Sunday, 1 April 2012

बढ़िया वेला पाय, ठहरते सदा भगोड़े


सूली पर सिर्फ और सिर्फ तुम्हें ही चढ़ना है ............


 
दृष्टि-दोष से त्रस्त है मानव अभिनव ज्ञान ।
चौदह चश्मे चक्षु पर, चतुर चोर बैमान । 
चतुर चोर बैमान , स्वार्थी क्रूर द्विरेतस ।
बाल तरुण हो वृद्ध , सत्य भी देखे टस मस ।
दृष्टि कोण हर बार , बदलना गर्व घोष है ।
करे स्वयं पर वार बावला दृष्टि दोष है ।।
 
धर्म अपना हैं निभाती चीज सारी -
आदमी केवल बदलता जा रहा |

क़त्ल करना धर्म उनका है अगर -
मकतूल क्योंकर मर्सिया फिर गा रहा |

इक बार तो नजदीक जाओ बेखबर
शर्तिया बोलोगे कातिल भा रहा |

जिस्म के छोटे बड़े टुकड़े करे-
फेंक देता यकबयक बस कलेजा खा रहा |

पूंछ कर देखो जरा उस हुश्न से-
स्वाद कितना किस कदर है आ रहा |

मत्स्य-कन्या अप्सरा या धूर्त नागिन, 
हीरिये फिर नाम जग में छा रहा ।।
होते जब अनुकूल सब, सरपट दौड़ लगाय ।
 सम्मुख हो प्रतिकूलता, धीरे धीरे जाय । 
 धीरे धीरे जाय , धर्म अपना न छोड़े । 
बढ़िया वेला पाय, ठहरते सदा भगोड़े । 
तेरा हूँ पाबन्द, काल अन्तिम में सोते । 
समय पाय ना ठहर, जहाँ में मेरे होते ??
धारा-प्रवाह गुरु गाते हैं ,
सस्नेह अर्थ समझाते हैं ।
सुख में तो सब जी लेते 
दुःख में वे राह दिखाते हैं  ।

गंभीर धीर गुणवान प्रभु-
अनुभव को शीश झुकाते हैं ।
दुःख का विष-गरल पियो ऐसे-
शिव-शंकर ज्यों पी जाते हैं ।।
(३)
Naaz
दो राहे पर चाँदनी, चकित थकित सा सोम ।
  सूर्य धरा के फेर से, कैसे निपटूं व्योम ??

कैसे निपटूं व्योम, धरा का टुकड़ा प्यारा ।
रहा अनवरत घूम, सूर्य का मिला सहारा ।

रविकर का एहसान, जगत सारा जो चाहे ।
बड़ा धरा का मान, खड़ा बेबस दोराहे ।।
(४)
मुद्राएँ या भंगिमा, चंचल चित्त प्रदर्श ।
उत्तेजित क्रोधित बदन, चाहे होवे हर्ष ।

चाहे होवे हर्ष, वर्ष भर भरे कुलांचें  ।
तनिक हुआ आकर्ष, रोज वो सिर पर नाचें ।

रविकर साला का' न्ट , आप की हो ली होली ।
खुशियाँ सबको बाँट, डाल के भँग की गोली ।।

(५)
अरुण कुमार निगम (हिंदी कवितायेँ)
दिल के जोड़े से कहाँ, कृपण करेज जुड़ाय ।
सौ फीसद हो मामला, जाकर तभी अघाय । 

जाकर तभी अघाय, सीखना जारी रखिये ।
दर्दो-गम आनन्द, मस्त तैयारी रखिये ।

आई ना अलसाय, आईना क्यूँकर तोड़े ।
आएगी तड़पाय, बनेंगे दिल के जोड़े ।।
(६)
तीर्थ यात्रा न सही, सही यात्रा पीर ।
काशी में क्या त्यागना, बूढ़ा व्यर्थ शरीर ।

