Sunday, 24 June 2012

घोंघे करते मस्तियाँ, मीन चुकाती दाम-

तारों की घर वापसी


तारे होते बेदखल, सूरज आँखे मूंद |
अद्वितीय अनुकल्पना, आंसू शबनम बूंद |

आंसू शबनम बूंद, सूर्य को तपना भाये |
किन्तु वियोगी चाँद, अकेला रह न पाए |

उतर धरा पर चाँद, इकट्ठा करे संभारे |
छूकर प्रभु के चरण, गगन पुनि चमकें तारे ||


कमल का तालाब

देवेन्द्र पाण्डेय 
स्थानः काशी हिंदू विश्व विद्यालय समयः 25-06-2012 की सुबह फोटूग्राफरः देवेन्द्र पाण्डेय।

कमल-कुमुदनी से पटा, पानी पानी काम ।
घोंघे करते मस्तियाँ, मीन चुकाती दाम ।

मीन चुकाती दाम, बिगाड़े काई कीचड़ ।
रहे फिसलते रोज, काईंया पापी लीचड़ ।

किन्तु विदेही पात, नहीं संलिप्त  हो रहे ।
भौरे की बारात, पतंगे धैर्य खो  रहे ।।

ऋषभ देव शर्मा
ऋषभ उवाच  
साधुवाद शुभकामना, हे ! मन की दीवार ।
सुषमा सुश्री मुक्तकें, चाँद लगाते चार ।

चाँद लगाते चार, कहें प्रोफ़ेसर गोपी ।
कवि रविकर चालाक, भाव पर चाक़ू घोपी ।

बहुत बहुत आभार, ऋषभ जो हमें जोड़ते ।
प्रांत  हैदराबाद,  बड़ी  बंदिशें तोड़ते ।।

आप मुड़ कर न देखते

नीरज गोस्वामी  

धीरे से अपनी कहे, नीरज रविकर-मित्र |
चींखे-चिल्लायें नहीं, खींचे रुचिकर चित्र |


खींचे रुचिकर चित्र, पलट कर ताके कोई |
हालत होय विचित्र, राम-जी सिय की सोई |


पर मैं का मद आज, कलेजा हम का चीरे |
कभी रहा था नाज, भूलता धीरे धीरे || 

हवन का ...प्रयोजन.....!!

Anupama Tripathi
anupama's sukrity.  

 वाह वाह अनुपम हवन, किन्तु प्रयोजन भूल ।
 आँख धुवें से त्रस्त है, फिर भी झोंके धूल ।

फिर भी झोंके धूल , मूल में अहम् संभारे ।
सुकृति का शुभ फूल, व्यर्थ ही ॐ उचारे ।

अहम् जलाए अग्नि, तभी तो बात बनेगी ।
आत्मा की पुरजोर, ईश से सदा छनेगी ।। 

पी सी गोदियाल

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दुखद मार्मिक कष्टप्रद, दुर्घटना गंभीर |
पूँछों उन माँ बाप से, असहनीय यह पीर |


असहनीय यह पीर, चीर कर डिंगो खाए |
भोगी जोड़ी जेल, अंत निर्दोष कहाए |


यहाँ बोरवेल साल, गिराता  रहता बच्चा |
रहे खोद के डाल, दे रहे दोषी गच्चा ||

गम का सौदा कर चले, दामन में भर शूल |
दूजा भय से देखता, पर रविकर के फूल |

पर रविकर के फूल, मूल में याद तुम्हारी |
इन यादों में झूल, भूलता विपदा सारी |

रविकर रखे सहेज, प्यार की अमित-निशानी |
अमिट याद का तेज, पलट कर देखो रानी ||


  

एन डी ए असहाय, दिखे सब की बेशर्मी -

"रविकर" जी के सम्मान में कविगोष्ठी!
धन्य धन्य रविकर हुआ,  मित्रो का आभार  ।
प्रेम पाय के आपका, हर्षित हुआ अपार ।

ZEAL at ZEAL
अधर्मी पी एम् बने, बकते श्री  नितीश ।
मोदी से भरसक इन्हें,  बे-हिसाब है रीस ।

