकर झुक के यदि चढ़ो, हो चढ़ना आसान।।

इम्तिहान है जिन्दगी, दुनिया विद्यापीठ।
मिले चरित्र उपाधि ज्यों, रंग बदलते ढीठ।।

छूकर निकली जिन्दगी, सिहरे रविकर लाश।
जख्म हरे फिर से हुए, फिर से शुरू तलाश।।

जी जी कर जीते रहे, जग जी का जंजाल।
जी जी कर मरते रहे, जीना हुआ मुहाल।।

लगे कठिन यदि जिंदगी, उसको दो आवाज।
करो नजर-अंदाज कुछ, बदलो कुछ अंदाज।।

दुख में जीने के लिए, तन मन जब तैयार।
छीन सके तब कौन सुख, रविकर से हरबार।।

जीवन की संजीवनी, हो हौंसला अदम्य |
दूर-दृष्टि, प्रभु की कृपा, पाए लक्ष्य अगम्य ॥

अस्त-व्यस्त यह जिन्दगी, रविकर रहा सँभाल।
डाल डाल खुशियाँ टंगी, पात पात जंजाल।।

चलो उड़ायें जिन्दगी, माँझा चकरी संग।
कटे नहीं काटो नहीं, रविकर कभी पतंग।।

भरा हुआ जब कण्ठ तक, छल-प्रपंच मल मैल।
तब सद्गुण का रायता, गया मेज पर फैल ||

तमस बुढ़ापा मौत से, हो जब दो-दो हाथ |
छाया, तन, धन छोड़ते, क्रमशः रविकर साथ ।।

भँवर सरीखी जिंदगी, हाथ-पैर मत मार।
देह छोड़, दम साध के, होगा बेडा पार ।।

चार दिनों की जिन्दगी, बिल्कुल स्वर्णिम स्वप्न।
स्वप्न टूटते ही लुटे, देह नेह धन रत्न।।

प्रश्न कभी गुत्थी कभी, कभी जिन्दगी ख्वाब।
सुलझा के साकार कर, रविकर खोज जवाब।

रोज़ खरीदे नोट से, रविकर मोटा माल।
किन्तु भाग्य को आँकता, सिक्का एक उछाल।।

लगे कठिन यदि जिंदगी, उसको दो आवाज।
करो नजर-अंदाज कुछ, बदलो कुछ अंदाज।।

चढ़े बदन पर जब मदन, बुद्धि भ्रष्ट हो जाय।
खजुराहो को देखते, चित्रकूट पगलाय।।

प्रश्न कभी गुत्थी कभी, कभी जिन्दगी ख्वाब।
सुलझा के साकार कर, खुद ही खोज जवाब।।

रखे व्यर्थ ही भींच के, मुट्ठी भाग्य-लकीर।
करे हथेली कर्म तो, बदल जाय तकदीर।।

चक्षु-तराजू तौल के, भार बिना पासंग।
हल्कापन इन्सान का, देख देख हो दंग।।

कई साल से गलतियाँ, रही कलेजा साल।
रविकर जब गुच्छा बना, अनुभव मिला कमाल।।

अनुभव का अनुमान से, हरदम तिगुना तेज।
फल बिखरे अनुमान का, अनुभव रखे सहेज।।

कशिश तमन्ना में रहे, कोशिश कर भरपूर।
लक्ष्य मिले अथवा नही, अनुभव मिले जरूर।।

छलके अपनापन जहाँ, रविकर रहो सचेत।
छल के मौके भी वहीं, घातक घाव समेत।।

रविकर यदि छोटा दिखे, नहीं दूर से घूर।
फिर भी यदि छोटा दिखे, रख दे दूर गरूर।।

पानी मथने से नहीं, निकले घी श्रीमान |
साधक-साधन-संक्रिया, ले सम्यक सामान ||

सत्य बसे मस्तिष्क में, होंठों पर मुस्कान।
दिल में बसे पवित्रता, तो जीवन आसान।।

खड्ग तीर चाकू चले, बरछी चले कटार।
कौन घाव गहरा करे, देखो ताना मार ।।

करो प्रार्थना या हँसो, दोनो क्रिया समान।
हँसा सको यदि अन्य को, देंगे प्रभु वरदान।।

