Wednesday, 25 September 2013

मुर्गे की इक टांग से, कंठी माला टांग-


वर्धा ब्लॉगर सम्मलेन -जो किसी ने नहीं लिखा!

noreply@blogger.com (arvind mishra) 

मुर्गे की इक टांग से, कंठी माला टांग |
उटपटांग हरकत करे, कूद फांद फर्लांग |
कूद फांद फर्लांग , बांग मुर्गा जब देता |
पंडित करते स्वांग, ॐ बोले अभिनेता |
अभिनय में उस्ताद, सोचते हैं आगे की |
अगर गले ना दाल, तब टांग चले मुर्गे की || 


क्यों बीमार है राष्ट्रीय एकता परिषद?

Randhir Singh Suman 
राजनीति जब वोट की, अपने अपने स्वार्थ |
परिषद् भी बीमार है, मोहग्रस्त ज्यों पार्थ || 


काठमांडू में भारतीय ब्‍लॉगरों का सम्‍मान : डेली न्‍यूज़ ऐक्टिविस्‍ट दिनांक 26 सितम्‍बर 2013 में प्रकाशित

नुक्‍कड़ 





भारतीय ब्लॉगर जमा, चहुँ-तरफ़ा है धूम | 
पुरस्कार की होड़ है, रविकर लेकर चूम ||



Tourist places in Indian States भारतीय राज्यों के पर्य़टक स्थल

SANDEEP PANWAR 











प्रभु के अवतार का उद्देश्य श्रीभगवानुवाच बहुनि मे व्यतीतानी ,जन्मानि तव चार्जुन , तान्यहं सर्वाणि ,न त्वं वेत्थ परंतप। (४. ६ )

Virendra Kumar Sharma 
भारत भूमि महान है, बनकर प्रभु इंसान |
आकर वे अनुभव करें, मुश्किल में ईमान ||


सियासती सुपनखा से, सिया-सती अनभिज्ञ-
सियासती सुपनखा से, सिया-सती अनभिज्ञ |
अब क्या आशा राम से, हो रहे स्खलित विज्ञ |
हो रहे स्खलित विज्ञ, बने खरदूषण साले |
घालमेल का खेल, बुराई कुल अपना ले |
भोग-विलासी होड़, हुआ जन-गण-मन आहत |
सिया-सती की लाज, बचा ना सके सियासत ||

साधू या शैतान

कालीपद प्रसाद 








शैतानों ने धर लिया, आज साधु का रूप |
साधु दुबक एकांत में, भजते रूप अनूप || 

Tuesday, 24 September 2013

सियासती सुपनखा से, सिया-सती अनभिज्ञ-

सियासती सुपनखा से, सिया-सती अनभिज्ञ |
अब क्या आशा राम से, हो रहे स्खलित विज्ञ |

हो रहे स्खलित विज्ञ, बने खरदूषण साले |
घालमेल का खेल, बुराई कुल अपना ले |


नित आगे की होड़, रखेंगे बढ़ा ताजिया |
सिया सती की लाज, बचा ले पकड़ हाँसिया ||


रविकर पुरुष समाज, नहीं जाए उकसाने-



नारी अब अबला नहीं, कहने लगा समाज -

कुण्डलियाँ-
नारी अब अबला नहीं, कहने लगा समाज । 
है घातक हथियार से, नारि सुशोभित आज । 
नारि सुशोभित आज,  सुरक्षा करना जाने । 
रविकर पुरुष समाज, नहीं जाए उकसाने ।
लेकिन अब भी नारि, पड़े अबला पर भारी | 
इक ढाती है जुल्म, तड़पती दूजी नारी ।|



बातें नीति विरुद्ध, बुद्ध पर लगा कहाने-

(1)
भटके राही लक्ष्य बिन, भट के झूठे युद्ध |
आशिक रूठे रूह से, देखूं ढोंग विशुद्ध |