बूढा व्यर्थ शरीर, काम न किसी काज का ।
बढे दवा का खर्च, शत्रू  फल अनाज का ।

मैया मथुरा माय, मर मेहरा मेहरारू ।
वृद्धाश्रम भेज, सनक सुत *साला दारू।।
*घर / शाळा 


कासे कहूँ?
सारे दुःख की जड़ यही, रखें याद संजोय |
समय घाव न भर सका, आँखे रहें भिगोय ।


आँखे रहें भिगोय, नहीं मांगें छुटकारा  ।
सीमा में चुपचाप, मौन ही नाम पुकारा ।

रविकर पहला प्यार, हमेशा हृदय पुकारे ।
दिख जाये इक बार, मिटें दुःख मेरे सारे ।।



C


चीनी ड्रैगन लीलता, त्रिविष्टप संसार ।
दैव-शक्ति को पड़ेगा, पाना इससे पार ।


पाना इससे पार, मरे न गन से ड्रैगन ।
देखेगा गरनाल, तभी यह काँपे गन-गन ।


भरा पूर्ण घट-पाप,  दूंढ़ जग चाल महीनी ।
होय तभी यह  साफ़, बड़ी कडुवी यह चीनी ।।


गायत्री मंत्र रहस्य भाग 3 The mystery of Gayatri Mantra 3

 इस लेख का पिछला भाग यहां पढ़ें-
http://vedquran.blogspot.in/2012/03/3-mystery-of-gayatri-mantra-3.html

टंगड़ी मारे दुष्ट जन, सज्जन गिर गिर जाय ।
विद्वानों की बात को, दो दद्दा विसराय ।


 दो दद्दा विसराय, राय आस्था पर देना ।
रविकर नहीं सुहाय, नाव बालू में खेना ।


मिले सुफल मन दुग्ध, गाय हो चाहे लंगड़ी । 
वन्दनीय अति शुद्ध, मार ना "सर-मा" टंगड़ी ।।   






E

डॉ.  अनवर  जमाल  खान 
सबसे सच्चा है वही,  उससे बड़ा न कोय ।
 बादशाह के नूर से, चम्-चम् जीवन होय ।


चम्-चम् जीवन होय, बंदगी नियमित करिए ।
तन मन अपना खोय, सामने माथा धरिये ।

सबसे सच्चा दोस्त, समझ ले नादाँ बच्चा ।
कण कण में मौजूद, बादशाह रविकर सच्चा ।।
F


 नन्हे सुमन
बाबा को प्यारा लगे, मूल से ज्यादा सूद ।
एह्सासें फिर से वही, बालक रूप वजूद ।


 बालक रूप वजूद, मिली मन बाल सुन्दरी
संस्कार मजबूत, चढाते लाल चूनरी ।


मेला सर्कस देख,  चाट भी जमके चाबा ।
करें खटीमा मौज, साथ में दादी बाबा ।।


G
  रश्मि प्रभा...   वटवृक्ष पर   


नहीं  घोंसले में  लगा, मन को होता क्षोभ ।
तूफानों से डर रहा, या सजने का लोभ ।   


या सजने का लोभ, नीड़ की भीड़ गुमाए ।
जीवन का अस्तित्व, व्यर्थ ऐसे भी जाए ।

तिनके तनिक उबार,  डूबते  जहाँ  हौसले  ।
तिनके तिनके साथ, जरूरत नहीं घोंसले ।।




posted by Maheshwari kaneri at अभिव्यंजना 
रिश्ते रिसियाते रहे, हिरदय हाट बिकाय ।
परिचित बेगाने हुए, ख़ुशी हेतु भरमाय ।

ख़ुशी हेतु भरमाय, नहीं अंतर-मन देखा।
धर्म कर्म व्यवसाय, बदल ब्रह्मा का लेखा । 

  दीदी का उपदेश, सरल सा चलो समझते ।
दिल में रखे सहेज, कीमती पावन रिश्ते ।।
posted by RITU at कलमदान -
कलम माँगती दान है, कान्हा दया दिखाव ।
ऋतु आई है दीजिये, नव पल्लव की छाँव ।