बे-हिसाब है रीस, छोड़ देंगे गठबंधन ।
पर कहिये श्रीमान, राष्ट्रपति पद पर क्रंदन ।

एन डी ए असहाय, दिखे सब की बेशर्मी ।
दिया ना कंडीडेट, ढूँढ़ ना सके अधर्मी ।। 

तारों की घर वापसी

तारे होते बेदखल, सूरज आँखे मूंद |
अद्वितीय अनुकल्पना, आंसू शबनम बूंद |

आंसू शबनम बूंद, सूर्य को तपना भाये |
किन्तु वियोगी चाँद, अकेला रह न पाए |

उतर धरा पर चाँद, इकट्ठा करे संभारे |
छूकर प्रभु के चरण, गगन पुनि चमकें तारे ||


कमल का तालाब

देवेन्द्र पाण्डेय 
स्थानः काशी हिंदू विश्व विद्यालय समयः 25-06-2012 की सुबह फोटूग्राफरः देवेन्द्र पाण्डेय।
कमल-कुमुदनी से पटा, पानी पानी काम ।
घोंघे करते मस्तियाँ, मीन चुकाती दाम ।
मीन चुकाती दाम, बिगाड़े काई कीचड़ ।
रहे फिसलते रोज, काईंया पापी लीचड़ ।
किन्तु विदेही पात, नहीं संलिप्त  हो रहे ।
भौरे की बारात, पतंगे धैर्य खो  रहे ।।

आप मुड़ कर न देखते

नीरज गोस्वामी  

धीरे से अपनी कहे, नीरज रविकर-मित्र |
चींखे-चिल्लायें नहीं, खींचे रुचिकर चित्र |


खींचे रुचिकर चित्र, पलट कर ताके कोई |
हालत होय विचित्र, राम-जी सिय की सोई |


पर मैं का मद आज, कलेजा हम का चीरे |
कभी रहा था नाज, भूलता धीरे धीरे || 

हवन का ...प्रयोजन.....!!

Anupama Tripathi
anupama's sukrity.  

 वाह वाह अनुपम हवन, किन्तु प्रयोजन भूल ।
 आँख धुवें से त्रस्त है, फिर भी झोंके धूल ।

फिर भी झोंके धूल , मूल में अहम् संभारे ।
सुकृति का शुभ फूल, व्यर्थ ही ॐ उचारे ।

अहम् जलाए अग्नि, तभी तो बात बनेगी ।
आत्मा की पुरजोर, ईश से सदा छनेगी ।। 

गम का सौदा कर चले, दामन में भर शूल |
दूजा भय से देखता, पर रविकर के फूल |

पर रविकर के फूल, मूल में याद तुम्हारी |
इन यादों में झूल, भूलता विपदा सारी |

रविकर रखे सहेज, प्यार की अमित-निशानी |
अमिट याद का तेज, पलट कर देखो रानी ||
 

Friday, 22 June 2012

नहीं खेलते खेल, बैठ के दुश्मन गोदी-

ZEALatZEAL
दुर्गति है नीतीश की, मोदी बने विशेष |
खटिया खुद करते खड़ी, खाम्खाह की  रेस |

खाम्खाह की  रेस , स्वार्थ मद अहंकार है |
जाय भाड़ में देश,  जीभ में बड़ी धार है |

रविकर करता गर्व, हमारे नेता मोदी |
नहीं खेलते खेल, बैठ के दुश्मन गोदी ||

व्यवस्था - कहानी

बक्से सा खाली पड़ा, ब्लॉगिंग भरा दिमाग |
करनी पे अपने अड़ा, कैसे जाए जाग ?

कैसे जाए जाग, जगाने वाला आये |
देख जंक बिखराव, तरीके खूब सुझाए   | 

लख विगड़े हालात, नहीं रविकर को बख्से |
लौट जाय बिन बात, घूर अब खाली बक्से ||
 

सन्नाटा....

सन्नाटा काटे खड़ा, जड़ा-पड़ा इंसान ।
क्षिति-जल पावक वायु सह, गगन पञ्च रिसियान । 

गगन पञ्च रिसियान, ध्यान देने की बातें ।
 अपनापन अज्ञान, सिसकते रिश्ते नाते ।

अंतिम घाट शरीर, पीर ना कोई बांटा ।
रखिये मन में धीर, तोडिये मत सन्नाटा ।। 

बिन तुम्हारे......

