Tuesday, 8 January 2013

सो के सत्ताधीश, गुजारे घर में सर्दी -



पाकी दो सैनिक हते, इत नक्सल इक्कीस ।
रविकर इन पर रीस है, उन पर दारुण रीस ।
 
उन पर दारुण रीस, देह क्षत-विक्षत कर दी ।
सो के सत्ताधीश, गुजारे घर में सर्दी ।

बाह्य-व्यवस्था फेल, नहीं अन्दर भी बाकी ।
सीमोलंघन खेल, बाज नहिं आते पाकी ।। 

फा़यदे का सौदा !!!

सदा 
 SADA
अपनों को गर दे ख़ुशी, सह लेना फिर कष्ट |
माँ की यह शुभ सीख भी, सदा सदा सुस्पष्ट |
सदा सदा सुस्पष्ट, *सदागम सदाबहारी |
मेरा मोहन मस्त, मातु मैं हूँ आभारी |
रविकर का आनंद, आज आंसू मत रोको |
दिखा सदा हे मातु, रास्ता शुभ अपनों को ||

*अच्छा सिद्धांत

 प्यार के बोल

Madan Mohan Saxena 
प्यारा यह अंदाज है, जहाँ चतुर्दिक प्यार |
चैन अमन हो जहाँ में, है बढ़िया हथियार |
है बढ़िया हथियार, अहिंसा से जय होती |
बापू बोले सत्य, दुश्मनी अहम् बिलोती |
प्यार प्यार बस प्यार, बढ़ाये भाई चारा |
मिल बैठें हम चार, लगे माता को प्यारा ||
 हे राम ! क्या बोल गए आसाराम ...
- महेन्द्र श्रीवास्तव

छी छी छी दारुण वचन, दारू पीकर संत ।
बार बार बकवास कर, करते पाप अनंत ।

करते पाप अनंत, कथा जीवन पर्यन्तम ।
लक्ष भक्त श्रीमन्त, अनुसरण करते पन्थम ।

रविकर बोलो भक्त, निगलते कैसे मच्छी ।
आशा उगले राम, रोज खा कर जो छिच्छी ।।

अपराध विज्ञान : हड्डियां भी बतला सकतीं है अपराधी की संभावित उम्र नस्ल और लिंग


Virendra Kumar Sharma
आगे दारुण कष्ट दे, फिर काँपे संसार |
नाबालिग को छोड़ते, जिसका दोष अपार |
जिसका दोष अपार, विकट खामी कानूनी |
भीषण अत्याचार, करेगा दुष्ट-जुनूनी |
लड़-का-नूनी काट, कहीं पावे नहिं भागे |
श्रद्धांजली विराट, तख़्त फांसी पर आगे ||

अटके रविकर प्राण, डाल पुनि नजरें प्यारी -
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प्रेम-पुजारी आपका, हाथ हमारा थाम ।

छोड़-छाड़ अब क्यूँ चली, और करे बदनाम ।


और करे बदनाम,  काम का 'पहला' बन्दा ।

क़तर-व्यौंत कतराय, क़तर मत पर आइन्दा ।


 अटके रविकर प्राण, डाल पुनि नजरें प्यारी ।

कर जारी विज्ञप्ति, मरे जब प्रेम-पुजारी ।

लड़-का-नूनी काट, कहीं पावे नहिं भागे-




अपराध विज्ञान : हड्डियां भी बतला सकतीं है अपराधी की संभावित उम्र नस्ल और लिंग


Virendra Kumar Sharma

आगे दारुण कष्ट दे, फिर काँपे संसार |
नाबालिग को छोड़ते, जिसका दोष अपार |
जिसका दोष अपार, विकट खामी कानूनी |
भीषण अत्याचार, करेगा दुष्ट-जुनूनी |
लड़-का-नूनी काट, कहीं पावे नहिं भागे |
श्रद्धांजली विराट, तख़्त फांसी पर आगे ||

दो आँखें

ऋता शेखर मधु  

आँखों में बेचैनियाँ, काँप दर्द से जाय |
सांत्वना से आपकी, नहीं रूह विलखाय |
नहीं रूह विलखाय, खाय ली देह हमारी |
लाखों लेख लिखाय, बचे पर अत्याचारी |
है भारत धिक्कार, रेप हों हर दिन लाखों |
मरें बेटियाँ रोज, देखते अपनी आँखों ||



आज दो शेर हाजिर हैं.......