नव पल्लव की छाँव, ध्यान का  द्योतक पीपल।
फिर से गोकुल गाँव, पाँव हो जाएँ चंचल ।

छेड़ो बंशी तान, चुनरिया प्रीत उढ़ाओ ।
रस्ता होवे पार, प्रभु उस नाव चढ़ाओ ।।




J
 क्यों फूलती है सांस?
साँसत में न जान हो, रखो साँस महफूज  ।
सूजे ब्रोंकाइल नली, गए फेफड़े सूज ।


 गए फेफड़े सूज, चिलम बीडी दम हुक्का ।
प्राण वायु घट जाय, लगे गर्दन में धक्का ।


रंगे हाथ फँस जाय, करे या धूर्त सियासत ।
उलटी साँस भराय, भेज दे जब *घर-साँसत ।
* काल-कोठरी
दर्शन जीवन का लिए, गीता-गीत-सँदेश |
अगर कुरेदे दिन बुरे, बाढ़े रोग-कलेश |

बाढ़े रोग-कलेश, आज को जीते जाओ |
जीते रविकर रेस, भूत-भावी विसराओ |


मध्यम चिंता-मग्न, जान जोखिम में डाले | |
दोनों ग्यानी मूर्ख, करें मस्ती मत वाले |

 

M


राखा जंगल का सदा, जानवरों ने मान |
भंडारण करते नहीं, भूख लगे लें जान |


भूख लगे लें जान, नहीं थाना विद्यालय | 
भरे पेट पर व्यर्थ, शरारत झगड़ा टालय |


सुन रे तिकड़म बाज, मिटा तू  धरती खा-खा |
शीघ्र गिरेगी गाज, बचा तो हमने राखा |

N
posted by रवीन्द्र प्रभात at वटवृक्ष -

ये लहरें ही हैं असल, अन्तर्घट-हिल्लोल |




नेह-कंकरी करे नित, तन मन में किल्लोल ||


O

posted by मनोज कुमार at विचार

धर्म-ग्रन्थ पर आस्था, निष्ठा ज्ञान करम |


केवल हिरदय शुद्धता, सुमिरो ईश परम |

सुमिरो ईश परम, साध ले सीढ़ी सातों |


हो जाओ  इरफ़ान, नूर में उसके मातो |

सद-दर्शन पहचान, सत्य अनुभव निज-अंतर |


यही नशा ले जाय, बेखुदी तक हे रविकर ||


मार्च १८ के बाद के कुछ लिंक -

१८ मार्च के बाद की मेरी टिप्पणियां  जो    
मूर्खता  दिवस पर  मेरी मूर्खता से डिलीट हो गईं ।


 यह चर्चा मंच से प्राप्त की हैं आभार ।।


 अखिल भारतीय वैश्य कवि संगम  

दाही दायम दायरा, दुःख दाई दनु दित्य ।
कच्चा जाता है चबा , चार बार यह नित्य ।


चार बार यह नित्य, रात में ताकत बढती ।
तन्हाई निज- कृत्य, रोज सिर पर जा चढती ।

इष्ट-मित्र घर दूर, महानगरों की *हाही ।
कभी न होती पूर, दायरा **दायम दाही ।।
*जरुरत **हमेशा

B

गायत्री मंत्र रहस्य भाग 3 The mystery of Gayatri Mantra 3

 इस लेख का पिछला भाग यहां पढ़ें-
http://vedquran.blogspot.in/2012/03/3-mystery-of-gayatri-mantra-3.html

टंगड़ी मारे दुष्ट जन, सज्जन गिर गिर जाय ।
विद्वानों की बात को, दो दद्दा विसराय ।


 दो दद्दा विसराय,  आस्था पर मत देना ।
रविकर नहीं सुहाय, नाव बालू में खेना ।


मिले सुफल मन दुग्ध, गाय हो चाहे लंगड़ी । 
वन्दनीय अति शुद्ध, मार ना "सर-मा" टंगड़ी ।।   
  my dreams 'n' expressions..याने मेरे दिल से सीधा कनेक्शन..