आँख न देखे आँख को, किन्तु कर्मरत संग |
संग-संग रोये-हँसे, भाये रविकर ढंग ||

अच्छी आदत वक्त की, करता नहीं प्रलाप।
अच्छा हो चाहे बुरा, गुजर जाय चुपचाप।।

नींद शान्ति पानी हवा, साँस खुशी उजियार।
मुफ्तखोर लेकिन करें, महिमा अस्वीकार।।

सबको देता अहमियत, ले हाथों में हाथ।
बुरे सिखा जाते सबक, भले, भले दें साथ।।

गिरे स्वास्थ्य दौलत गुमे, विद्या भूले भक्त।
मिले वक्त पर ये पुन:, मिले न खोया वक्त।।

कभी सुधा तो विष कभी, मरहम कभी कटार।
आडम्बर फैला रहे, शब्द विभिन्न प्रकार।।

वैसे तो टेढ़े चलें, कलम शराबी सर्प।
पर घर में सीधे घुसें, छोड़ नशा विष दर्प।।

चाहे जितना रंज हो, कसे तंज पर तंज।
किन्तु कभी मारे नहीं, अपनों को शतरंज।।

प्रतिभा प्रभु से प्राप्त हो, देता ख्याति समाज ।
मनोवृत्ति मद स्वयं से, रविकर आओ बाज।।

सिया सती के साथ में, सियासती षडयंत्र।
रक्तबीज रावण बढ़े, मौन खड़ा गणतंत्र।।

रविकर क्यों खींचे भला, कोई लक्ष्मण रेख।
बाहर निकलो शौक से, बुरा-भला लो देख।।

कशिश तमन्ना में रहे, कर कोशिश भरपूर।
लक्ष्य मिले अथवा नहीं, अनुभव मिले जरूर।।

चतुर काग-कागज पढ़े, फिर कागज में काज।
कागज का गज अतिबली, कागज पूजो आज।।

कागज की कश्ती बना, चाहे बना जहाज।
कागज का गज ले सुमिर , होय सिद्ध हर काज।।

गुरु बिन मिले न मोक्ष सुन, रविकर करे कमाल।
गुरु-गुरूर लेता बढ़ा, बनता गुरु-घंटाल।

कहो नहीं कठिनाइयाँ, प्रभु से सुबहो-शाम।
कठिनाई को बोल दो, रविकर सँग हैं राम।।

क्षमा माँगना वीरता, देना शक्ति प्रतीक।
रहें सुखी फिर भूलकर, रविकर सूक्ति सटीक।।

गलती पर बक-बक सुना, किया सबक स्वीकार।
गया नहीं बेकार कुछ, हुआ तजुर्बेकार ।।

साँपनाथ को नेवला, दिया अभय वरदान।
नागनाथ को नाथ के, देता बदल विधान।।

पानी मथने से नहीं, निकले घी श्रीमान |
साधक-साधन-संक्रिया, ले सम्यक सामान ||

सत्य बसे मस्तिष्क में, होंठों पर मुस्कान।
दिल में बसे पवित्रता, तो जीवन आसान।।



खड्ग तीर चाकू चले, बरछी चले कटार।

कौन घाव गहरा करे, देखो ताना मार ।।

मार बुरे इंसान को, जिसकी है भरमार।
कर ले खुद से तू शुरू, सुधर जाय संसार।।

चमके सुन्दर तन मगर, काले छुद्र विचार |
स्वर्ण-पात्र में ज्यों पड़ी, कीलें कई हजार ||

