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Thursday, 17 July 2014

भारत दुर्दिन झेल, भाग्य का तू तो मारा-

IIT-Ghandhi-Nagar के प्रवास पर,२८ को वापसी 
नारायणी दरिद्रता, अच्छे दिन की चाह ।
कंगाली कर बैठती, आटा गीला आह ।

आटा गीला आह, करम में लोढ़ा पत्थर ।
कैसे फिर नरनाह, यहाँ लाये दिन सुन्दर ।

भारत दुर्दिन झेल, भाग्य का तू तो मारा ।
पॉलिटिक्स ले खेल, लगा के रविकर नारा ॥ 

8 comments:

  1. आपकी इस रचना का लिंक कल यानी शनिवार दिनांक - 19 . 7 . 2014 को I.A.S.I.H पोस्ट्स न्यूज़ पर दिया गया है , कृपया पधारें धन्यवाद !

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  2. अच्छे दिनो में ऐसा तो ना लिखिये जी :)

    बहुत सुंदर ।

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  3. बहुत सुन्दर प्रस्तुति।
    --
    आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल शनिवार (19-07-2014) को "संस्कृत का विरोध संस्कृत के देश में" (चर्चा मंच-1679) पर भी होगी।
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  4. सुंदर प्रस्तुति

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  5. रचना मन को लुभा गई .

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  6. शास्त्रीजी के पिता श्री के निधन पर श्रद्धांजलि , ईश्वर शास्त्री जी को यह दुःख सहन करने की क्षमता प्रदान करे

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