काश यही आकाश का, एकाकी एहसास ।
बरसे स्वाती बूंद सा, बुझे पपीहा प्यास ।।



  नीला अम्बर - 


दो सौ का यह आँकड़ा, मात्र आँकड़ा नाय ।
 अथक कड़ा यह आपका, श्रम नियमन बतलाय । 


श्रम नियमन बतलाय, बधाई देता रविकर ।
कविता आँसू भाव, बहाए है जो मनभर ।

बना सितारे टांक, रहा यह नीला-अम्बर ।
रहा ताक अनुशील, निखारा जिसने तपकर ।।


रेंगे वक्षस्थल  कीड़ा ।
क्या गैर उठाएगा बीड़ा ?
मजा गुदगुदी जो लेता-
सहे वही दंशी पीड़ा ।
  नारद
नारद तो बदनाम है, लगा लगा के चून ।
रंगा-बिल्ला खुब बचे, होत व्यर्थ दातून ।
होत व्यर्थ दातून, मगर हमने मुँह धोया ।
टांग वायलिन खूब, गीत-संगीत डुबोया ।
तपता रेगिस्तान, हरेरी  दिखी मदारी ।
दोस्त खींचते टांग, ताकता रहा करारी ।।
   जो मेरा मन कहे -

अंत सुनिश्चित देह का, कहते श्री यशवंत ।
अजर-अमर है आत्मा, ग्यानी गीता संत ।।

रस्ता होवे पार, प्रभु उस नाव चढ़ाओ-

दिनेश की टिप्पणी - आपका लिंक 

कलम माँगती दान है, कान्हा दया दिखाव ।
ऋतु आई है दीजिये, नव पल्लव की छाँव ।

नव पल्लव की छाँव, ध्यान का  द्योतक पीपल।
फिर से गोकुल गाँव, पाँव हो जाएँ चंचल ।

छेड़ो बंशी तान, चुनरिया प्रीत उढ़ाओ ।
रस्ता होवे पार, प्रभु उस नाव चढ़ाओ ।।

B
 ram ram bhai 
दर्शन जीवन का लिए, गीता-गीत-सँदेश |
अगर कुरेदे दिन बुरे, बाढ़े रोग-कलेश |

बाढ़े रोग-कलेश, आज को जीते जाओ |
जीते रविकर रेस, भूत-भावी विसराओ |

मध्यम चिंता-मग्न, जान जोखिम में डाले | |
दोनों ग्यानी मूर्ख, करें मस्ती मत वाले |

C
  स्वास्थ्य-सबके लिए  
साँसत में न जान हो, रखो साँस महफूज  ।
सूजे ब्रोंकाइल नली, गए फेफड़े सूज ।

 गए फेफड़े सूज, चिलम बीडी दम हुक्का ।
प्राण वायु घट जाय, लगे गर्दन में धक्का ।

रंगे हाथ फँस जाय, करे या धूर्त सियासत ।
उलटी साँस भराय, भेज दे जब *घर-साँसत ।
* काल-कोठरी

दुश्वारी में सहज, हँसी होंठों पर धरते-

दिनेश की टिप्पणी - आपका लिंक

 ठण्ड कलेजे पै गई, अब न धीर-अधीर ।
दर्शन उनके जो हुवे, करे कैद तश्वीर ।

करे कैद तश्वीर, दूसरा मन न भावे ।
मिली धीर को हीर, चीर हृदय दिखलावे ।
दीवाना दिलदार, शक्ल भायें न दूजे ।
भूल गया संसार, पड़ी जो ठण्ड कलेजे ।।
बड़े पते की बात की , जी मनोज श्रीमान ।
खनक हँसी मुस्कान से, तन मन रहे जवान ।

