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Tuesday, 4 December 2012

बेवफा है जिंदगी इसको नहीं ज्यादा पढो अब -




रचते पढ़ते छंद, सुने प्रभु उन बन्दों की

छंदों की महिमा विषद, चर्चित शुभ-सन्देश |
शिल्पबद्ध कविता करो, करो ध्यान अनिमेष
करे ध्यान अनिमेष, आत्म-उत्थान जरुरी  |
सच्चा व्यक्ति विशेष, होय अभिलाषा पूरी |
रचते-पढ़ते छंद, सुने प्रभु उन बन्दों की |
सच्चा हो ईमान, सुनों महिमा छंदों की ||

अक्स विहीन आईना

संगीता स्वरुप ( गीत ) 
 गीत.......मेरी अनुभूतियाँ

मन को मनमति पोट ली, ली पोटली उतार ।
चुप्प चुकाने चल पड़ी, दादी सभी उधार । 
दादी सभी उधार, दर्प-दर्पण दल कोरा ।
नाती पोते आदि, किसी को नहीं अगोरा । 
शंख सीप जल रत्न, बरसता रिमझिम सावन । 
रविकर सफल प्रयत्न, पिरोये मनके मन-मन ।

 बेवजह ही बेसबब भी दूर तक बेफिक्र टहलो -
काम से तो रोज घूमे काम बिन भी घूम बन्दे |
नाम में कुछ ना धरा गुमनाम होकर झूम बन्दे |

  

बेवजह ही बेसबब भी दूर तक बेफिक्र टहलो -
कुछ करो या ना करो हर ठाँव  को ले चूम बन्दे ।

बेवफा है जिंदगी इसको नहीं ज्यादा पढो अब -
दर्शनों में आजकल मचती रही यह धूम बन्दे ।  

 दे उड़ा धन-दौलतें सब, कौन तू लाया जहाँ में-
मस्तियाँ देखो निकलकर पस्त हो मत सूम बन्दे  ।

 ले पहन रविकर लँगोटी, एक खोटी सी चवन्नी -
राह पर चौकस उछालो, जब नहीं मालूम बन्दे ।।

कुछ खाने की चीज़ों से एलर्जी के पीछे हो सकता है कीटनाशक रसायनों का हाथ

Virendra Kumar Sharma 

 कीट-पतंगे मारते, कई रसायन खूब |
घुल जाते पर खाद्य में, हो खाने से ऊब |
हो खाने से ऊब, एलर्जी  का है कारण |
पानी में भी अंश, जरुरी मित्र निवारण |
भंडारण का डंश, देह पर करता दंगे |
रहिये सदा सचेत, मिटा के कीट पतंगे |


कार्टून कुछ बोलता है- पैरेंट्स व्यथा !

पी.सी.गोदियाल "परचेत" 

आयर-लैंडी भ्रूण हो, हो असमय नहिं मौत ।
बचपन बीते नार्वे, मातु-पिता गर सौत ।
मातु-पिता गर सौत, हेकड़ी वहां भुला दे ।
यू के में पढ़ युवा, सेक्स ब्राजील खुला दे ।
शादी भारत आय, सके नहिं लेकिन कायर ।
बिता बुढापा जाय, सही सबसे है आयर ।।

दुष्ट-मनों की ग्रन्थियां, लेती सखी टटोल-

रविकर *परुषा पथ प्रखर, सत्य-सत्य सब बोल ।
दुष्ट-मनों की ग्रन्थियां, लेती सखी टटोल ।
*काव्य में कठोर शब्दों / कठोर वर्णों  / लम्बे समासों का प्रयोग
लेती सखी टटोल, भूलते जो मर्यादा ।
ऐसे मानव ढेर, कटुक-भाषण विष-ज्यादा ।

छलनी करें करेज, मगर जब पड़ती खुद पर ।
मांग दया की भीख, समर्पण करते रविकर ।।

रचते पढ़ते छंद, सुने प्रभु उन बन्दों की


छंदों की महिमा विषद, चर्चित शुभ-सन्देश |
कविता रच ले पाठ कर, करे ध्यान अनिमेष |

करे ध्यान अनिमेष, आत्म उत्थान जरुरी  |

सच्चा व्यक्ति विशेष, होय अभिलाषा पूरी |

रचते पढ़ते छंद, सुने प्रभु उन बन्दों की |
सच्चा हो ईमान, सुनों महिमा छंदों की ||


हरि अनंत हरी कथा अनंता !!!

Sonal Rastogi 

करने को तो बहुत है, पर बढ़िया यह काम ।
आस-पास जो भी रहे, जीना करो हराम ।
जीना करो हराम, सामने मधु की गोली ।
पीछे हों षड्यंत्र, जहर जीवन में घोली ।
धारावाहिक सार, चलो सब सजे संवरने ।
कोई भी त्यौहार, बहू को सारे करने ।।

9 comments:

  1. बेहतरीन लिंक्‍स संयोजित किये हैं आपने ... आभार

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  2. फिल्म 'मुक़द्दर का सिकंदर' में भी ऐसा ही माना गया है.
    "बेवफा है जिंदगी"

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  3. बेवजह ही बेसबब भी दूर तक बेफिक्र टहलो -
    काम से तो रोज घूमे काम बिन भी घूम बन्दे |
    नाम में कुछ ना धरा गुमनाम होकर झूम बन्दे |


    बेवजह ही बेसबब भी दूर तक बेफिक्र टहलो -
    कुछ करो या ना करो हर ठाँव को ले चूम बन्दे ।

    बेवफा है जिंदगी इसको नहीं ज्यादा पढो अब -
    दर्शनों में आजकल मचती रही यह धूम बन्दे ।

    दे उड़ा धन-दौलतें सब, कौन तू लाया जहाँ में-
    मस्तियाँ देखो निकलकर पस्त हो मत सूम बन्दे ।

    ले पहन रविकर लँगोटी, एक खोटी सी चवन्नी -
    राह पर चौकस उछालो, जब नहीं मालूम बन्दे ।।
    कुछ भी बोलो सामने रविकर के बन जाता है छंद .

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  4. बेहतरीन, आभार रविकर जी !

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  5. खूबशूरत सुंदर टिप्पणियों के साथ लिंकों का संयोजन,,,

    recent post: बात न करो,

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  6. जिंदगी तो है बेवफा, एक दिन ठुकराना है |
    रविकर बांधे कुंडलियाँ, टिप्पणियाँ लगाना है ||

    आपकी इस उत्कृष्ट पोस्ट की चर्चा बुधवार (05-12-12) के चर्चा मंच पर भी है | जरूर पधारें |
    सूचनार्थ |

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  7. बढ़िया प्रस्तुति सभी सेतु सराहनी काव्यात्मक टिपण्णी से लैस हैं पढ़ें हैं .

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  8. फिर भी प्यार तो उसी से है जी ...कहा जाईयेगा उसे छोड़ कर साधुवाद जी |बेहतरीन, आभार रविकर जी |


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  9. बेवफा है जिंदगी इसको , नहीं ज्यादा पढ़ो अब
    प्रेम - मिट्टी गूँथ कर , छोटी सही-मूरत गढ़ो अब |
    कुछ तो होगा बोझ हल्का , मान लो अपनी खताएँ
    मत किसी मासूम के सर,गलतियाँ सारी मढ़ो अब |
    क्या पता कि पायदानें , खत्म होंगी किस ठिकाने
    उम्र की सीढ़ी जरा-सी,सम्हल कर इस पर चढ़ो अब |

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