Tuesday, 17 September 2013

प्रेम बुद्धि बल पाय, मूर्ख रविकर है माता -

दंगो को प्रायोजित तौर  पर भड़काया जाता है 

बाकी बातें बाद में, सबसे आगे वोट |
करते हमले ओट से, खर्च करोड़ों नोट | 

खर्च करोड़ों नोट, चोट पीड़ा पहुँचाये |
पीते जाते रक्त, माँस अपनों का खायें |

अग्गी करके धूर्त, दिखाते हैं चालाकी |
जाँय अंतत: हार, दिखी "पूरण" बेबाकी ||


मुखड़ा है निस्तेज, नारियां लगती माँदी-

टकी टकटकी थी लगी, जन्म *बेटकी होय |
अटकी-भटकी साँस से, रह रह कर वह रोय |

रह रह कर वह रोय, निहारे अम्मा दादी |
मुखड़ा है निस्तेज, नारियां लगती माँदी |

परम्परा प्रतिकूल, बेटकी रविकर खटकी |
किस्मत से बच जाय, कंस तो निश्चय पटकी ||
*बेटी

हम बेटी के बाप, हमेशा रहते चिंतित-

चिंतित मानस पटल है, विचलित होती बुद्धि |
प्रतिदिन पशुता बलवती, दुष्कर्मों में वृद्धि |

दुष्कर्मों में वृद्धि, कहाँ दुर्गा है सोई |
क्यूँ नहिं होती क्रुद्ध, जगाये उनको कोई |

कर दे माँ उपकार, दया कर दे माँ समुचित |
हम बेटी के बाप,  हमेशा रहते चिंतित || 

पापा मेरी भी शादी करवा दो ना 
पूरे हों अरमान आपके, होना चाहो खेत |
लड्डू खा के हो गए, कितने मूर्ख अचेत |


कितने मूर्ख अचेत, निकलता तेल रेत में  |

होंगी मटियामेट, ख्वाहिशें सेत-मेत में |


नहीं रहें अरमान, शौक ना रहें अधूरे |

शेष बचे दिन चार, राम जी कर दो पूरे ||

मचा रहे हल्ला सभी, कभी नहीं हों मौन |
मची हुई है होड़ नित, आगे निकले कौन |

आगे निकले कौन, लगाते कसके नारे |
काली पीली दाल, गलाके छौंक बघारें |

रचते नित षड्यंत्र, चलें तलवार तमंचा |
छौंक छौंक के दाल, हुआ अब काला चमचा ||

प्रेम बुद्धि बल पाय, मूर्ख रविकर क्यूँ माता -

पर मेरी प्रस्तुति 

माता निर्माता निपुण, गुणवंती निष्काम ।
सृजन-कार्य कर्तव्य सम, सदा काम से काम ।

सदा काम से काम, पिंड को रक्त दुग्ध से । 
सींचे सुबहो-शाम, देवता दिखे मुग्ध से । 

देती दोष मिटाय, सकल जग शीश नवाता । 
प्रेम बुद्धि बल पाय,  मूर्ख रविकर है माता -



विवादास्पद सुन बयाँ, जन-जन जाए चौंक |
नामुराद वे आदतन, करते पूरा शौक |

करते पूरा शौक, छौंक शेखियाँ बघारें |
बात करें अटपटी, हमेशा डींगे मारें |

रखते सीमित सोच, ओढ़ते छद्म लबादा |
खोलूं इनकी पोल, करे रविकर कवि वादा |

ले पहले घर देख, ताकना फिर मस्जिद में-

फिर भी दिल्ली दूर है, नहीं राह आसान |
अज्ञानी खुद में रमे, परेशान विद्वान |

परेशान विद्वान, बड़े भी अपनी जिद में |
ले पहले घर देख, ताकना फिर मस्जिद में | 

डंडे से ही खेल, नहीं पायेगा गिल्ली |
आस-पास बरसात, तरसती फिर भी दिल्ली || 

(आज के राजनैतिक माहौल पर)
नीले रंग में मुहावरे हैं-


नागिन जब लेती लगा, जबरदस्त दो पंख -
ढले एक टकसाल के, 
गिरते गए समान । 
पहला गिरके खनकता,
दूजे को नहिं भान-    
थमो थमो दोनों थमो । 

झुके झुके लेते चुरा,
एम् बी ए अब ऊंट ।
छली बली बाजार है, 
बिके कान का खूंट -
रमो रमो तुम भी रमो ॥ 

नागिन जब लेती लगा,
जबरदस्त दो पंख । 
सिक्युरिटी बिल में मिले  
व्यर्थ बजाते शंख -
नमो नमो भज मन नमो ॥ 

गुजराती ताला भला, 
लगा रहे किस ठौर । 
अरहर की टट्टी खड़ी -
किया कभी क्या गौर -
जमो जमो तुम ही जमो ॥ 

Thursday, 12 September 2013

नमो नमो ले बोल, महापरिवर्तन आये -


क्या तुम्हें चाहिए ?