  Sharad Singh  

 बाता-बाती मद भरी, चित्र करे मदहोश ।
दीप-शिखा की आंच से, मन-मसोस तन जोश ।

मन-मसोस तन जोश,  कोष धीरज का जारे ।
पिया बसे परदेश, सँदेशा लेता जा रे ।

शरद काल की शीत, नहीं सपनों से जाती ।
वापस आ मनमीत, भूल के बाता-बाती ।


Thursday, 21 June 2012

प्रेमालापी विदग्धा, चाट जाय सब धात-

प्रतुल वशिष्ठ
दर्शन-प्राशन 


 आचार्य परशुराम राय जी का इस बार का पाठ यहाँ 
पढ़कर जानिये....कि काव्य में किन परिस्थितयों में अश्लील दोष भी गुण हो जाता है.
और वह शृंगार 'रस' के घर में न जाकर 'रसाभास' की दीवारें लांघता हुआ दिखायी देता है.  
  अरी अप्सरे अनल अवदात 
शिथिल कर देने वाली वात 
आपके अंगों का आकार 
ध्यान आते ही गिरता धात।
पाठकों से अनुरोध : यदि शृंगार विषयक साहित्यिक चर्चा का मन हो तो जिज्ञासा भाव से ही शिष्ट और व्यंजना युक्त शब्दावली का प्रयोगकर प्रश्न करें या विस्तार दें.
पिछली कविता पर प्रतिक्रियात्मक टिप्पणियाँ आने वाले कल में की जायेंगी। काव्यात्मक टिप्पणियाँ मेरे लिए प्रसाद तुल्य हैं। उनको रचना से कमतर आँकना मेरे लिए सहज नहीं।

रविकर की टिप्पणी  

 (1)
स्वर्ण-शिखा सी सज संवर, लगती जलती आग ।
छद्म रूप मोहित करे, कन्या-नाग सुभाग ।
कन्या-नाग सुभाग, हिस्स रति का रमझोला ।
झूले रमण दिमाग, भूल के बम बम भोला ।
नाग रहा वो जाग, ज़रा सी आई खांसी ।
कामदेव गा भाग, ताक  के स्वर्ण शिखा सी ।।

(2)
नींद नाग की भंग हो, हिस्स-फिस्स सम शोर। 
भंग नशे में शिव दिखे, जगा काम का चोर ।
जगा काम का चोर, समाधी शिव की छोड़े ।
सरक गया पट खोल, बदन दनदना मरोड़े ।
संभोगी आनीत, नीत में कमी राग की ।
आसक्त पड़ा आसिक्त , टूटती नींद नाग की ।।

(3)
मांसाहारी मन-मचा, मदन मना महमंत ।
पाऊं-खाऊं छोड़ दूँ, शंका जन्म अनंत ।
शंका जन्म अनंत, फटाफट पट पर पैनी ।
नजर चीरती चंट, सहे न मन बेचैनी ।
चला मारने दन्त, मगर जागा व्यभिचारी ।
फिर जीवन-पर्यंत, चूमता मांसाहारी ।।

(4)
प्रेमालापी विदग्धा, चाट जाय सब धात ।
खनिज-मनुज घट-मिट रहे, नष्ट प्रपात प्रभात ।
नष्ट प्रपात प्रभात, शांत मनसा ना होवे ।
असमय रही नहात, दुपहरी पूरी सोवे ।
चंचु चोप चिपकाय, नहीं पिक हुई प्रलापी ।
चूतक ना बौराय, चैत्य-चर प्रेमालापी ।।
 महोदय !!
अंतिम पंक्ति में यदि ना के स्थान पर नहीं का प्रयोग करूँ और मात्रा पूरी करने के लिए चूतक (आम) का एक अक्षर कम कर दूँ - तो क्या अश्लील - दोष होगा ??


Wednesday, 20 June 2012

हँसुवा की शादी लगी, पर नितीश की रीत-

DR. ANWER JAMAL
Blog News
 
 हँसुवा की शादी लगी, पर नितीश की रीत ।
आ'मोदी मद में रहे, गा खुरपी के गीत ।

गा खुरपी के गीत, स्वार्थ का भैया चक्कर ।
युद्ध-काल यह शीत, डाल इंजन में शक्कर ।

करते खेल खराब, तीर से कई निशाने ।
कीचड़ का चर कमल, बड़े गहरे हैं माने ।।

ये है मेरा इंडिया

veerubhai at ram ram bhai
टापा भारत ने सही, अब है नम्बर एक |
मधुमेह कैंसर भ्रष्टता, हुई मार्केट ब्लैक |