पी.सी.गोदियाल "परचेत" 

 अंधड़ ! 

 तली पकौड़ी चाय हो, हो चूल्हे में आग |
प्रेयसी का भी साथ हो, जाय ठण्ड फिर भाग |
जाय ठण्ड फिर भाग, लहर लड़-शीत लहर से |
गुल लागे गुलगुला, ऊर्जा रात्रि पहर से |
रविकर पड़ा अकेल, ठण्ड से आये मितली |
दिन में लेता खेल, पकड़ कर गुल की तितली ||

गुल=कोयले का अंगारा

 प्यार के बोल

Madan Mohan Saxena 
प्यारा यह अंदाज है, जहाँ चतुर्दिक प्यार |
चैन अमन हो जहाँ में, है बढ़िया हथियार |
है बढ़िया हथियार, अहिंसा से जय होती |
बापू बोले सत्य, दुश्मनी अहम् बिलोती |
प्यार प्यार बस प्यार, बढ़ाये भाई चारा |
मिल बैठें हम चार, लगे माता को प्यारा ||

"चाय और आग" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')


डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण)  

आगे करके हाथ दो, सेंक रहे हम आग ।
शीत-लहर कटु गलन अति, जमते नदी तड़ाग ।
जमते नदी तड़ाग, गर्म कर चाय सुड़कते ।
रहे आग को खोद, आग फिर भी नहिं भड़के ।
दिल्ली दुर्जन आग, देह में ऐसी लागे ।
कर निकृष्टतम पाप, जलें जिन्दा वे आगे ।।


प्रेम या भ्रम 

 यादें - अमरेन्द्र शुक्ल -अमर  

प्रेम-पुजारी आपका, हाथ हमारा थाम ।
छोड़-छाड़ कर क्यूँ यहाँ, करे रोज बदनाम ।
करे रोज बदनाम,  काम का 'पहला' बन्दा ।
क़तर-व्यौंत कतराय, क़तर मत पर आइन्दा ।
जारी कर विज्ञप्ति,  डाल नजरें फिर प्यारी ।
रविकर पास प्रमाण, श्रेष्ठ यह प्रेम पुजारी ।




कर निकृष्टतम पाप, जलें जिन्दा वे आगे -




अपराध विज्ञान : हड्डियां भी बतला सकतीं है अपराधी की संभावित उम्र नस्ल और लिंग


Virendra Kumar Sharma
आगे दारुण कष्ट दे, फिर काँपे संसार |
नाबालिग को छोड़ते, जिसका दोष अपार |
जिसका दोष अपार, विकट खामी कानूनी |
भीषण अत्याचार, करेगा दुष्ट-जुनूनी |
लड़-का-नूनी काट, कहीं पावे नहिं भागे |
श्रद्धांजली विराट, तख़्त फांसी पर आगे ||

दो आँखें

ऋता शेखर मधु  

आँखों में बेचैनियाँ, काँप दर्द से जाय |
सांत्वना से आपकी, नहीं रूह विलखाय |
नहीं रूह विलखाय, खाय ली देह हमारी |
लाखों लेख लिखाय, बचे पर अत्याचारी |
है भारत धिक्कार, रेप हों हर दिन लाखों |
मरें बेटियाँ रोज, देखते अपनी आँखों ||


प्रेम या भ्रम 

 यादें - अमरेन्द्र शुक्ल -अमर  

प्रेम-पुजारी आपका, हाथ हमारा थाम ।
छोड़-छाड़ कर क्यूँ यहाँ, करे रोज बदनाम ।
करे रोज बदनाम,  काम का 'पहला' बन्दा ।
क़तर-व्यौंत कतराय, क़तर मत पर आइन्दा ।
जारी कर विज्ञप्ति,  डाल नजरें फिर प्यारी ।
रविकर पास प्रमाण, श्रेष्ठ यह प्रेम पुजारी ।

"चाय और आग" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')


डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण)  

आगे करके हाथ दो, सेंक रहे हम आग ।
शीत-लहर कटु गलन अति, जमते नदी तड़ाग ।
जमते नदी तड़ाग, गर्म कर चाय सुड़कते ।
रहे आग को खोद, आग फिर भी नहिं भड़के ।
दिल्ली दुर्जन आग, देह में ऐसी लागे ।
कर निकृष्टतम पाप, जलें जिन्दा वे आगे ।।

