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Tuesday, 13 March 2012

नहीं तनिक संयम, बनाए सबको भोगी -


चश्मे चेहरे पर चढ़े, हिले मूल के चूल |
दोष सहित भाये मनुज, मूल प्रकृती भूल ||



रंग अंग प्रत्यंग के, विश्लेषण से दंग ।
पाश्चात्य खुद नंग है, करे शान्ती भंग ।

 करे शान्ती भंग, तंग यह दुनिया होगी ।
नहीं तनिक संयम, बनाए सबको भोगी ।

घाव हरे कर लाल, लोटता डगर गुलाबी ।
काला करे भविष्य, ताकता पश्चिम लाबी ।।

यार तुम मिलो तो सही
Pen has it's own language....... 
इन्तजार की इन्तिहा, इम्तिहान इतराय ।
मिलो यार अब तो सही, विरह सही न जाय ।।
 
 अंकुश हटता बुद्धि से, भला लगे *भकराँध । 
 भूले भक्ष्याभक्ष्य जब, भावे विकट सडांध ।


भावे विकट सडांध, विसारे देह  देहरी ।
टूटे लज्जा बाँध, औंध नाली में पसरी ।।


नशा उतर जब जाय, होय खुद से वह नाखुश ।
   कान पकड़ उठ-बैठ, हटे फिर संध्या अंकुश ।।
*सड़ा हुआ अन्न

सदाबहार बौराए हुए !
बैसवारी baiswari 

मन की साथी आत्मा, जाओ तन को भूल ।
  तृप्त होय जब आत्मा, क्यूँ तन खता क़ुबूल ?

क्यूँ तन खता  क़ुबूल, उमरिया बढती जाए ।
नहीं आत्मा क्षरण, सुन्दरी मन बहलाए ।

  बुड्ढा होय अशक्त,  आत्मा भटका हाथी ।
ताक-झाँक बेसब्र, खोजता मन का साथी ।।



पहला ब्लॉगर मैं बना, संजय मेरे बाद ।
असल अरुण आतिथ्य का, पाते दोनों स्वाद ।


 पाते दोनों स्वाद, हुई  थोड़ी  बेइमानी ।
सपना बिट्टू साथ, करें संजय अगवानी ।


आऊं अगली बार, आप या आयें घर पर ।
मिले पूर्ण परिवार, बधाई देता रविकर ।।



जख्म जिसने थे दिये वो आ रही  है ।
बुझ दिये, सुन  हवा अस्तुति गा रही है । 

वह फूल लादे डाल जब सजदा करे--
वो मुहब्बत की बड़ी मलिका रही है ।।



सृजन-शीलता दे जला, तन-मन के खलु व्याधि ।
बुरे बुराई दूर हों, आधि होय झट आधि ।।


कितने हलवाई मिटे, कितने धंधे-बाज ।
नाजनीन पर मर-मिटे, जमे काम ना काज ।

जमे काम ना काज, जलेबी रोज जिमाये ।
गुपचुप गुपचुप भेल, मिठाई घर भिजवाये ।

फिर अंकल उस रोज, दिए जब केटरिंग ठेका ।
सत्य जान दिलफेंक, उसी क्षण दिल को फेंका ।।


बंजारा चलता गया, सौ पोस्टों के पार ।
प्रेम पूर्वक सींच के, देता ख़ुशी अपार ।

देता ख़ुशी अपार, पोस्ट तो ग्राम बन गए ।
पा जीवन का सार, ग्राम सुखधाम बन गए ।

सर मनसर कैलास, बही है गंगा धारा ।
पग पग चलता जाय, विज्ञ सज्जन बंजारा । 

दिनेश की टिप्पणी : आपका लिंक  
dineshkidillagi.blogspot.com

9 comments:

  1. मन की साथी आत्मा, जाओ तन को भूल ।
    तृप्त होय जब आत्मा, क्यूँ तन खता क़ुबूल ?

    क्यूँ तन खता क़ुबूल, उमरिया बढती जाए ।
    नहीं आत्मा क्षरण, सुन्दरी मन बहलाए ।
    अभिनव भाव अभिव्यंजन सुन्दर मनोहर रचना .

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  2. आज की चर्चा भी रोचक ...

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  3. बढ़िया लिंक्स:-)...
    बढ़िया प्रस्तुति..

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  4. बहुत बढ़िया चर्चा

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  5. बहुत रोचक प्रस्तुति...आभार

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  6. संस्कार इस पार, बजे 'वीणा' शहनाई ।
    हर्षित हिन्द अपार, बहू इक औरो आई ।
    गई सानिया एक, बधाई लो अनजाने ।
    पाक सोनिया बन, धाक हो सोलह आने ।।
    बहुत खूब भाई साहब .

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