हुई मार्केट ब्लैक, रसोई माँ की रोई |
रोटी सरसों साग, आग चूल्हे की खोई |

जारी भागमभाग, रास्ता कितना  नापा |
सब रोगों का बाप, किन्तु है यही मुटापा ||

सखी बरखा

भीषण गर्मी से थका, मन-चंचल तन-तेज |
भीग पसीने से रही, मानसून अब भेज |


मानसून अब भेज, धरा धारे जल-धारा |
जीव-जंतु अकुलान, सरस कर सहज सहारा |


पद के सुन्दर भाव, दिखाओ प्रभु जी नरमी |
यह तीखी सी धूप, थामिए भीषण गरमी ||

"जवान के साथ जा जवान हो जा "

Sushil
"उल्लूक टाईम्स "


अपने अपने दर्द की, रहे दवा सब खोज ।
कुछ तो दुआ-भभूत में, कुछ कसरत से रोज ।

कुछ कसरत से रोज, पोज लख ओज बढाते ।
पर बीबी के  डोज, जुल्म कुछ ऐसा ढाते ।

भीगी बिल्ली भूख, देखती चूहे सपने ।
गेंहू और गुलाब, छांटते खूसट अपने ।।

कासे कहे...

डॉ. जेन्नी शबनम 
 लम्हों का सफ़र
 दो शब्दों की पंक्तियाँ, ढाती जुल्म अपार ।
पीर पराई कर रही, शब्दों का व्यापार । 

शब्दों का व्यापार, सफ़र लम्हों का चालू ।
सावन मोती प्यार, सीप-मन श्रृद्धा पा लूं ।

पर तडपे मन-व्यग्र, ढूँढ़ता सच्चा हमदम ।
ताप लगे अति तेज, बचा ले बिखरी शबनम ।।

यहाँ, ऐसा ही होता है ...(संस्मरण)

अदा 
 काव्य मंजूषा
सरल कनाडा पुलिस है, विकट-काल में शांत ।
आलोकित परिसर करे, स्वत: शांत हर भ्रांत ।

स्वत: शांत हर भ्रांत, प्रांत भारत के लेकिन ।
रहे सशंकित साधु , हेल्प लगती नामुमकिन ।

चढ़ा चढावा ढेर, करो फिर हेरा-फेरी ।
आँखे रहें तरेर, किन्तु दुर्जन की चेरी ।।

हिलोर

  (पुरुषोत्तम पाण्डेय)
जाले
 
मीता ने जीता हृदय, जो टूटा दो बार |
प्रथम मौत साजिश करे, दूजा पुत्र विचार |


दूजा पुत्र विचार, जिया इतिहास दुबारा |
दे जाता वह दर्द, पुत्र पर जीवन वारा |  


कंप्यूटर जन-जाल, पुन: दे गया सुबीता |
चमत्कार परनाम, मिला मीता मनमीता ||

फिर कली बना दो

कैसा अंतर्द्वंद यह, कैसा यह संताप |
चाहूँ तुम्हे पुकारना, पर रहती चुपचाप |


पर रहती चुपचाप, अश्रु-धारा को धारा |
रही रास्ता नाप, पुकारी नहीं दुबारा |

प्रीति नहीं अपनाय, गुजारिश ठुकराते हो  |
पोता भाई पुत्र, इन्हें ही अपनाते हो | 

"आज विनीत चाचा का जन्मदिन है" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')


बाबा-दादी का मिला, पावन आशिर्वाद |
माँ-बापू करते सदा, भोले से फ़रियाद |


भोले से फ़रियाद, यशस्वी नाम कमाओ |
प्राची-प्रांजल सरिस, शीघ्र ही बच्चे पाओ |


रविकर का आशीष, जिए जुग-जुग यह जोड़ी |
बढ़ो लक्ष्य की ओर, हटें रस्ते की रोड़ी ||





परम मित्र हे सुज्ञ, वियोगी बात बनाता-

तुम्हारे जाने के बाद !