  एक अमीर बलात्कारी --


  छी छी छी दारुण वचन, दारू पीकर संत ।

बार बार बकवास कर, करते पाप अनंत ।


करते पाप अनंत, कथा जीवन पर्यन्तम ।

लक्ष भक्त श्रीमन्त, अनुसरण करते पन्थम ।


रविकर बोलो भक्त, निगलते कैसे मच्छी । 
आशा उगले राम, रोज खा कर जो छिच्छी ।।

 इम्तिहान ले सिखा के, गुरुवर बेहद शख्त ।
इम्तिहान पहले लिया, बाद सिखाये वक्त ।|

ठोकर खाकर गिर गया, झाड़-झूड़ कर ठाढ़ ।
  गर सीखा फिर भी नहीं, पाए कष्ट प्रगाढ़ ।।

 लिए अमोलक निधि चले, रक्षा तंत्र नकार ।
उधर लुटेरे ताड़ते, कैसे हो उद्धार ??

   अनदेखी दायित्व की, खींच महज इक रेख ।
 लक्ष्मण की मजबूरियां, सिया-हरण ले देख ।।

सज्जन-चुप दुर्जन-चतुर, छले छाल नित राम  |
भक्त श्रमिक आसक्त अघ, रखे  काम से काम |

अघ=पापी
 काम=महादेव, विष्णु , कामदेव, कार्य, सहवास की इच्छा आदि

आज दो शेर हाजिर हैं.......

पी.सी.गोदियाल "परचेत" 
 अंधड़ ! 

 तली पकौड़ी चाय हो, हो चूल्हे में आग |
प्रेयसी का भी साथ हो, जाय ठण्ड फिर भाग |
जाय ठण्ड फिर भाग, लहर लड़-शीत लहर से |
गुल लागे गुलगुला, ऊर्जा रात्रि पहर से |
रविकर पड़ा अकेल, ठण्ड से आये मितली |
दिन में लेता खेल, पकड़ कर गुल की तितली ||
 


गुल=कोयले का अंगारा

Monday, 7 January 2013

आशा उगले राम, रोज खा कर जो छिच्छी -



एक अमीर बलात्कारी --


ZEAL 
  छी छी छी दारुण वचन, दारू पीकर संत ।
बार बार बकवास कर, करते पाप अनंत ।

करते पाप अनंत, कथा जीवन पर्यन्तम ।
लक्ष भक्त श्रीमन्त, अनुसरण करते पन्थम ।

रविकर बोलो भक्त, निगलते कैसे मच्छी । 
आशा उगले राम, रोज खा कर जो छिच्छी ।।


दामिनी का अपनों के नाम सन्देश !


संतोष त्रिवेदी 
  बैसवारी baiswari 

 मिनी इण्डिया जागता, सोया भारत देश |
फैली मृग मारीचिका, भला करे आवेश |

भला करे आवेश, रेस नहिं लगा नाम हित |
लगी मर्म पर ठेस, जगाये रखिये यह नित |

करिए औरत मर्द, सुरक्षित दिवस यामिनी |
रक्षित नैतिक मूल्य, बचाए सदा दामिनी ||




DR. ANWER JAMAL 

 Mushayera - 

शब्द शब्द अंगार है, धारदार हथियार |
नहीं दुश्मनी से भला, मित्र बांटिये प्यार |

मित्र बांटिये प्यार, भूख इक सी ही होवे |
बच्चों को अधिकार, कभी नहिं दुःख से रोवे  |

अपना अपना धर्म, नियम से अगर निभाओ |
हर बन्दे में ईश, सामने दर्शन पाओ || 

दोहे  
 इम्तिहान ले सिखा के, गुरुवर बेहद शख्त ।
इम्तिहान पहले लिया, बाद सिखाये वक्त ।|

ठोकर खाकर गिर गया, झाड़-झूड़ कर ठाढ़ ।
  गर सीखा फिर भी नहीं, पाए कष्ट प्रगाढ़ ।।

 लिए अमोलक निधि चले, रक्षा तंत्र नकार ।
उधर लुटेरे ताड़ते, कैसे हो उद्धार ??