देखूं ढोंग विशुद्ध, लगा सज्जन उकसाने |


बातें नीति विरुद्ध, बुद्ध पर लगा कहाने |



गा मनमाने गीत, दिखा के लटके-झटके |


मान बैठता जीत, जगत में क्यूँकर भटके ||



रविकर देखे दृश्य, डोर जीवन की ढीली-

"ओबीओ चित्र से काव्य तक छंदोत्सव" अंक - 30


कुण्डलियाँ 
ढीली ढाली गुर्रियाँ, पंचेन्द्रियाँ समेत । 

कर्म-चर्म पर झुर्रियां,  परिवर्तक संकेत ।

परिवर्तक संकेत, ज़रा-वय का परिवर्तन ।

हो जाऊं ना खेत, पौध हित कर लूँ चिंतन  । 

बन जाए वटवृक्ष, अभी तो मिट्टी गीली ।

रविकर देखे दृश्य, डोर जीवन की ढीली । 
 दोहे 
दो बित्ते दो सेर की, देह सींच दे वक्त ।
चार हाथ दो मन मगर , होता गया अशक्त ॥ 


सजाये मौत पहले बहस मौत के बाद !

Sushil Kumar Joshi 

नारि-सुरक्षा पर खड़े, यक्ष प्रश्न नहिं स्वच्छ |
सजा मीडिया कक्ष पर, मचता रहा अकच्छ |

मचता रहा अकच्छ, बचा नाबालिग मुजरिम |
लचर व्यवस्था नीति, सजा की गति भी मद्धिम |

आजादी की चाह, राह पर कड़ी परीक्षा |
कर लें स्वयं सलाह, तभी हो नारि-सुरक्षा ||

रविकर देखे चाँद, कल्पना करे व्यवस्थित

व्यथित पथिक बरबस चले, लगे खोजने चैन |
मृग मरीच से अलहदा, मूँदे दोनों नैन |

मूँदे दोनों नैन, वैन वैरी हो जाते |
आती ज्यों ज्यों रैन, रोज त्यों त्यों उकताते |

रविकर देखे चाँद, कल्पना करे व्यवस्थित |
मुखड़े पर मुस्कान, पथिक हो गया अव्यथित || 


Saturday, 21 September 2013

समझ-बूझ हालात , लात ना खाओ खाली -


 घुसपैठ

Onkar
कविताएँ 
खाली कक्षा पाय के, कर बैठे घुसपैठ  । 
इतने विचलित क्यूँ हुवे, रहे व्यर्थ ही ऐंठ । 

रहे व्यर्थ ही ऐंठ , पलक पांवड़े बिछाओ । 
पल दो पल सुस्ताय, नाश्ता पानी लाओ । 

मीठी मीठी बात,  सरस भावों की प्याली । 
समझ-बूझ हालात , लात ना खाओ खाली ॥ 


सजाये मौत पहले बहस मौत के बाद !

Sushil Kumar Joshi 

नारि-सुरक्षा पर खड़े, यक्ष प्रश्न नहिं स्वच्छ |
सजा मीडिया कक्ष पर, मचता रहा अकच्छ |