सबको देता अहमियत, ले हाथों में हाथ।
बुरे सिखा जाते सबक, भले, भले दें साथ।।

शत्रु छिड़क देता नमक, मित्र छिड़कता जान।
बड़े काम का घाव प्रिय, हुई जान-पहचान।।

चाहे जितना रंज हो, कसे तंज पर तंज।
किन्तु कभी मारे नहीं, अपनों को शतरंज।।

आतप-आफत में पड़ा, हीरा कॉच समान।
कॉच गर्म होता दिखा, हीरा-मन मुस्कान।

कलमबद्ध हरदिन करें, वह रविकर के पाप।
किन्तु कभी रखते नहीं, इक ठो दर्पण आप।।

गम का ले अनुभव विकट, चलो तलाशें हर्ष।
करो भरोसा स्वयं पर, तब रविकर उत्कर्ष।।

कई साल से गलतियाँ, रही कलेजा साल।
रविकर जब गुच्छा बना, अनुभव मिला कमाल।।

नारि भूप गुरु अग्नि के, रह मत अधिक करीब।
रहमत की कर आरजू, जहमत लिखे नसीब।।

नारि भूप गुरु अग्नि के, रह मत अति नजदीक।
मध्यमार्ग से हो भला, बरसे रहमत नीक।

पड़े पुष्प प्रभु-पाद में, कण्ठ-माल से खिन्न।
सहे सुई की पीर जो, वो ही भक्त-अभिन्न।।

गारी चिंगारी गजब, दे जियरा सुलगाय।
गा री गोरी गीत तू , गम गुस्सा गुम जाय।।

शिल्पी-कृत बुत पूज्य हैं, स्वार्थी प्रभु-कृत मूर्ति।
शिल्पी-कृत करती दिखे, स्वार्थों की क्षतिपूर्ति।