   अनदेखी दायित्व की, खींच महज इक रेख ।
 लक्ष्मण की मजबूरियां, सिया-हरण ले देख ।।

सज्जन-चुप दुर्जन-चतुर, छले छाल नित राम  |
भक्त श्रमिक आसक्त अघ, रखे  काम से काम |

अघ=पापी
 काम=महादेव, विष्णु , कामदेव, कार्य, सहवास की इच्छा आदि

Sunday, 6 January 2013

बदले काली सोच, पंख जो रही कतरती-



सर्द अहसास !

पी.सी.गोदियाल "परचेत" 
जीना बन देता चढ़ा, दस मंजिल मजबूत |
है जीना किस हेतु तब, प्रश्न पूछता पूत |

प्रश्न पूछता पूत, पिता जी मकसद भूला |
भूल गया वह सीख, आज हूँ लंगडा लूला |

बढ़ी विश्व रफ़्तार, जाय दुत्कार सही ना |
अंधड़ गया उजाड़, कठिन है ऐसे जीना ||
जीना= सीढ़ी



राम के भक्त कहाँ, बन्दा-ए- रहमान कहाँ


DR. ANWER JAMAL 
 Mushayera - 

शब्द शब्द अंगार है, धारदार हथियार |
नहीं दुश्मनी से भला, मित्र बांटिये प्यार |
मित्र बांटिये प्यार, भूख इक सी ही होवे |
बच्चों को अधिकार, कभी नहिं दुःख से रोवे  |
अपना अपना धर्म, नियम से अगर निभाओ |
हर बन्दे में ईश, सामने दर्शन पाओ || 

"ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-27

रही कतरती कल्पनी, शुभ्र-कल्पना-पंख |
मानहुँ अब कल्पांत का, कल्कि बजाये शंख |
कल्कि बजाये शंख, दंश गहरे अति गहरे |
दुष्ट कुतर्की लंठ, कल्कि के सम्मुख ठहरे |
रविकर कर संकल्प, बचाए पावन धरती |
बदले काली सोच, पंख जो रही कतरती ||
कल्पनी=कैंची
बैसवारी baiswari 

 मिनी इण्डिया जागता, सोया भारत देश |
फैली मृग मारीचिका, भला करे आवेश |


भला करे आवेश, रेस नहिं लगा नाम हित |
लगी मर्म पर ठेस, जगाये रखिये यह नित |


करिए औरत मर्द, सुरक्षित दिवस यामिनी |
रक्षित नैतिक मूल्य, बचाए सदा दामिनी ||


 अंधों की भरमार है, मार बिना चालाक |
सीधी राहों पर चलें, थामे अपनी नाक |
 
थामे अपनी नाक, नदी में रहे डूबते |
फिर भी है विश्वास, ठगी से नहीं ऊबते |
 
ढकोसलों की जीत, जीत है इन धंधों की |
भटके प्रभु को भूल, दुर्दशा है अंधों की ||

दामिनी के दोस्त का बयान और शर्मशार मानवता !!


 (पूरण खंडेलवाल) 

दुनिया भागमभाग में, घायल पड़ा शरीर |
सुने नहीं कोई वहां, करे बड़ी तकरीर |
करे बड़ी तकरीर, सोच क्या बदल चुकी है |
नहीं बूझते पीर, निगाहें आज झुकी हैं |
सामाजिक कर्तव्य, समझना होगा सबको |
अरे धूर्तता छोड़, दिखाना है मुँह रब को ||


रहा सुलगता प्यार, धुँआ परदे दर परदे -





































 परदे पर लगती हवा, हुआ कलेजा चाक ।
 लट्टू-कंचा खेलते, ताक-झाँक आवाक ।
ताक-झाँक आवाक, श्याम-पट चित्र उकेरा ।
चाक लिए रंगीन, लगाया करता फेरा ।
 हुई निगाहें चार, पीर कोई क्यों हर दे ।
रहा सुलगता प्यार, धुँआ परदे दर परदे ।।

दे सटीक सन्देश, देह का करिए आदर




हर वाशिंदा मोहल्ले का,तबसे ही वक्त पर घर पहुँचने लगा है।

पी.सी.गोदियाल "परचेत" 

 दोष पड़ोसन का नहीं, बिगड़ा बड़ा पड़ोस |
अंधड़ आते इस कदर, रहे नहीं तब होश |

रहे नहीं तब होश, रोस में कई पडोसी |
लेकर क्यूँ नहिं भगा, ताव खा कहते जोशी |

हुआ पडोसी मस्त, दिवाली से घर रोशन |
देख उसे खुशहाल, लगाती दोष पड़ोसन |

 

 

दामिनी के दोस्त का बयान और शर्मशार मानवता !!