संतोष त्रिवेदी
बैसवारी baiswari  
आया ऊंट पहाड़ के, नीचे गया दबाय ।
दुःख के दिनवा गिन रहा, नानक देव सहाय ।

 
नानक देव सहाय, कृपा हो जाये जम के  ।
 ऊंट उठा बलबला, घूँट कडुवे हैं गम के ।

 
खाना पीना छूट, नहीं सप्ताह नहाया ।
सपने देखे रोज, लौट सारा घर आया ।। 
विरह का यह दंश है, रिक्त सब्र के कोष।
तृषा में अनुरक्त हुआ, आज स्वयं संतोष |




  1. आज स्वयं संतोष, होश में आया बच्चा |
    आँगन को दे दोष, खा रहा खाना कच्चा |
    वैसे तो है विज्ञ, मगर मूरख बन जाता |
    परम मित्र हे सुज्ञ, वियोगी बात बनाता ||
  2. वाह!! कविवर, हम निरुत्तर!! 
  3. आप गद्य के वीर हो,रविकर पद्य-प्रवीण,
    अली निपुण दोनों विधा,मेरा बल अति क्षीण !




    1. wah wah.....kamal
      pranam.
    2. मेरा बल अति क्षीण, ये तो विरह है फूटा!
      साथी बिना उदास, साथ आनन्द है लूटा!!
    3. टूटा फूटा क्षीण बल, खल अब रहा विशेष ।
      दीदी जल्दी जाइये, ताकत भी नि:शेष ।
      ताकत भी नि:शेष, केस यह टेढा-मेढ़ा ।
      मित्र दे रहे क्लेश, सभी ने मिलकर छेड़ा ।
      खींच रहे सब टांग, तोड़ कर भगा खूंटा ।
      है भाई की मांग, जोड़िये टूटा-फूटा ।।
      रविकर करे धमाल,रोज़ की बात हो गई,
      बुरा हमारा हाल ,खड़ी अब खाट हो गई :-)





      1. सुधरेंगे हालात भैया धीरे धीरे |
        बिन बीबी के मात भैया धीरे धीरे |
        विकट मर्द की जात भैया धीरे धीरे |
        दिखलाए औकात भैया धीरे धीरे |
        खा लो बासी भात भैया धीरे धीरे |
        खाकर के फै'लात भैया धीरे धीरे |
        चार दिनन की बात भैया धीरे धीरे |
        सुधरेंगे हालात भैया धीरे धीरे ||




      1. बहुत दिनों के बाद , मज़ा आया था बच्चा !
        उस दिन तो मन बड़ा प्रफुल्लित लगता बच्चा
        कपडे धोले, उठ बिस्तर से , लंच बना ले !
        पढ़ ले अब अखबार,किचिन में चाय बनाकर !
      2. चार दिनों से खा रहा,खिचड़ी और दही,
        अब क्या और कराओगे,अँसुवन-धार बही !

        1. आप गद्य के वीर हो,रविकर पद्य-प्रवीण,
          अली निपुण दोनों विधा,मेरा बल अति क्षीण !


          मेरा बल अति क्षीण, ये तो विरह है फूटा!
          साथी बिना उदास, साथ आनन्द है लूटा!!


          कब तक सहता रहूँगा,मैं विरही का ताप,
          मन को ठंडक तब मिले,घर आयें जब आप !
        2. मंगल भावों का उदय, छाये परमानंद |
          शुभ शुभ योगायोग है, विरह अग्नि हो मंद |
          विरह अग्नि हो मंद, चंद दिन ही तो बाकी |
          महके मधु मकरंद, मस्त महिमा अम्बा की |
          मैया का आशीष, ख़त्म हो मन के दंगल |
          मिटे विरह की टीस, होय सब मंगल मंगल ||

जिन्दगी सा कुछ...!

लिएंडर मोदी !!!

गत भूपति नीतीश की, मोदी पेस विशेष |
जोड़ीदारों की खड़ी, खटिया सम्मुख रेस |

खटिया सम्मुख रेस, स्वार्थ मद अहंकार है |
जाय भाड़ में देश, जीभ में बड़ी धार है |

रविकर करिए गर्व, बनो न किन्तु घमण्डी |
तुलोगे कौड़ी मोल, अगर प्रभु मारा डंडी ||

तेरे मेरे बीच की .....


