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Thursday, 5 May 2011

एक खिड़की खुलवाते

रतन टाटा का  चर्चित-विचार की अरब-पतियों को अपने 
अति कीमती बंगलों से निकल कर
अपने आस-पास  के विकास  की 
जिम्मेदारी भी लेनी  चाहिए...  
आधे  की आधी, अपनी आबादी .
रैन बसेरे की,
हो चुकी आदी
नाती- पोते, सभी  साथ सोते.
जागते रहते,
दादा और दादी
कुछ तो  खानाबदोश निकले.
जिंदगी सडकों पर बिता दी
सर के बँगले में सरकार,  
इक कार-गैराज 
और बनवा दी
अच्छा होता  श्रीमान !
अपने गैराज  में 
एक खिड़की खुलवाते 
ताज़ी हवा  से 
कुछ,  
घर-परिवार का दर्जा पाते                             


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