 (पूरण खंडेलवाल) 

दुनिया भागमभाग में, घायल पड़ा शरीर |
सुने नहीं कोई वहां, करे बड़ी तकरीर |
करे बड़ी तकरीर, सोच क्या बदल चुकी है |
नहीं बूझते पीर, निगाहें आज झुकी हैं |
सामाजिक कर्तव्य, समझना होगा सबको |
अरे धूर्तता छोड़, दिखाना है मुँह रब को ||

फुर्सत


रचना दीक्षित 


 कृष्णा की डोरी जटिल, बाँध गया मन मोर ।
ज्यों ज्यों जूझूँ गाँठ से, त्यों त्यों उलझे डोर ।।



लम्पट सत्तासीन, कमीशन खोर विधाता-रविकर

करदाता के खून को, ले निचोड़ खूंखार | 
 रविकर बन्दर-बाँट से, होता दर्द अपार |

होता दर्द अपार, बड़े कर के कर चोरी |
भोगें धन-ऐश्वर्य, खींचते सत्ता डोरी |


लम्पट सत्तासीन, कमीशन खोर विधाता | 
जीना है दुश्वार, मरे सच्चा करदाता ||
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"धूप ज़रा मुझ तक आने दो" (चर्चा मंच-१११६)



डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) 

सुन्दर चर्चा-मंच का, गुरुवर श्री गणेश |
अति उपयोगी लिंक से, जागृति होता देश |
जागृति होता देश, केश अब फास्ट ट्रैक पर |
दे सटीक सन्देश, देह का करिए आदर |
शाश्वत नैतिक मूल्य, सीख उच्छ्रिन्खल भोगी |
फांसी का कानून, अन्यथा अति उपयोगी ||

Saturday, 5 January 2013

ज्यों ज्यों जूझूँ गाँठ से, त्यों त्यों उलझे डोर -



"धूप ज़रा मुझ तक आने दो" (चर्चा मंच-१११६)

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) 

सुन्दर चर्चा-मंच का, गुरुवर श्री गणेश |
अति उपयोगी लिंक से, जागृति होता देश |
जागृति होता देश, केश अब फास्ट ट्रैक पर |
दे सटीक सन्देश, देह का करिए आदर |
शाश्वत नैतिक मूल्य, सीख उच्छ्रिन्खल भोगी |
फांसी का कानून, अन्यथा अति उपयोगी ||


फुर्सत

रचना दीक्षित 

 कृष्णा की डोरी जटिल, बाँध गया मन मोर ।
ज्यों ज्यों जूझूँ गाँठ से, त्यों त्यों उलझे डोर ।।

दूध की धुली नारियाँ -

सच्चित-सचिन  

लज्जा की प्रतिमूर्ति को, मिला नपुंसक नाथ |
काम वासना के लिए, क्यूँ ढूँढे नहिं पाथ ?

क्यूँ ढूँढे नहिं पाथ, उसे भी ज्वर चढ़ता है |
जो भी हत्थे चढ़े, सहारा बन बढ़ता है |

माने रविकर पक्ष, बिगाड़े पर क्या काकी ?
फ़ोकट में दे पाठ, बात समझो लज्जा की ||

Dr (Miss) Sharad Singh 
लक्ष्मण रेखा खींच के, जाय बहाना पाय ।
खून बहाना लूटना, दे मरजाद मिटाय ।
दे मरजाद मिटाय, सदी इक्कीस आ गई ।
किन्तु सोच उन्नीस, बढ़ी है नीच अधमई ।
पुरुषों के कुविचार, जले पर केवल रावण।
 रेखा चलूं नकार, पुरुष भव खींचा, लक्ष्मण ।

"रोज-रोज ही गीत नया है गाना" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) 
गा गा कर जिंदगी बिताना |
फिर भी दुनिया मारे ताना |
अश्रु बहाना तन तड़पाना-
सम्मुख आये, करे बहाना ||