तन मन रहे जवान, ओढ़ ले ज्ञान लबादा ।
प्रेम नम्रता त्याग, बिठाये जीवन सादा ।

रविकर प्रभु की याद, प्रार्थना नित जो करते ।
दुश्वारी में सहज, हँसी होंठों पर धरते ।।


आधारित हर जश्न क्यूँ |
क्यों अँधेरे का नहीं सम्मान है
भाग्य में उसके बड़ा अपमान है
क्यों सदा ही रोशनी की जय कहें
सर्वदा हम क्यूँ हमारा क्षय सहें
आंकते क्यूँ लोग हैं बदतर हमें
न समझ आया कभी चक्कर हमें 
मिथ्या जगत में है बराबर योग 
पर पक्ष में तेरे खड़े हैं लोग
सब रात-दिन का देखते संयोग--
फिर मानसिकता रुग्न क्यूँ ??
तम सो मा ज्योतिर्गमय पर
आधारित हर जश्न क्यूँ ??


अनुशासित सैनिक रहें, पूरी सच्ची बात ।
द्रोही मंत्री शत्रु का, सहते हैं व्याघात ।
सहते हैं व्याघात, आपका कहना माना ।
नेता जांय सुधर, बदल यह जाय ज़माना ।
यह दलाल गठजोड़, तोड़ना सबसे भारी ।
लागा फेविकोल, रोज बढती दुश्वारी ।।
दद्दा रे दद्दा गजब, अजब खेल भगवान् ।
एक पल्लवाधार  के, दो  पल्लव अनजान ।
दो पल्लव अनजान, पल्लविक भाव पनपते ।
हो जाते कामांध, युवाजन लगे बहकने ।
पानी-पानी होंय, लगे यह कितना भद्दा ।
अंतरजाली जाल,  हाल दद्दा रे दद्दा ।। 


"उल्लूक टाईम्"
लल्लो-चप्पो चाहता, यह अदना इंसान ।
मठ-मंदिर में जा फंसे, इसी हेतु  भगवान् ।
इसी हेतु भगवान्, मिले न उनको फुर्सत।
बन जाते मेहमान, चढ़ाए जो भी रिश्वत ।
 है नजरों का खेल, भेंट करिए नजराना ।
बढे हमेशा मेल, रहेगा आना जाना ।। 



(२)



 यात्री का परिवार जब,  कर स्वागत संतुष्ट ।
मेरा घर सोता मिले, बेगम मिलती रुष्ट ।

बेगम मिलती रुष्ट, नहीं टी टी की बेगम ।
बच्चे सब शैतान, हुई जाती वो बेदम ।

 नियमित गाली खाय, दिलाये निद्रा टेन्सन ।   
चार्ज-शीट है गिफ्ट,  मरे है पाय पेन्सन ।


डॉ. अनवर जमाल
अनवर जैसे श्रेष्ठ-सभ्य, मख को जानो यज्ञ ।
मख मक्का का रूप है, समझे  स्थितिप्रज्ञ ।  

समझे स्थितिप्रज्ञ, यज्ञ यज से हज होता ।
बिना सिले दो वस्त्र, साधु सा हाजी ढोता ।

अनवर बड़े जमाल, दुष्ट को लगता गोटा ।
उलटी-पलटी चाल,  हाथ में थामे लोटा ।।

नीति नियत सब ठीक है, बेशक आप जहीन ।
कान्ग्रेस की गत वही, भैंसी आगे बीन  ।।

 MERI KAVITAYEN 
श्रम-साधक खुद्दार हो, धन से सम्यक प्यार ।
करे निरीक्षण स्वयं का, सुखमय शांति अपार ।।
चांदी का पहरा पड़ा, चाटुकार चंडाल ।
 पात पात घूमा किया, डाल डाल पड़ताल। 

