Monday, 16 February 2015

आज वही माँ-बाप, भटकते मारे मारे-


हारे पापा हर समय, रहे जिताते पूत |
मुड़कर पीछे देखते, बिखरे पड़े सुबूत |

बिखरे पड़े सुबूत, आज नाराज विधाता |
हर दुख से हर बार, उबारी अपनी माता |

आज वही माँ-बाप, भटकते मारे मारे |
कह रविकर घबराय, परस्पर बने सहारे || 

Thursday, 5 February 2015

जब ताने में धार, व्यर्थ क्यों बेलन ताने

मेरी टिप्पणियां 
(२)
ताने बेलन देख के, तनी-मनी घबराय  |
पर ताने मारक अधिक, सुने जिया ना जाय |
सुने जिया ना जाय, खाय ले मन का चैना |
रविकर गया अघाय, खाय के चना च बैना |
मनमाने व्यवहार, नहीं ब्रह्मा भी जाने |
जब ताने में धार, व्यर्थ क्यों बेलन ताने || 
(१)
सिहरे रविकर तन-बदन, भयकारी यह चित्र |
चिमटा बेलन तवा का, नाम न लीजै मित्र |
नाम न लीजै मित्र, हृदय कमजोर हमारा |
वो तो बड़ी विचित्र, रोज चढ़ जाता पारा |
अभी हमारी मौज, गई जो बीबी पिहरे | 
पढूं आप का काव्य, बदन रह रह कर सिहरे ||

दोहे 
खोटे सिक्के चल रहे, गजब तेज रफ़्तार |

गया जमाना यूँ बदल, अब इक्के बेकार || 

Sunday, 18 January 2015

फैला रही प्रकाश, चिता जब धू धू जलती-

जलती जाए जिंदगी, ज्योति न जाया जाय । 
आँच साँच को दे पका, कठिनाई मुस्काय । 

कठिनाई मुस्काय, जिंदगी कागद लागे । 
अपनी मंजिल पाय,  देखते उससे आगे । 

गूढ़ कहानी आप, यहाँ स्वाभाविक चलती । 
फैला रही प्रकाश, चिता जब धू धू जलती॥ 

दोहा 
जाति ना पूछो साधु की, कहते राजा रंक |

मजहब भी पूछो नहीं, बढ़ने दो आतंक ||  

Thursday, 25 December 2014

मेरे सुपुत्र कुमार शिवा "कुश" की रचना -

http://kushkikritiyan.blogspot.in/
नहाकर नज्म निकली है, बालकोनी में आज अपनी ।
मेरी कलम को मिली वज्म , बालकोनी में आज अपनी ॥ 

बन गया चाय का कप, अचानक मदिरा का प्याला 
उम्र भर की फ़िक्र हुई ख़त्म,  बालकोनी में आज अपनी ।

 करे आजाद जुल्फों को, खींचकर तौलिया ऐसे 
गिरा बिजुली दिया है जख्म, बालकोनी में आज अपनी ।

गरदन झटक के जब जुल्फों को लहराया
हुई शीत लहरी सी सिहरन,  बालकोनी में आज अपनी ।

ek or kar k keshu unhe toliye se jhatka
baarish hui jhama jham, balcony me aaj apni

meri or mudi gardan to suraj pe se hata badal
satrangi hua mausam, balcony me aaj apni

nazar "kush" ki atak jaaye, juban kuch bhi na keh paaye
per lekhni fir bani humdam, balcony me aaj apni.!!



रविकर की रचना -


 नहाकर नज्म निकलेगी, अगर यूँ रोज छज्जे पर ।
 जमा दे वज्म गैरों की, गजल पुर-जोर छज्जे पर || ॥ 

> बने तब चाय प्याले की, अचानक हुश्न की मदिरा ।
> गिरे अखबार हाथों से, बहकता इश्क छज्जे पर ॥


> करे आजाद जुल्फों को, झटक कर तौलिया ऐसे
> गरजकर मेघ से बिजली, गिरे नि:शब्द छज्जे पर ।

> छुई पुरवा हुई सिहरन, बरसती बूँद नहलाये ।
> नहा के रेशमी काया, भिगो दे देह छज्जे पर ॥

> नजर रविकर अटक जाए, जुबाँ कुछ भी न कह पाये ।
> बदल ऐसा गया मौसम, हुआ मदहोश छज्जे पर ।।

