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Tuesday, 7 August 2012

पुलिस जाय गर सुधर, ख़तम हो आधी आफत-रविकर


खाकी के प्रति नजरिया, सकते बदल अशोक |
शोक हरें निर्बलों का, दें दुष्टों को ठोक |

दें दुष्टों को ठोक, नोक पर इक चाक़ू के |
हरें शील, धन, स्वर्ण, हमेशा खाकी चूके |

सज्जन में भय व्याप्त, बढे  दुर्जन की ताकत |
पुलिस
जाय गर सुधर, ख़तम हो आधी आफत  |।

पता न था वक्त ऐसे बदल जाएगा

Maheshwari kaneri 

वक्त वक्त की बात है, बढ़िया था वह दौर |
समय बदलता जा रहा, कुछ बदलेगा और |


कुछ बदलेगा और, आग से राख हुई जो |
पानी धूप बयार, प्यार से तनिक छुई जो  |


मिट जायेगा दर्द, सर्द सी सिसकारी में |
ढक जाएगा गर्द, पुन: तन लाचारी में |

रिक्शे पर एक अमर प्रेम

रंजीत
कैन्सर-ग्रस्त जोरू हुई, जर जमीन को हार |
रिक्शा खींचे मर्द यह, बचा रहा बीमार  |


बचा रहा बीमार, साथ रहने की जिद है |
मिटने को तैयार, प्यार रविकर बेहद है |


शुभ-कामना असीम, पुरुष हों जाएँ आदी |
है पति का कर्तव्य, निभाये भरसक शादी ||  

7 comments:

  1. बहुत ही बढिया प्रस्‍तुति।

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  2. कुछ बदलेगा और, आग से राख हुई जो |
    पानी धूप बयार, प्यार से तनिक छुई जो |
    कुछ बदलेगा और, आग से राख हुई जो |
    पानी धूप बयार, प्यार से तनिक छुई जो | कोमल मानवीय अपेक्षाओं से संसिक्त रचना .नारी बचाओ ....कन्या बचाओ ..

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  3. गुप्ता जी सुन्दर लिंक और आप की टिपण्णी

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  4. पुलिस ही नहीं
    इस देश में तो
    पता नहीं किस
    किस को सुधारना है?

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  5. नेता सुधर जाएं तो पुलिस भी सुधरेगी !

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