डाल डाल पड़ताल, रात लम्बी हो जाती ।
घडी घडी घड़ियाल, व्यथा यह रात जगाती ।

दर्पण टूटा चाँद, जमीं पर हर दिन आता ।
कैसे जाऊं फांद, दर्द दिल का तड़पाता ।। 


टट्टू बनी शिकायती, जनता खाए जान ।
धोखे की टट्टी करे, समुचित सकल निदान ।

सैकिल से रगड़ी गई, ताकी हाथी दाँत  ।
गन्ने सा चूसी गई, फिर से वही जमात ।

झापड़ पहले खा चुकी, कमलनाल का मोह ।
दलदल से बचती फिरी,  फँसी अँधेरी खोह ।
सांस फूलने का लगा, बाबू जी को रोग |
किन्तु दवा खाएं नहीं, रहे नियम से भोग |

रहे नियम से भोग, हाल है मिसफिट जैसा |
बिन हँफनी की देह, लगे है जीवन कैसा |

मिसफिट है बेजार, खाक जीवन को कर दे |
कहीं जाय ना हार,  रंग अलबेले भर दे || 


टुकड़ों की खातिर खटे, हीरामन मनमार ।
बेफिक्री में कब उड़े, नहीं कभी इतवार ।
 





 आँख फाड़ना ताड़ना, ठंडी करना आँख ।
आँख फेरना ना कभी, बट्टा लागे शाख ।। 


My Unveil Emotions 
लूटें सपने की ख़ुशी,  ऐसे माहिर लोग ।
जैसे कुछ जाने नहीं, करते जाहिर लोग ।




करते जाहिर लोग, खबर रखते हैं सारी ।
लगे प्रेम का भोग, मगर हरदम दुश्वारी ।

दिल की दिल में गोय, रखे रविकर फिर अपने ।
तुम पर न एतबार, बिखर न जाएँ सपने ।  


  कागज मेरा मीत है, कलम मेरी सहेली...... 


दुःख की घड़ियाँ गिन रहे, घडी-घडी सरकाय ।
धीरज हिम्मत बुद्धि से, जाएगा विसराय ।


जाएगा विसराय, लगें फिर सर में गोते ।
लो मन को बहलाय, धीर सज्जन न खोते ।

चक्र समय शाश्वत , घूम लाये दिन बढ़िया ।
होना मत कमजोर, गिनों कुछ दुःख की घड़ियाँ ।।


(१५)
ऐतबार
उड़ी मुहब्बत की हँसी, गई हसीना रूठ ।
करती पहली मर्तबा, निश्चय विकट अनूठ । 

निश्चय विकट अनूठ, दर्द यह अब न सहना ।
खुद से करना नेह, नहीं भावों में बहना ।

होकर के निश्चिन्त, गुजारे अपना हर पल ।
खींची लक्ष्मण रेख, करे अब रावण क्या छल ??


ममता की फितरत गजब, अजब है इनका हाल ।
घटे समर्थक राज्य में, हैं बिगड़े सुरताल ।

 हैं बिगड़े सुरताल, मौत बच्चों की देखे ।
पीकर मरे हजार, मौत सब इसके लेखे ।

रेल बजट पर आज, करे ये नाटक भारी ।
 करे काम न काज, बिना ममता महतारी ।




जहर बुझी बातें करें, जब प्राणान्तक चोट ।  
जहर-मोहरा पीस के, लूँ दारू संग घोट ।


लूँ दारू संग घोट, पोट न तुमको पाया
मुझमे थी सब खोट, आज मै खूब अघाया ।

प्रश्न-पत्र सा ध्यान, लगाकर व्यर्थे ताका ।
अब सांसत में जान, रोज ही फटे फटाका ।। 


(१८) 
गुणवत्ता एवम संरक्षा को समर्पित   
                          
आयुध निर्माणी के ही दिवस के संग संग ,देश में प्रगति की मशाल जलवाइए |
गुणवत्ता क्रांति के सपथ को ग्रहण कर ,अस्त्र शस्त्र श्रेष्ठता की शान बन जाइए ||




