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Sunday, 26 August 2012

फरवरी माह की टिप्पणियां : प्रवासी रविकर


पुत्र-जन्म देकर जगत, उऋण पितृ से होय ।
पुन्वंशा  कैसे  भला, माँ का  कर्ज  बिलोय ।

माँ का  कर्ज  बिलोय, जन्म पुत्रों को देती ।
रहती उनमें खोय, नहीं सृष्टी सुध लेती । 

सदा क्षम्य गुण-सूत्र, मगर कन्या न मारो ।
हुए पिता से उऋण,  कर्ज चुपचाप उतारो ।।


  चंदा का धंधा चले, कभी होय न मंद ।
गन्दा बन्दा भी भला, डाले सिक्के चंद ।
डाले सिक्के चंद, बंद फिर करिए नाहीं ।
चूसो नित मकरंद, करो पुरजोर उगाही ।
सर्वेसर्वा मस्त, तोड़ कानूनी फंदा  ।
होवे मार्ग प्रशस्त, बटोरो खुलकर चंदा ।।




शिशिर जाय सिहराय के, आया कन्त बसन्त ।
मस्ती में आकूत सब, सेवक स्वामी सन्त ।

सेवक स्वामी सन्त, हुई मादक अमराई ।
बाढ़ी चाह अनंत, जड़ो-चेतन बौराई  ।

फगुनाहट हट घोर, शोर चौतरफा फैला।
देते बांह मरोर, बना बुढवा भी छैला ।।


 
  मनोदेवता ने किया, मनोनयन मनमीत |
दिखे प्रीति या रुष्टता, होय युगल की जीत |
होय युगल की जीत, परस्पर बढे भरोसा |
माता बनती मीत, संतती पाला पोषा ||
मंगलमय हो साथ, स्वास्थ्य हो सबसे आला |
आगे पच्चिस साल,  डाल चांदी की माला ||  


 सरोकार  

सरोकार सारे रखें, अक्सर डिब्बा बन्द ।
बच्चों के इस प्रश्न को, गुणी उठायें चन्द ।
गुणी उठायें चन्द, रास्ता स्वयं निकालें ।
दें बेहतर जीवन, बना के अपना पालें ।
वन्दनीय सज्जन, सभी बच्चे हैं प्यारे ।
अभिभावक बिन किन्तु, अंध में भटकत सारे ।।


 उच्चारण -  

अपने अंतरजाल पर, इक पीपल का पेड़ ।
तोता-मैना बाज से, पक्षी जाते छेड़ ।
पक्षी जाते छेड़, बाज न फुदकी आती
उल्लू कौआ हंस, पपीहा कोयल गाती ।
 पल-पल पीपल प्राण, वायु ना देता थमने ।
पाले बकरी गाय, गधे भी नीचे अपने ।


गाँव-राँव की बात यह, आकर्षक दमदार ।
हावी कृत्रिमता हुई, लोग होंय अनुदार ।।

 लोग होंय अनुदार, गाँव की बात निराली ।
भागदौड़ के शहर, अजूबे खाली-खाली ।।

झेलें कस्बे ग्राम, मुसीबत किन्तु दांव की ।
लगे बदलने लोग, हवा अब गाँव-राँव की ।।




चक्रव्यूह साजा करे , पल-पल वक्ताचार्य ।
अभि-मन आहत हो रहा, कृष्ण-विवेकी कार्य ।
कृष्ण-विवेकी कार्य, करें कौरव अट्ठाहस ।
जायज है सन्देश , धरो पांडव सत्साहस ।
 यही युद्ध का धर्म, कर्म का लेकर डंडा ।
युद्ध-भूमि का मर्म, करो दुश्मन को ठंडा ।।

4 comments:

  1. उच्चारण -

    अपने अंतरजाल पर, इक पीपल का पेड़ ।
    तोता-मैना बाज से, पक्षी जाते छेड़ ।
    पक्षी जाते छेड़, बाज न फुदकी आती ।
    उल्लू कौआ हंस, पपीहा कोयल गाती ।
    पल-पल पीपल प्राण, वायु ना देता थमने ।प्रकृति नटी का सुन्दर मनोहारी बिम्ब क्या बात है रविकर भाई ?कृपया यहाँ भी पधारें -
    सोमवार, 27 अगस्त २०१२/
    ram ram bhai
    अतिशय रीढ़ वक्रता (Scoliosis) का भी समाधान है काइरोप्रेक्टिक चिकित्सा प्रणाली में
    http://veerubhai1947.blogspot.com/ उच्चारण -

    अपने अंतरजाल पर, इक पीपल का पेड़ ।
    तोता-मैना बाज से, पक्षी जाते छेड़ ।
    पक्षी जाते छेड़, बाज न फुदकी आती ।
    उल्लू कौआ हंस, पपीहा कोयल गाती ।
    पल-पल पीपल प्राण, वायु ना देता थमने ।
    पाले बकरी गाय, गधे भी नीचे अपने ।
    पाले बकरी गाय, गधे भी नीचे अपने ।

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  2. वाह ... बहुत बढिया लिंक्‍स

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  3. बहुत सुंदर है
    समुंदर है !

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  4. वाह ... बहुत बढिया

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