Amrita Tanmay 

 मरती आरुषि महल में, काटी थी तलवार |
जिनसे मिलता प्यार था, करते वे ही वार |

करते वे ही वार, किसे तलवार चाहिए -
कितना चुके लताड़, इन्हें तो मार चाहिए | 

करे धनुष टंकार, मुफ्त हो जाए धरती |
मरे नहीं कुविचार, दिखे नहिं आरुषि मरती ||



साथ सुता के सो ले बाबा-


अंध-भक्ति श्रद्धा जब बाढ़ी ।
झोंके लोग कमाई गाढ़ी । 
पर डूबे सागर में *पाढ़ी ।
काली दाढ़ी उजली दाढ़ी -
विष जीवन में घोले बाबा ।  भोले बाबा भोले बाबा ॥

पढ़े लिखे लोगों की मर्जी ।
शायद हों बाबा के करजी ।
संत कृपा की खातिर अर्जी ।
ना जाने कैसी खुदगर्जी ।
साथ सुता के सो ले बाबा । भोले बाबा भोले बाबा ॥


किया कलेजा चाक, आज कहते हो झूठी -

झूठी कहते ना थको, व्यर्थ बको अविराम ।
याद करो उस शाम को, जब थे लोग तमाम । 

जब थे लोग तमाम, वहाँ बक्कुर नहिं फूटा ।
फूटी किस्मत हाय,  तभी दिल रविकर टूटा ।

रही मुहब्बत पाक, किन्तु मैं तुझ से रूठी ।
किया कलेजा चाक,  आज कहते हो झूठी ॥


गई शक्ति-मिल दुष्ट क्लीव को -

  •  नहा खून से हर हर गंगे |
  • बहा खून ले, दर दर दंगे |
  • भंग व्यवस्था लंगु प्रशासन 
  • सड़कों पर दुर्दांत लफंगे । 
  • जब मारक आघात करें | बोलो किसकी बात करें ॥ 
  • जहाँ प्रवंचक प्रवचन करते । 
  • श्रोता मकु तरते ना तरते । 
  • लम्बी चौड़ी हांक हांक के 
  • दारुण दुःख हरते ना हरते -
  • हरते सिया बलात धरें । बोलो किसकी बात करें ॥ 



मृगया करने नृप जाय कहाँ मृगया खुद षोडश ने कर डाला-


जब रूपसि-रंगत नैन लखे तब रंग जमे मितवा मतवाला |
चढ़ जाय नशा उतरे न कभी अब भूल गया मनुवा मधुशाला 
मृगया करने नृप जाय कहाँ मृगया खुद षोडश ने कर डाला |
नवनीत चखी चुपचाप सखी  फिर छोड़ गई वह सुन्दर बाला ||


फूटी किस्मत हाय, तभी दिल रविकर टूटा -


क्या तुम्हें चाहिए ?

Amrita Tanmay 

 मरती आरुषि महल में, काटी थी तलवार |
जिनसे मिलता प्यार था, करते वे ही वार |

करते वे ही वार, किसे तलवार चाहिए -
कितना चुके लताड़, इन्हें तो मार चाहिए | 

करे धनुष टंकार, मुफ्त हो जाए धरती |
मरे नहीं कुविचार, दिखे नहिं आरुषि मरती ||



साथ सुता के सो ले बाबा-


अंध-भक्ति श्रद्धा जब बाढ़ी ।
झोंके लोग कमाई गाढ़ी । 
पर डूबे सागर में *पाढ़ी ।
काली दाढ़ी उजली दाढ़ी -
विष जीवन में घोले बाबा ।  भोले बाबा भोले बाबा ॥

पढ़े लिखे लोगों की मर्जी ।
शायद हों बाबा के करजी ।
संत कृपा की खातिर अर्जी ।
ना जाने कैसी खुदगर्जी ।
साथ सुता के सो ले बाबा । भोले बाबा भोले बाबा ॥


किया कलेजा चाक, आज कहते हो झूठी -

झूठी कहते ना थको, व्यर्थ बको अविराम ।
याद करो उस शाम को, जब थे लोग तमाम । 

जब थे लोग तमाम, वहाँ बक्कुर नहिं फूटा ।
फूटी किस्मत हाय,  तभी दिल रविकर टूटा ।

रही मुहब्बत पाक, किन्तु मैं तुझ से रूठी ।
किया कलेजा चाक,  आज कहते हो झूठी ॥


गई शक्ति-मिल दुष्ट क्लीव को -

  •  नहा खून से हर हर गंगे |
  • बहा खून ले, दर दर दंगे |
  • भंग व्यवस्था लंगु प्रशासन 
  • सड़कों पर दुर्दांत लफंगे । 

