Tuesday, 19 January 2016

सत्ता की दुत्कार, इसी से सज्जन सहते -

कुण्डलियाँ 
सज्जन रहते व्यस्त खुद, लंद-फंद से दूर |
सत्ता को क्या फ़ायदा, बनते बोझ जरूर |
बनते बोझ जरूर, काम के चोर-उचक्के |
लोकतंत्र मगरूर, कार्यकर्ता ये पक्के |
सत्ता की दुत्कार, इसी से सज्जन सहते |
दुर्जन सत्ता पास, दूर अति सज्जन रहते ||

दोहा 
बहुत व्यस्त हूँ आजकल, कहने का क्या अर्थ |
अस्त-व्यस्त तुम वस्तुत:, समय-प्रबंधन व्यर्थ ||

Tuesday, 12 January 2016

चाहे करो हलाल, किन्तु पशु से मत खेलो-

जल्लू कट्टू पर रहे, फिर से उठा सवाल |
लेकिन बकरा-ईद पर, सदा छुपाते खाल |
सदा छुपाते खाल, इसी पेटा को ले लो |
चाहे करो हलाल, किन्तु पशु से मत खेलो |
प्रगतिशील ये लोग, किराये के हैं टट्टू |
करते रहें प्रलाप, खेलिए जल्लू कट्टू ||

Wednesday, 30 December 2015

मंगलमय नववर्ष, होय शुभ सोलह आना


कुण्डलियाँ 
सोलह आना सत्य है, है अशांति चहुँओर |
छली-बली से त्रस्त हैं, साधु-सुजन कमजोर | 
साधु-सुजन कमजोर, आइये होंय इकठ्ठा |
उनकी जड़ में आज, डाल दें खट्टा-मठ्ठा |
ऋद्धि-सिद्धि सम्पत्ति, होय फिर सुखी जमाना |
मंगलमय नववर्ष, होय शुभ सोलह आना ||

दोहा 
मंगलमय नव-वर्ष हो, आध्यात्मिक उत्कर्ष ।
बढे मान हर सुख मिले, विकसे भारत वर्ष ॥ 

Monday, 12 October 2015

होते जीव हलाल, बैठ के देखें बन्दर

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बन्दर-भालू-सर्प बिन, मरा मदारी आज |
पशु-अधिकारों पे उठी, जब से ये आवाज |

जब से ये आवाज, हुवे खुश कुत्ता बिल्ली |
अभयारण में बाघ, सुरक्षित करती दिल्ली |

किन्तु विरोधाभास, देश-दुनिया के अंदर |
होते जीव हलाल, बैठ के देखें बन्दर ||

Tuesday, 1 September 2015

रविकर मन हलकान, निठल्ला फेरे माला-

सालाना जलसे किये, खूब बढ़ाई शाख |
 लेकिन पति भाये नहीँ, अब तो फूटी आँख | 

अब तो फूटी आँख, रोज बच्चों से अम्मा |
कहती आँख तरेर, तुम्हारा बाप निकम्मा । 

रविकर मन हलकान, निठल्ला फेरे माला |
वह तो रही सुनाय, लगा के मिर्च-मसाला ||

Monday, 22 June 2015

बिना दवा सेहत सही, तन मन रहे निरोग-

योगी भोगी योगमय, अच्छा है संयोग |
बिना दवा सेहत सही, तन मन रहे निरोग |
तन मन रहे निरोग, दवा के बचते पैसे |
फिर भी हैं कुछ लोग, मिले हैं ऐसे-वैसे |
इनमे से ही एक, मिला है रविकर ढोंगी |
करता हर दिन योग, किन्तु है बड़ा वियोगी ||

Wednesday, 6 May 2015

दोहे -

(1)
ओवर-कॉन्फिडेंट हैं, इस जग के सब मूढ़ |
विज्ञ दिखे शंकाग्रसित, यही समस्या गूढ़ || 

(2)
चौथेपन तक समझ पर, उँगली रही उठाय । 
माँ पत्नी क्रमश: बहू, किन्तु समझ नहिं आय ॥