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Thursday, 5 June 2014

वह संवेदनशील, पराये अपने जाने-

दासी सा बर्ताव भी, नहीं दिलाता ताव |
किन्तु उपेक्षा से मिलें, असहनीय से घाव |

असहनीय से घाव, उदासी झट पहचाने |
वह संवेदनशील, पराये अपने जाने |

मकु आकर्षण प्यार, लगे उसको आभासी । 
लेकिन लेती ताड़, उपेक्षा और उदासी ॥ 

4 comments:

  1. वाह !! मंगलकामनाएं भाई जी !!

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  2. आपकी लिखी रचना शनिवार 07 जून 2014 को लिंक की जाएगी...............
    http://nayi-purani-halchal.blogspot.in आप भी आइएगा ....धन्यवाद!

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  3. मकु आकर्षण प्यार, लगे उसको आभासी ।
    लेकिन लेती ताड़, उपेक्षा और उदासी ॥

    बहुत सुन्दर भाव और अर्थ गाम्भीर्य .,शब्द चयन .

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  4. बहुत सुन्दर प्रस्तुति।
    --
    आपकी इस' प्रविष्टि् की चर्चा कल शनिवार (07-06-2014) को ""लेखक बेचारा क्या करे?" (चर्चा मंच-1636) पर भी होगी!
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक

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