Wednesday, 10 December 2014

पगला बनकर के करें, अगर नौकरी आप-

पगला बनकर के करें, अगर नौकरी आप । 
सकल काम अगला करे, बेचारा चुपचाप । 

बेचारा चुपचाप, काम से डरना कैसा । 
बने रहो नित कूल, मिलेगा पूरा पैसा । 

करो काम का जिक्र, फ़िक्र क्या करना रविकर । 
उंगली चुगली सीख, मौज कर पगला बनकर ॥ 

Tuesday, 9 December 2014

हक़ है झक मारौ फिरौ, बिना झिझक दिन रात-

अ 
मन भर सोना देह पे, सोना घोड़ा बेंच । 
राम राज्य आ ही गया, जी ले तू बिन पेंच ।1। 

हक़ है झक मारौ फिरौ, बिना झिझक दिन रात |
लानत भेजौ पुलिस पर, गर कुछ घटै बलात |2। 

सब मर्जों की दवा है, पुलिस फ़ौज सरकार । 
 सावधान खुद क्यों रहें,  इसकी क्या दरकार।3| 

जीती बाजी बाज ने, नहीं आ रहा बाज |
नहीं लाज आती उसे, चला लूटता लाज || 4||


गर गरिष्ठ भोजन करे, बन्दा बिन उद्योग ।
अल्प आयु में ही मरे, नर्क यहीं पर भोग ॥१॥ 

तन में कम पानी भरे, मन में भरे फितूर ।
पथरी, कथरी, थरथरी, पानी चढ़े जरूर ।२॥ 

मोच रोक दे कदम को, दम को रोके सोच ।
सोच मोच से बुरी है, रखो  सोच में लोच॥३॥ 






Wednesday, 5 November 2014

भोगता उपभोक्ता -एक लम्बी कथा

भाग-१ 

जिनके आँख पड़े नहिं गर्द । कैसे जान सकें वो दर्द । 

ग्राहक भगवान होता है और भगवान की आँख में धूल सरे-आम झोंकी जा रही है । देवी तो आँखों में पट्टी बांधे है ; तो झोंकने वाले झोंकते रहते हैं धूल-गर्द ॥ 

बात २००३ के अप्रैल की है-केन्द्रीय विद्यालय का नया सत्र शुरू हो चुका था । १९८८, ८९ और ९२ में पैदा हुवे शिवा मनु और तनु को उनके स्कूल-बैग के साथ मोटर-साइकिल से स्कूल  पहुँचाने में असुविधा होने लगी थी । पारिवारिक अदालत ने एक कार खरीदने का मशविरा दिया । 

उस समय लगभग दो लाख में मारुति-८०० आती थी । डीलर की तरफ से ५००० की एसेसरीज भी अलग से गिफ्ट की जाती थी । २५ अप्रैल को मैंने मारुति के अधिकृत विक्रेता रिलायबल इंडस्ट्रीज को चेक से रूपये १ लाख २५००० का भुगतान अग्रिम के तौर पर कर दिया । शेष राशि के लिए SBI के लोन पेपर साइन करवाये गए ।  उनके एजेंट तमाल घोष और हमारे मित्र अरुण कुमार सिंह ने मुझे अग्रिम बधाई दी । परन्तु कार की डिलीवरी ९ मई से पहले ना हो सकी । कई बार हमने उनके शो रूम जाकर डिलीवरी देने की बात की परन्तु आल इण्डिया ट्रांसपोर्ट स्ट्राइक जैसे कई बहाने बताये गए । खैर हमारी मारुति हमारे घर आ गई । मैंने एक बड़ी राशि देकर कार अप्रैल में बुक कराई थी परन्तु मई में रूपये ५०००/- का वह गिफ्ट मुझे नहीं दिया गया । बताया गया वह गिफ्ट केवल अप्रैल के लिए ही था । 

नए वाहन के पूजन के लिए हम सपरिवार बैठ कर मंदिर की ओर चले । मेरे मित्र अरुण जी ही कार चला रहे थे-बच्चों ने गर्मी की शिकायत की तो उन्होंने फैन चला दिया । परन्तु यह क्या ??? कांच के छोटे बड़े टुकड़े हवा में तैरते हुवे बच्चों के चेहरे जख्मी कर गए । फैन तुरंत बंद कर दिया गया -मंदिर के बजाय हम डाक्टर के क्लीनिक पहुँच गए-
                                                                    क्रमश: