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Thursday, 2 January 2014

चाहे फिर कश्मीर, देश भी जाय भाड़ में-



हाजिर हूँ हुजूर -रविकर

एक-दो दिन में नियमित हो जाऊँगा -
(१)
मैय्यत में भी न मिलें, अब तो कंधे चार |
खुद से खुद को ढो रही, लागे लाश कहार ||
(२)
नया वर्ष आसन्न है, कटे आप के क्लेश |
जैजैवन्ती है शुरू, जाय भाड़ में देश ||
(३)
सा'रे गा'मा पा'दते, धा'नी हिलती देख |
रे'गा सा'मा'धा'न सब, ना पा'रे संरेख ||
(४)
आप भला तो जग भला, देख आप आलाप |
सब्ज बाग़ दिखला रहे, चालू क्रिया-कलाप ||


दोनों हाथ लुटाइये, मिली 'आप' को छूट-

सत्ता फिर फिर पाइये, कुछ लोगों को लूट |
दोनों हाथ लुटाइये, मिली 'आप' को छूट |

मिली 'आप' को छूट, आय कर जलकर *हर कर |
इधर खून के घूँट, उधर जल छह सौ लीटर |

बिजली सस्ती बाँट, बाँट उत बहुविधि भत्ता |
 रखे ध्यान मतदान, बड़ी उपदानी सत्ता ||
उपदान=सब्सिडी 


आज केजरीवाल, भरे शीला घर पानी

पानी मुफ्त पिलाइये, बिजली आधे दाम । 
आम आदमी खुश हुआ, मुँह में लगी हराम । 

मुँह में लगी हराम, आप तो नित जुगाड़ में । 
चाहे फिर कश्मीर, देश भी जाय भाड़ में। 

मुफ्त मुफ्त की लूट, हुई जनता दीवानी । 
आज केजरीवाल, भरे शीला घर पानी ॥ 


आगे पीछे सिरफिरे, फिरे नहीं इस बार-


फूली फूली फिर फिरे, धनिया बीच बजार । 
आगे पीछे सिरफिरे, फिरे नहीं इस बार । 

फिरे नहीं इस बार, धार कानूनी तीखी । 
लें व्यवहार सुधार, सोच भी साधु सरीखी। 

रविकर रहे सचेत, करे ना हुक्म-उदूली। 
कई धुरंधर खेत, देखकर धनिया फूली ॥ 



आम हुवे *आमात्य कुल, ख़ास काढ़ते खीस-


अच्छा-खासा वर्ष यह, गत वर्षों से बीस |
आम हुवे *आमात्य कुल, ख़ास काढ़ते खीस |
*मंत्री  

ख़ास काढ़ते खीस, देख ईश्वर की सत्ता |
बिन उनके आशीष, हिले ना जग में पत्ता |

हो जग का कल्याण, पूर्ण हो जन-गण आसा |
हों हर्षित तन-प्राण, वर्ष हो अच्छा-खासा ||

3 comments:

  1. जोरदार प्रस्तुति। समसामयिक दोहे..

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