Follow by Email

Tuesday, 21 January 2014

कुक्कुर खाँसी आपको, किन्तु परेशां देश -

 कुक्कुर खाँसी आपको, किन्तु परेशां देश |
*कूटशासनी व्यवस्था, बढ़ा रही नित क्लेश |
*धोखे का राज्य 

बढ़ा रही नित क्लेश, पेश कर कपट नीतियां-
झपट रहे विश्वास, अनोखी अजब रीतियाँ-

लोकसभा हित व्यग्र, दिखे आडम्बर आतुर |
करने चला शिकार, शिकारी बनता कुक्कुर ||
ठेकेदारी चल रही, पक्की सर्विस ख़्वाब |
रह जाता धरना धरा, धरना बना जवाब |

धरना बना जवाब, देख धरने पर धरने |
सचिवालय पर भीड़, सचिव तो रेले भवने |

भीड़तंत्र की जीत, कहीं वह पत्थर फेंके |
सत्ता लाठी भाँज, पुलिस को देती ठेके ||
भारत का भुरता बना, खाया खूब अघाय |
भरुवा अब तलने लगे, सत्तारी सौताय |

सत्तारी सौताय, दलाली दूजा खाये |
आम आदमी बोल, बोल करके उकसाए |

इज्जत रहा उतार, कभी जन-गण धिक्कारत  |
भागे जिम्मेदार, अराजक दीखे भारत ||


अंतर-तह तहरीर है, चौक-चाक में आग |
रविकर सर पर पैर रख, भाग सके तो भाग |

भाग सके तो भाग, जमुन-जल नाग-कालिया |
लिया दिया ना बाल, बटोरे किन्तु तालियां |

दिखे अराजक घोर, काहिरा जैसा जंतर |
होवे ढोर बटोर, आप में कैसा अंतर || 


 था विपक्ष में बैठना, पर सी एम् बन जाय |
आदत सीधे जाय ना, देता धरना आय ||

नौकरशाही भ्रष्ट कह, कहे नौकरी छोड़ |
फोर्ड सैलरी की मची, आज आप में होड़ ||

चला ठीकरा फोड़ने, ठीक-ठाक रणनीति |
राजनीति चमका रहा, छोड़ पुरानी रीति ||

खड़ा करेगा देश को, रविकर अंधे मोड़ |
नीति-नियम सब छोड़ के, नगर ग्राम कुल तोड़ ||

है सुधार में धार पर, किन्तु कहाँ सरकार |
कहीं दांव उल्टा पड़ा, रविकर जाय सिधार ||




3 comments:

  1. कुक्कुर खाँसी बड़ी तकलीफदेह होती हैं ..खांसने वाला भी परेशां सामने वाला भी हैरान परेशां ..
    बहुत खूब प्रस्तुति

    ReplyDelete
  2. आ० बढ़िया प्रस्तुति , धन्यवाद

    ReplyDelete