देखें सुन्दर चित्र तो, लगता बड़ा विचित्र ।
ताक रहा अपलक झलक, मनसा किन्तु पवित्र ।

मनसा किन्तु पवित्र, झलकती कैंडिल लाइट ।
किरणें स्वर्ण बिखेर, करे हैं फ्यूचर ब्राइट ।

दूर बसे सौ मील, मीत कर्मों के लेखे ।
ऋतु आये जो शरद, साल हो जाए देखे ।।

डा. गायत्री गुप्ता 'गुंजन'
अंजुमन 
यह दर्द कहाँ से आया है, क्या है यह दूजा तल्ला |
रहते हैं ताबूत सजाये, बंद पड़ा क्या उसका पल्ला |
किसने चाय बनाई होगी, पत्ती सुगर बचाई होगी -
किसको कथा सुनाती हो तुम, मचा रही क्यूँ हल्ला-गुल्ला ??

ऋतु आये जो शरद, साल हो जाए देखे -

मौलाना मुलायम और दिग्गी राजा पाकिस्तान में प्रधानमंत्री पद के मजबूत उम्मीदवार


अच्छा भला विचार है, प्यारे मित्र हरेश ।
ममता इस प्रस्ताव को, करवाएगी पेश ।

करवाएगी पेश, देश फिर बने अखंडित ।
 मिटिहै झंझट क्लेश, आप भी महिमा मंडित ।

  जागे देश अखंड, सुबह फिर इक अजान पर ।
बचता रक्षा फंड, भरोसा तालिबान पर ।।

लिएंडर मोदी !!!

गत भूपति नीतीश की, मोदी पेस विशेष |
जोड़ीदारों की खड़ी, खटिया सम्मुख रेस |

खटिया सम्मुख रेस, स्वार्थ मद अहंकार है |
जाय भाड़ में देश, जीभ में बड़ी धार है |

रविकर करिए गर्व, बनो न किन्तु घमण्डी |
तुलोगे कौड़ी मोल, अगर प्रभु मारा डंडी ||

तेरे मेरे बीच की .....


देखें सुन्दर चित्र तो, लगता बड़ा विचित्र ।
ताक रहा अपलक झलक, मनसा किन्तु पवित्र ।

मनसा किन्तु पवित्र, झलकती कैंडिल लाइट ।
किरणें स्वर्ण बिखेर, करे हैं फ्यूचर ब्राइट ।

दूर बसे सौ मील, मीत कर्मों के लेखे ।
ऋतु आये जो शरद, साल हो जाए देखे ।।

रिश्तों को निभाना सीखो

haresh Kumar
information2media
 

रिश्तों से रिसता रहे, दंभ स्वार्थ शठ-नीत ।
दोनों मन विश्वास हो, श्रृद्धा प्रेम पुनीत ।

श्रृद्धा प्रेम पुनीत,  बड़ी भंगुरता इनमे ।
लगे कांच जो ठेस, बिखर जाता है छिन  में ।

आये मुश्किल काल, चाल न चलिए भैया ।
हाथ पकड़ हर हाल, चलो तुम चढ़ा घुडैया ।।

यह स्वर्ण पंछी था कभी...


देश काल की चाल का, सही निरूपण मित्र ।
अक्षरश: हैं खींचते, चिड़िया चित्र विचित्र ।

चिड़िया चित्र विचित्र, गई अब चिड़िया सोने ।
सोने की उस काल, आज भी देख नमूने ।
 
रविकर धरिये धीर, पीर यह बढती जाए ।
जो मारे सो मीर, कहावत डाकू गाये ।।

ज़लने में कितना दर्द होता है ???

सदा 
SADA
इधर जले तन आग में, गर्म रखे माहौल ।
बाँट रहा आन्नद मिट, रहा जिन्दगी तौल ।
रहा जिन्दगी तौल, उधर जलते हैं कैसे ।
दूजे की सामृद्धि, हर्ष वेतन के पैसे ।
उसकी शर्ट सफ़ेद, भेद क्या इसमें भाई ।
ख़ुशी रहे हैं खेद, "सदा" आती उबकाई । 

"पति पर सट्टा "

Sushil 
 "उल्लूक टाईम्स "
खोजा खाजी कर रहे, रहट-हटी पति एक |
गोल गोल घूमा करे, कुआं बीच में छेंक |

कुआं बीच में छेंक, अधर्मी खोजो सेक्युलर |
जात-पांत से दूर, काटता जाए चक्कर |

पांच साल का वक्त, बुढ़ायेगा वो जैसे |
उसको करूँ विरक्त, ढूँढ़ कर दूजे भैंसे ||