बिन डगमग करते दिखे, दो डग मग में कर्म।
गर्व नहीं अगला करे, पिछला करे न शर्म।।

सज्जन तो पारा सरिस, परख न बारम्बार।
जाए बिन टूटे फिसल, बिन उगले उद्गार।।

हो रोमांचित जिन्दगी, नई चुनौती देख |
करके फिर जद्दो-जहद, खींचे लम्बी रेख ||

भरता भिक्षा-पात्र को, दानी बारम्बार।
लेकिन इच्छा-पात्र पर, दानवीर लाचार।।

है सामाजिक व्यक्ति का, सर्वोत्तम व्यायाम।
आगे झुककर ले उठा, रविकर पतित तमाम।

रखे सुरक्षित जर-जमीं, रविकर हर धनवान।
रक्षा किन्तु जुबान की, कभी नहीं आसान।।

जब गठिया पीड़ित पिता, जाते औषधि हेतु।
डॉगी को टहला रहा, तब सुत गाँधी सेतु।।

यदि दुख निन्दा अन्न सुख, पचे न अपने-आप।
बढ़े निराशा शत्रुता, क्रमश: चर्बी पाप ।।

अपनी गलती पर बने, रविकर अगर वकील।
जज बन के खारिज़ करे, पत्नी सभी दलील।।

प्रीति-पीर पर्वत सरिस, हिमनद सा नासूर।
रविकर की संजीवनी, रही दूर से घूर।।

जीवन-नौका तैरती, भव-सागर विस्तार।
लोभ-मोह सम द्वीप दस, रोक रहे पतवार।।

किया बुढ़ापे के लिए, जो लाठी तैयार।
मौका पाते ही गयी, वो तो सागर पार।

रविकर पल्ला झाड़ दे, देख दीन मेह`मान।
लेकिन पल्ला खोल दे, यदि आये धनवान।

इनके मोटे पेट से, उनका मद टकराय।
कैसे मिल पाएं गले, रविकर बता उपाय ।।

सरिता जैसी जिन्दगी, रास्ता रोके बाँध।
करो सिंचाई रोशनी, वर्ना बढ़े सड़ाँध।।

है पहाड़ सी जिन्दगी, हैं नाना व्यवधान।
रविकर झुक के यदि चढ़ो, होवे आत्मोत्थान।।

रस्सी जैसी जिन्दगी, तने तने हालात्।
एक सिरे पर ख्वाहिशें, दूजे पे औकात।।

है पहाड़ सी जिन्दगी, चोटी पर अरमान।
रविकर जो झुक के चढ़े, वो मारे मैदान ।।

है पहाड़ सी जिन्दगी, हैं नाना व्यवधान।
रविकर झुक के यदि चढ़ो, हो चढ़ना आसान।।

है पहाड़ सी जिन्दगी, फिसलन भरी ढलान।
सँभल सँभल झुक के चढ़ो, होगा आत्मोत्थान ।।

है पहाड़ सी जिन्दगी, देखो सीना तान।
लेकिन झुक कर के चढ़ो, भली करें भगवान।।

है पहाड़ सी जिन्दगी, हिमनद जंगल झील ।
मिले यहीं संजीवनी, यहीं मौत ले लील ।।

सच्चाई परनारि सी, मन को रही लुभाय।
किन्तु झूठ के साथ तन, धूनी रहा रमाय।।

मर्दाना कमजोरियाँ, इश्तहार चहुँओर।
औरत को कमजोर कह, किन्तु हँसे मुँहचोर।।

लेकर हंड़िया इश्क की, चला गलाने दाल।
खाकर मन के गुलगुले, लगा बजाने गाल।।

सीधे-साधे को सदा, सीधे साधे व्यक्ति।
टेढ़े-मेढ़े को मगर, साधे रविकर शक्ति।।

विषय-वासना विष सरिस, विषयांतर का मूल।
करने निकले हरि-भजन, रहे राह में झूल।।

जार जार रो, जा रही, रोजा में बाजार।
रोजाना गम खा रही, सही तलाक प्रहार।।

छलके अपनापन जहाँ, रविकर रहो सचेत।
छल के मौके भी वहीं, घातक घाव समेत।।

पल्ले पड़े न मूढ़ के, मरें नहीं सुविचार।
समझदार समझे सतत्, चिंतक धरे सुधार।।

चतुराई छलने लगे, ज्ञान बढ़ा दे दम्भ।
सोच भरे दुर्भाव तब, पतन होय प्रारम्भ।।

किस सांचे में तुम ढ़ले, जोबन बढ़ता जाय।
देह ढ़ले हर दिन ढ़ले, रविकर बता उपाय।।

पूरे होंगे किस तरह, कहो अधूरे ख्वाब। 
सो जा चादर तान के, रविकर दिया जवाब।।

क्वांरेपन से शेर है, रविकर अति खूंखार ।
किन्तु हुआ अब पालतू, दुर्गा हुई सवार।।

कइयों की कलई खुली, उड़ा कई का रंग।
हुई धुलाई न्याय की, घूमें मस्त मलंग।।

जी भर के कर प्यार तू, कह रविकर चितलाय।
जी भर के जब वह करे, उनका जी भर जाय।।
भय
रही अनिश्चितता डरा, रविकर डर धिक्कार।
कहो इसे रोमांच तो, करे व्यक्ति स्वीकार।।
ईर्ष्या
दूजे की अच्छाइयाँ, कौन करे स्वीकार।
बना सको यदि प्रेरणा, ईर्ष्या जाये हार।।
क्रोध
चीज नियंत्रण से परे, तो रविकर रिसियाय।
करे तथ्य मंजूर यदि, वह सहिष्णु कहलाय।।