मचता रहा अकच्छ, बचा नाबालिग मुजरिम |
लचर व्यवस्था नीति, सजा की गति भी मद्धिम |

आजादी की चाह, राह पर कड़ी परीक्षा |
कर लें स्वयं सलाह, तभी हो नारि-सुरक्षा ||



अफजल हुआ फरार, मुलायम राहत पाए-

समाचार-
एम् एल ए भाजपा का, गिरफ्तार आभार |
आतंकी दुर्दांत पर,  अफजल हुआ फरार |

अफजल हुआ फरार, मुलायम राहत पाए |
ख़ुशी ख़ुशी सरकार, कई बिल पास कराये |

जनरल की अब जांच, संग मोदी के बैठे |
एम् पी में शिवराज, नहीं जानूं क्यूँ ऐंठे ||




मुर्गे बड़े सुकून में, जब से मँहगा प्याज |
झटके और हलाल से, मनुज मिटाते खाज |

मनुज मिटाते खाज, मुजफ्फर नगर बना के |
बिन हर्रे फिटकरी, प्याज बिन पर्व मना के |

पाते बेहतर स्वाद, लड़ाके रविकर गुर्गे |
नेताओं को दाद, बांग दे देते मुर्गे ||



देह देहरी दुर्ग, सुरक्षित शिशु-अबलायें -

कुण्डलियाँ छंद

जन्नत बन जाता जहाँ, बसते जहाँ बुजुर्ग ।
इनके रहमो-करम से, देह देहरी दुर्ग ।

देह देहरी दुर्ग, सुरक्षित शिशु-अबलायें ।
इनका अनुभव ज्ञान, टाल दे सकल बलाएँ ।

हाथ परस्पर थाम, मान ले रविकर मिन्नत ।
बाल-वृद्ध सुखधाम, बनायें घर को जन्नत।। 

Friday, 20 September 2013

अग्गी करने से बचो, अग्गी करे अनर्थ -


रविकर रोटी सेंक, बोलता जिन्दा रह मत

रहमत लाशों पर नहीं, रहम तलाशो व्यर्थ |
अग्गी करने से बचो, अग्गी करे अनर्थ |

अग्गी करे अनर्थ, अगाड़ी जलती तीली |
जीवन-गाड़ी ख़ाक, आग फिर लाखों लीली |

करता गलती एक, उठाये कुनबा जहमत |
रविकर रोटी सेंक, बोलता जिन्दा रह मत ||



मुर्गे बड़े सुकून में, जब से मँहगा प्याज |
झटके और हलाल से, मनुज मिटाते खाज |

मनुज मिटाते खाज, मुजफ्फर नगर बना के |
बिन हर्रे फिटकरी, प्याज बिन पर्व मना के |

पाते बेहतर स्वाद, लड़ाके रविकर गुर्गे |
नेताओं को दाद, बांग दे देते मुर्गे ||


दंगाई महफूज, मार के निचले-तबके -
 तब के दंगे और थे, अब के दंगे और |
हुड़दंगी सिरमौर तब, अब नेता सिरमौर |

अब नेता सिरमौर, गौर आ-जम कर करलें |
ये दंगे के दौर, वोट से थैली भर लें |

मरते हैं मर जाँय, कुचल कर बन्दे रब के |
दंगाई महफूज, मार के निचले-तबके ||

 फिर भी दिल्ली दूर है, नहीं राह आसान |
अज्ञानी खुद में रमे, परेशान विद्वान |

परेशान विद्वान, बड़े भी अपनी जिद में |
ले पहले घर देख, ताकना फिर मस्जिद में | 

डंडे से ही खेल, नहीं पायेगा गिल्ली |
आस-पास बरसात, तरसती फिर भी दिल्ली || 

(आज के राजनैतिक माहौल पर)
नीले रंग में मुहावरे हैं-



कर अफसर बर्खास्त, वजीरे आजम आ-जम

आ जम जा कुर्सी पड़ी, सिखा विधर्मी पाठ |
वोट बैंक मजबूत कर, बढ़ा चढ़ा के ठाठ |

बढ़ा चढ़ा के ठाठ, कहीं कातिल छुड़वाए |
*जटा जाय जग माहिं, जुल्म का फल भी पाए |

फिर भी गोटी लाल, लाल का करना क्या गम |
कर अफसर बर्खास्त, वजीरे आजम आ-जम ||
*ठगा जाना / धोखे में आकर हानि उठाना 

Wednesday, 18 September 2013

तब के दंगे और थे, अब के दंगे और-


कर अफसर बर्खास्त, वजीरे आजम आ-जम

आ जम जा कुर्सी पड़ी, सिखा विधर्मी पाठ |
वोट बैंक मजबूत कर, बढ़ा चढ़ा के ठाठ |

बढ़ा चढ़ा के ठाठ, कहीं कातिल छुड़वाए |
*जटा जाय जग माहिं, जुल्म का फल भी पाए |

फिर भी गोटी लाल, लाल का करना क्या गम |
कर अफसर बर्खास्त, वजीरे आजम आ-जम ||
*ठगा जाना / धोखे में आकर हानि उठाना

