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Sunday, 13 July 2014

बेमानी लगते हमें, अच्छे दिन के योग-

मारे मारे फिर रहे, कृषक उद्यमी लोग । 
बेमानी लगते हमें, अच्छे दिन के योग । 

अच्छे दिन के योग, चाइना मुस्काता है । 
बढ़ा रहा उद्योग, उद्यमी भरमाता है । 

सस्ता चीनी माल, बिक रहा द्वारे द्वारे । 
रविकर रहा खरीद, माल ना बिके हमारे ॥ 

5 comments:

  1. अच्छे दिन का पैटेंट हो चुका है प्रयोग करने में सावधानी बरतें :)

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  2. सुंदर प्रस्तुति , आप की ये रचना चर्चामंच के लिए चुनी गई है , सोमवार दिनांक - १४ . ७ . २०१४ को आपकी रचना का लिंक चर्चामंच पर होगा , कृपया पधारें धन्यवाद !

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  3. हा हा ऐसे ही आयेंगे अच्छे दिन अब तो ...

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  4. सुन्दर है सन्दर्भ से जुड़ा है सारा लेखन आपका .सिर्फ लफ़्फ़ाज़ी नहीं है उलूकी

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