रूश व अमेरिका भी दौड़  पड़ें शस्त्र हेतु ऐसे  हथियारों को  भी देश में सजाइए |
विश्व में प्रथम शक्ति बनने से पहले ही  आयुधों का विश्व  में बाजार  बन जाइए ||

वृद्धाश्रम भेज, सनक सुत *साला दारू-

दिनेश की टिप्पणी - आपका लिंक

हैं ही ना शी में भले, मंत्री कुछ हीनांग ।
ताली दे दे घी पियें, करते हर दिन स्वांग ।

करते हर दिन स्वांग, दोष ममता को लागे ।
तन मन से बीमार, करे क्यूँ बच्चा आगे ?

मारे मोहन भीष्म, लगा दर्शन का रेला ।
ठेला रेलमपेल, हुआ फिर शुरू झमेला ।। 

तीर्थ यात्रा न सही, सही यात्रा पीर ।
काशी में क्या त्यागना, बूढ़ा व्यर्थ शरीर ।

बूढा व्यर्थ शरीर, काम न किसी काज का ।
बढे दवा का खर्च, शत्रू  फल अनाज का ।

मैया मथुरा माय, मर मेहरा मेहरारू ।
वृद्धाश्रम भेज, सनक सुत *साला दारू।।
*घर / शाळा





साफ्ट टार्गेट मिल गया,  लो पच्चास बटोर ।
कान जुआं  रेंगे नहीं, खूब मचा लो शोर ।  

खूब मचा लो शोर, भोर  सोया  मतदाता ।
नेता लिया बटोर, ढोर की भाँती खाता ।

रहा रोज पगुराय, खाय पच्चास पादुका ।
फिर भी नहीं अघाय, लूटता रहा तालुका ।। 




नवगीत
वाह डाक्टर व्योम जी, व्यवहारिक कह बात ।
व्योमोदक मोदक मिले, खाए-पिए अघात ।

खाए-पिए अघात, राग की महा-विकटता ।
युग सहता आघात, व्यथित हो रही मनुजता ।

गाँधी की भरमार, कौन सा रोके आँधी ।
 ख़त्म हो रही धार, बढे है हर दिन व्याधी ।।

"आज फस्ट अप्रैल है ना!" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

पर टिप्पणी--

 


आज  मैं  ने  तो सचमुच  मूर्खता  ही  कर  डाली । ३ मार्च के बाद की साडी पोस्ट गलती से डिलीट हो गई । हाय क्या करूँ ?? आप मदद कर सकते हैं क्या ?? आज की पोस्ट भी डिलीट हो गई ।  लगभग    25 पोस्ट ।। कोई  तो मदद करो  भाई ।


 

कुंडली

नहीं बैद्यकी चल सकी, बना स्वयं ही फूल  ।
खिसियानी बिल्ली सरिस , झोंक रहा था धूल ।
झोंक रहा था धूल, बनाता बुद्धू किसको ।
था माता का स्नेह, डुबाता स्वारथ उसको ।
मानव सात अरब, मगर लक्षण का अंतर ।
मात्र चार ही वर्ग,   मिलें हर जगह निरंतर ।

१)
अत्याधिक हुशियार हैं, दुनिया मूर्ख दिखाय।
जोड़-तोड़ से हर जगह, लेते जगह बनाय ।।
२)
सचमुच में हुशियार हैं, हित पहलें ले साध ।
 कर्म वचन में धार है , बढ़ते  रहें अबाध ।।
 ३)
 इक बन्दा सामान्य है, साधे जीवन मूल ।
 कुल समाज भू देश हित, साधे सरल उसूल ।
४)
इस श्रेणी रविकर पड़ा, महामूर्ख अनजान ।
दुनियादारी से विलग, माने चतुर सयान ।।