बापू को कंधा दिया, बस्ता धरा उतार।
तेरह दिन में हो गया, रविकर जिम्मेदार।।

कर्तव्यों का निर्वहन, किया बहन का ब्याह।
भाई पैरों पर खड़ा, बदले किन्तु निगाह ।।

मैया ले आती बहू, पोती रही खिलाय।
खींचतान सहता रहा, सूझे नही उपाय।।

आँगन में दीवाल कर, बँधी खेत में मेड़।
पट्टीदारों से हुई, शुरू रोज मुठभेड़।।

खेत बेंच के कर लिया, रविकर जमा दहेज।
कल बिटिया का ब्याह है, आँसू रखे सहेज।।

शीघ्र गिरे दीवार वह, जिसमें पड़े दरार।
पड़ती रिश्तो में जहाँ, खड़ी करे दीवार।।

एक एक कण अन्न का, हर क्षण का आनन्द। 
कर ग्रहण रविकर सतत्, रख हौसले बुलन्द।।

करे शशक शक जीत पर, कछुवा छुवा लकीर।
छली गयी मछली जहाँ, मेढक ढकता नीर ।

 नारि भूप गुरु अग्नि के, रह मत अधिक करीब।
रहमत की कर आरजू, जहमत लिखे नसीब।।

सर्प व्याघ्र बालक सुअर, भूप मूर्ख पर-श्वान।
नहीं जगाओ नींद से, खा सकते ये जान।।

कठिन समस्या के मिलें, समाधान आसान।
परामर्शदाता शकुनि, किंवा कृष्ण महान।।

शिल्पी-कृत बुत पूज्य हैं, स्वार्थी प्रभु-कृत मूर्ति।
शिल्पी-कृत करती दिखे, स्वार्थों की क्षतिपूर्ति।

गारी चिंगारी गजब, दे जियरा सुलगाय।
गा री गोरी गीत तू , गम गुस्सा गुम जाय।।

भेड़-चाल में फिर फँसी, पड़ी मुफ्त की मार।
सत्ता कम्बल बाँट दे, उनका ऊन उतार।

पैसे पद से जो जुड़े, सुख मे ही वे साथ।
जुड़ वाणी व्यवहार से, ताकि न छूटे हाथ।।

आ जाये कोई नया, अथवा जाये छोड़।
बदल जाय तब जिंदगी, रविकर तीखे मोड़।।

नीम-करैले का चखे, बेमन स्वाद जुबान।
लेकिन खुद कड़ुवी जुबाँ, रही पकाती कान।।

अम्ल लवण मधु मिर्च तक, करे पसन्द जुबान।
किन्तु करैले नीम से, निकले रविकर जान।।

दिया दूसरों ने जनम, नाम, काम, सद्ज्ञान।
ले जायें शमशान भी, तू क्यों करे गुमान ।।

दनदनाय दौड़े मदन, चढ़े बदन पर जाय।
खजुराहो को देखकर, काशी भी पगलाय।।

कैसे कोई अन्न जल, कर सकता बरबाद।
संसाधन साझे सकल, रखना रविकर याद।।

शशि में सुंदरता दिखे, दिखे सूर्य में शक्ति।
सुंदरतम कृति ईश की, दर्पण में जो व्यक्ति।।

ठोस कदम ऐसा उठा, पुल में पड़ी दरार।
फूंक फूंक रविकर कदम, रखे राज्य सरकार।।

ढेर ज्ञान संग्रह किया, लेकिन रविकर व्यर्थ।
करे वरण कुछ आचरण, होगा तभी समर्थ।।

नहीं मिलें इक वक्त पर, कभी रुदन-मुस्कान |
जिस क्षण ये दोनों मिलें, वह क्षण प्रभु वरदान || 

सबक सिखाये जिन्दगी, रिश्ते मित्र किताब।
रविकर सच सबके सबक, सबका समझ हिसाब।।

सबक सिखाये जिन्दगी, पुस्तक रिश्ते मित्र ।
रविकर सच सबके सबक, सबके सबक विचित्र।।


श्रीमति से मति भिन्न यदि, घटे मान श्रीमान।
श्री भी होती खिन्न तब, छिन जाती मुस्कान।

4 comments:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल बुधवार (28-02-2018) को ) "होली के ये रंग" (चर्चा अंक-2895) पर भी होगी।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    राधा तिवारी

    ReplyDelete
  2. जिंदगी जीने का निचोड़ है ये दोहे

    ReplyDelete
  3. निमंत्रण

    विशेष : 'सोमवार' १९ मार्च २०१८ को 'लोकतंत्र' संवाद मंच अपने सोमवारीय साप्ताहिक अंक में आदरणीया 'पुष्पा' मेहरा और आदरणीया 'विभारानी' श्रीवास्तव जी से आपका परिचय करवाने जा रहा है।

    अतः 'लोकतंत्र' संवाद मंच आप सभी का स्वागत करता है। धन्यवाद "एकलव्य" https://loktantrasanvad.blogspot.in/

    ReplyDelete