  • जब मारक आघात करें | बोलो किसकी बात करें ॥ 

  • जहाँ प्रवंचक प्रवचन करते । 
  • श्रोता मकु तरते ना तरते । 
  • लम्बी चौड़ी हांक हांक के 
  • दारुण दुःख हरते ना हरते -

  • हरते सिया बलात धरें । बोलो किसकी बात करें ॥ 



मृगया करने नृप जाय कहाँ मृगया खुद षोडश ने कर डाला-


जब रूपसि-रंगत नैन लखे तब रंग जमे मितवा मतवाला |
चढ़ जाय नशा उतरे न कभी अब भूल गया मनुवा मधुशाला 
मृगया करने नृप जाय कहाँ मृगया खुद षोडश ने कर डाला |
नवनीत चखी चुपचाप सखी  फिर छोड़ गई वह सुन्दर बाला ||

Monday, 9 September 2013

रचना उसे नकार, बघारे हर पल शेखी -


क्षिति को शिला जीत उकसाए । कामातुर अँधा हो जाए ।

"ओ बी ओ लाइव महा उत्सव"अंक - 35

एक भाव-तीन विधा
कुण्डलियाँ 

क्षिति जल पावक नभ हवा, घटिया कच्चा माल ।
निर्माना पारम्परिक, दिया शोध बिन ढाल ।

दिया शोध बिन ढाल,  प्रदूषित-जल, छल-"काया" ।
रविकर पावक बाल, दंभ ने गाल बजाया ।

हवा होय अनुरक्ति, गगन पर थूके हर पल ।
निर्माता आलस्य, भस्म बन जाए "क्षिति" जल ॥

सवैया छंद

निरमान करे जल से क्षिति सान समीर अकाश सुखावत है |
पर पुष्ट नहीं हुइ पावत जू तब पावक पिंड पकावत है |
जब काम बढे प्रभु नाम बढे, तब ठेकप काम करावत है |
परदूषित पंचक तत्व मिले,  बन मानव दानव आवत है ||

चौपाई

क्षिति जल पावक गगन समीरा
घटिया दूषित जमा जखीरा ।
छली बली है खनन माफिया ।
आम हुई है रपट खूफिया ॥

निर्माता अब देता ठेके ।
बना बना के जस तस फेंके ॥
आलोचना सदैव अखरती ।
निंदा आग बबूला करती ॥

क्षिति को शिला जीत उकसाए ।
कामातुर अँधा हो जाए ।
आसमान पर थूका करता ।
मानव बरबस पानी भरता ।

नीति-नियम का उल्लंघन कर ।
 करता जलसे मानव अक्सर ॥
हवा हवाई किले बनाता ।
किन्तु नहीं चिंतित निर्माता ॥


मिटता क्यूँ अस्तित्व, पड़े नहिं रविकर पल्ले -

पल्ले चौखट चौकियाँ, पशोपेश में देश |
जला अन्तत: पूर्णत:  वृक्ष हुआ नि:शेष |

वृक्ष हुआ नि:शेष, बड़े फल-फूल खिलाये |
दे आराम विशेष, जीव जो नीचे आये |

खेलकूद त्यौहार, शादियाँ इसके तल्ले |
मिटता क्यूँ अस्तित्व, पड़े नहिं रविकर पल्ले || 

रचना उसे नकार, बघारे हर पल शेखी-

निर्माता के प्रति दिखे, अब निर्मम व्यवहार |
हृष्ट-पुष्ट होकर बढ़े, रचना उसे नकार |

रचना उसे नकार, बघारे हर पल शेखी |
पाय ममत्व-दुलार, करे उसकी अनदेखी |

मद में मानव चूर, आपदा पर हकलाता |
हो जाता मजबूर, याद आये निर्माता || 

हम बेटी के बाप, हमेशा रहते चिंतित-

चिंतित मानस पटल है, विचलित होती बुद्धि |
प्रतिदिन पशुता बलवती, दुष्कर्मों में वृद्धि |

दुष्कर्मों में वृद्धि, कहाँ दुर्गा है सोई |
क्यूँ नहिं होती क्रुद्ध, जगाये उनको कोई |

कर दे माँ उपकार, दया कर दे माँ समुचित |
हम बेटी के बाप,  हमेशा रहते चिंतित || 



तुस्टीकरण का यह खेल कहाँ तक ले जाएगा !!