दंगाई महफूज, मार के निचले-तबके -

 
तब के दंगे और थे, अब के दंगे और |
हुड़दंगी सिरमौर तब, अब नेता सिरमौर |

अब नेता सिरमौर, गौर आ-जम कर करलें |
ये दंगे के दौर, वोट से थैली भर लें |

मरते हैं मर जाँय, कुचल कर बन्दे रब के |
दंगाई महफूज, मार के निचले-तबके ||



बाकी बातें बाद में, सबसे आगे वोट |
करते हमले ओट से, खर्च करोड़ों नोट | 

खर्च करोड़ों नोट, चोट पीड़ा पहुँचाये |
पीते जाते रक्त, माँस अपनों का खायें |

अग्गी करके धूर्त, दिखाते हैं चालाकी |
जाँय अंतत: हार, दिखी "पूरण" बेबाकी ||


रहमत लाशों पर नहीं, रहम तलाशो व्यर्थ -


रहमत लाशों पर नहीं, रहम तलाशो व्यर्थ |
अग्गी करने से बचो, अग्गी करे अनर्थ |

अग्गी करे अनर्थ, अगाड़ी जलती तीली |
जीवन-गाड़ी ख़ाक, आग फिर लाखों लीली |

करता गलती एक, उठाये कुनबा जहमत |
रविकर रोटी सेंक, बाँटता मरहम रहमत ||




झारखंड में भुखमरी, तप्त अग्नि से गर्भ |
कृषक ख़ुदकुशी कर मरे, मरता दिखा विदर्भ |

मरता दिखा विदर्भ, सियासत दंगा यू पी |
सत्ता करती गर्व, लगाए जनता चुप्पी |

होती बन्दरबांट, दीमकें लगीं फंड में |
लेती फाइल चाट, कोयला झारखंड में ||

Tuesday, 17 September 2013

बाकी बातें बाद में, सबसे आगे वोट -


दंगो को प्रायोजित तौर  पर भड़काया जाता है 

बाकी बातें बाद में, सबसे आगे वोट |
करते हमले ओट से, खर्च करोड़ों नोट | 

खर्च करोड़ों नोट, चोट पीड़ा पहुँचाये |
पीते जाते रक्त, माँस अपनों का खायें |

अग्गी करके धूर्त, दिखाते हैं चालाकी |
जाँय अंतत: हार, दिखी "पूरण" बेबाकी ||

कर अफसर बर्खास्त, वजीरे आजम आ-जम

आ जम जा कुर्सी पड़ी, सिखा विधर्मी पाठ |
वोट बैंक मजबूत कर, बढ़ा चढ़ा के ठाठ |

बढ़ा चढ़ा के ठाठ, कहीं कातिल छुड़वाए |
*जटा जाय जग माहिं, जुल्म का फल भी पाए |

फिर भी गोटी लाल, लाल का करना क्या गम |
कर अफसर बर्खास्त, वजीरे आजम आ-जम ||
*ठगा जाना / धोखे में आकर हानि उठाना 


रहमत लाशों पर नहीं, रहम तलाशो व्यर्थ -

रहमत लाशों पर नहीं, रहम तलाशो व्यर्थ |
अग्गी करने से बचो, अग्गी करे अनर्थ |


अग्गी करे अनर्थ, अगाड़ी जलती तीली |
जीवन-गाड़ी ख़ाक, आग फिर लाखों लीली |



करता गलती एक, उठाये कुनबा जहमत |
रविकर रोटी सेंक, बाँटता मरहम रहमत ||

छौंक छौंक के दाल, हुआ अब काला चमचा-

मचा रहे हल्ला सभी, कभी नहीं हों मौन |
मची हुई है होड़ नित, आगे निकले कौन |

आगे निकले कौन, लगाते कसके नारे |
काली पीली दाल, गलाके छौंक बघारें |

रचते नित षड्यंत्र, चलें तलवार तमंचा |
छौंक छौंक के दाल, हुआ अब काला चमचा ||


ले पहले घर देख, ताकना फिर मस्जिद में-

फिर भी दिल्ली दूर है, नहीं राह आसान |
अज्ञानी खुद में रमे, परेशान विद्वान |

परेशान विद्वान, बड़े भी अपनी जिद में |
ले पहले घर देख, ताकना फिर मस्जिद में | 

डंडे से ही खेल, नहीं पायेगा गिल्ली |
आस-पास बरसात, तरसती फिर भी दिल्ली || 

(आज के राजनैतिक माहौल पर)
नीले रंग में मुहावरे हैं-



पूरे हों अरमान आपके, होना चाहो खेत |
लड्डू खा के हो गए, कितने मूर्ख अचेत |


कितने मूर्ख अचेत, निकलता तेल रेत में  |

होंगी मटियामेट, ख्वाहिशें सेत-मेत में |


नहीं रहें अरमान, शौक ना रहें अधूरे |

शेष बचे दिन चार, राम जी कर दो पूरे ||