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Monday, 13 August 2012

पीढ़ी दर पीढ़ी यह होगा-

इंतज़ार धूमिल आँखों का

Kailash Sharma
Kashish - My Poetry  

नौ महिने माता ढोई थी,
इर्द गिर्द तेरे जीवन था
सोई न गोदी में लेकर , 
न रोई न कभी थकी थी |

पिता बना घोडा गदहा नित, 
तेरा बोझ उठाये टहला-
मात-पिता पर तोहमत रविकर, 
दो मिनटों के सुख से पैदा -

इसीलिए क्या आज भेजता, 
वृद्धाश्रम बदला लेने को-
पत्नी के संग ऐश करेगा, 
पीढ़ी दर पीढ़ी यह होगा -

आलोचनाएं अपने गले में डाल लो !

संतोष त्रिवेदी at बैसवारी baiswari 

दबा रखो आक्रोश को, इतना अधिक अधीर |
मिर्ची खाकर दे रहे, किसके मुंह को पीर |
किसके मुंह को पीर, दफ़न कर दुश्मन मन को |
चल यमुना के तीर, साँस दे दे भक्तन को |
यह कटाक्ष यह तीर, चीर देंगे वह छाती |
मत मारो हे मीर, सहन अब न कर पाती ||

सुख दुःख से जब परे हुए हो ...

noreply@blogger.com (दिगम्बर नासवा) at स्वप्न मेरे................ 

पीले पत्ते नीचे गिरते -
घाव आज भी हरे भरे हैं |
परदे में क्या शक्ल धरे वे-
बदकिस्मत हम मरे मरे हैं |
हरियाली जो तनिक दिखी तो
रविकर पशुता चरे धरे है | 

ख़्वाबों का आना और जाना....


ख़्वाब बाँध लेंगे अगर, करें ख़्वाब न सैर |
जीवन दुखमय भोगते, बिना ख़्वाब के गैर |
बिना ख़्वाब के गैर, पैर पर चले कुल्हाड़ी |
परिवर्तन अंधेर, बोर हो जाय अनाड़ी |
खिलंदड़ा अंदाज, नहीं कुछ भी तुम बांधो |
तरह तरह से साज, साज के सरगम साधो ||

नज़रे चुरा मत लेना कभी ....

सदा
SADA

अच्छी भली सलाह पर, साधुवाद आभार |
गाँठ बाँध कर राखिये, शुभ आचार-विचार ||

सीनाजोरी कर सके, वही असल है चोर


 शालिनी कौशिक
प्रोन्नति-पैमाना बने, पिछला कौशल-कार्य |
इसमें आरक्षण गलत, नहीं हमें स्वीकार्य ||

Asha Saxena 
 इधर गहनतम तम दिखा, तमतमाय उत लोग |
तमसो मा ज्योतिर इधर, करें लोग उद्योग |
करें लोग उद्योग, उधर बस चांदी काटें |
रिश्वत चोरी छूट, लूट कर हिस्सा बाटें |
रविकर कुंठित बुद्धि, नहीं कोशिश कर जीते |
बेढब सत्तासीन, लगाते इधर पलीते ||

 (Arvind Mishra) 
 सीनाजोरी कर सके, वही असल है चोर |
माफ़ी मांगे फंसे जो, कहते उसे छिछोर ||

चाँद , उमर के साथ दिखाये , प्राणप्रिये


हरदम आकर धूम मचाये मनमौजी |
चमचे से ही हलुवा खाए मनमौजी |
तिरछे चितवन की चोरी न पकड़ी जाये-
चुपके से झट दायें बाएं मनमौजी |
चंदा सारी रात ताकता निश्चर हरकत -
चंदा मोटा हिस्सा पाए मनमौजी |
फिजा गई सड़ गल कर छोड़ी यह दुनिया-
चाँद आज भी मौज मनाये मनमौजी ||

Untitled

कविता विकास
काव्य वाटिका
मोहपाश में जकड़ी जकड़ी, कड़ी कड़ी हरदिन जोडूं |
बिखरी बिखरी तितर-बितर सब, एक दिशा में कित मोडूं |
रविकर मन की गहन व्यथा में, अक्श तुम्हारे क्यूँ छोडूं-
यादें तेरी दिव्य अमानत, यादों की लय न तोडूं ||
 संस्कारित शान्ति

कमल कुमार सिंह (नारद ) 
मुहाजिरों की बसी बस्तियां, और सरायें बनवाना |
मियांमार के मियां बुलाओ, कैम्प असम में लगवाना |
आते जाते खाते जाते, संसाधन सीमित अपने-
मनमोहन की दृष्टि मोहनी, फिर से अपनी राय बताना ||

6 comments:

  1. एक से बढ़कर एक !

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  2. अहंकार मिट जाएगा,घड़ा भरेगा जिस दिन |
    अपने भी खो जायेंगे,बियाबान में उस दिन ||

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  3. बहुत अच्छा संयोजन .........

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  4. जितनी अच्छी रचना उतनी ही उपयुक्त तस्वीरें।

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  5. मुहाजिरों की बसी बस्तियां, और सरायें बनवाना |
    मियांमार के मियां बुलाओ, कैम्प असम में लगवाना |
    आते जाते खाते जाते, संसाधन सीमित अपने-
    मनमोहन की दृष्टि मोहनी, फिर से अपनी राय बताना ||
    "मौन सिंह "को फिर चुन लाना ram ram bhai
    मंगलवार, 14 अगस्त 2012
    क्या है काइरोप्रेक्टिक चिकित्सा की बुनियाद ?
    http://veerubhai1947.blogspot.com/

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