पूरण खण्डेलवाल 
इनके तुष्टिकरण से, पक्की क्रिस्टी जीत |
उनके रुष्टीकरण से, फिर क्या डरना मीत |
फिर क्या डरना मीत, रीत यह बहुत पुरानी |
करता रहा अतीत, यही कर नाना नानी |
किये आज तक राज, किन्तु अब माथा ठनके |
खतरे में अस्तित्व, राज में रविकर इनके || 



सेकुलरों का राजधर्म

कमल कुमार सिंह (नारद ) 




चोरों के सरदार पर, लगा बड़ा आरोप । 
आरोपी खुद हट रहा, क्वारा बबलू थोप  । 

क्वारा बबलू थोप, कोप क्यूँकर वह झेले । 
कब तक आखिर बैठ, गोद में माँ की खेले । 

देता गेंद उछाल, कालिया किंवा लोके । 
अब तो मोहन मस्त,  साथ बैठा चोरों के । 

खतरे में अस्तित्व, राज में रविकर इनके-

तुस्टीकरण का यह खेल कहाँ तक ले जाएगा !!

पूरण खण्डेलवाल 
इनके तुष्टिकरण से, पक्की क्रिस्टी जीत |
उनके रुष्टीकरण से, फिर क्या डरना मीत |
फिर क्या डरना मीत, रीत यह बहुत पुरानी |
करता रहा अतीत, यही कर नाना नानी |
किये आज तक राज, किन्तु अब माथा ठनके |
खतरे में अस्तित्व, राज में रविकर इनके || 



सेकुलरों का राजधर्म

कमल कुमार सिंह (नारद ) 




चोरों के सरदार पर, लगा बड़ा आरोप । 
आरोपी खुद हट रहा, क्वारा बबलू थोप  । 

क्वारा बबलू थोप, कोप क्यूँकर वह झेले । 
कब तक आखिर बैठ, गोद में माँ की खेले । 

देता गेंद उछाल, कालिया किंवा लोके । 
अब तो मोहन मस्त,  साथ बैठा चोरों के । 

प्रेम बुद्धि बल पाय, मूर्ख रविकर क्यूँ माता -

पर मेरी प्रस्तुति 

माता निर्माता निपुण, गुणवंती निष्काम ।
सृजन-कार्य कर्तव्य सम, सदा काम से काम ।

सदा काम से काम, पिंड को रक्त दुग्ध से । 
सींचे सुबहो-शाम, देवता दिखे मुग्ध से । 

देती दोष मिटाय, सकल जग शीश नवाता । 
प्रेम बुद्धि बल पाय,  मूर्ख रविकर क्यूँ माता  ??



Sunday, 8 September 2013

कब तक आखिर बैठ, गोद में माँ की खेले-




सेकुलरों का राजधर्म

कमल कुमार सिंह (नारद ) 



चोरों के सरदार पर, लगा बड़ा आरोप । 
आरोपी खुद हट रहा, क्वारा बबलू थोप  । 

क्वारा बबलू थोप, कोप क्यूँकर वह झेले । 
कब तक आखिर बैठ, गोद में माँ की खेले । 

देता गेंद उछाल, कालिया किंवा लोके । 
अब तो मोहन मस्त,  साथ बैठा चोरों के । 

शठ-सत्ता की समझ ले, पुन: जीत आसान -

सन्ता-बन्ता पर टिके, यदि जनता का ध्यान |
शठ-सत्ता की समझ ले, पुन: जीत आसान |

पुन: जीत आसान, म्यान में रख तलवारें |
जान-बूझ कर जान, आम-जनता की मारें |

इक प्रकोष्ठ तैयार, ढूँढ़ता सकल अनन्ता |
मिला नया हथियार, और कुछ घेरें सन्ता || 


रविकर रह चैतन्य, अन्यथा उघड़े बखिया -

बखियाने से साड़ियाँ, बने टिकाऊ माल | 
लेकिन खोंचा मार के, कर दे दुष्ट बवाल |

कर दे दुष्ट बवाल, भूख नहिं देखे जूठा |
सोवे टूटी खाट, नींद का नियम अनूठा |

खोंच नींद तन भूख, कभी भी देगा लतिया |
रविकर रह चैतन्य, अन्यथा उघड़े बखिया || 





प्रेम बुद्धि बल पाय, मूर्ख रविकर क्यूँ माता -

पर मेरी प्रस्तुति 

माता निर्माता निपुण, गुणवंती निष्काम ।
सृजन-कार्य कर्तव्य सम, सदा काम से काम ।

सदा काम से काम, पिंड को रक्त दुग्ध से । 
सींचे सुबहो-शाम, देवता दिखे मुग्ध से । 

देती दोष मिटाय, सकल जग शीश नवाता । 
प्रेम बुद्धि बल पाय,  मूर्ख रविकर क्यूँ माता  ??