Thursday, 1 August 2019

विधाता छन्द


हुआ #नाकाम बन्दा तो, करे वह #इश्क की पूजा।
बदलकर नाम अपना वह रखे उपनाम ही दूजा।
गजल गाता, घुमक्कड़ बन, सदा दारू पिये उम्दा-
#मुकम्मल #इश्क फेरे में, रहे हर वक्त मुँह सूजा।।

Monday, 8 July 2019

सुगर बढा तो बढ़ गया, रविकर अंतरद्वंद-

सुगर बढा तो बढ़ गया, रविकर अंतरद्वंद।
मीठा खाना ही नहीं, अपितु बोलना बन्द।।

बेवकूफ वाचाल है, समझदार हैं मौन।
उस संस्था परिवार को, बचा सके फिर कौन।।

वृद्धावस्था का नहीं, सही सहारा पूत।
सही सहारा तो बहू, दे सुख-शांति अकूत।।

अगर शिकायत एक से, करिये वार्तालाप।
किन्तु कई से है अगर, सुधर जाइये आप।।

नहीं बिछाते बल्कि वे, रहे बड़प्पन ओढ़।
अगर बिछाते तो कभी, उन्हें न होता कोढ़।।

दो मंजिल का चढ़ गया, उस छत पर सामान।
जिसे उच्चता का रहा, कल तक बड़ा गुमान।।

सुगर बढा तो बढ़ गया, रविकर अंतरद्वंद।
मीठा खाना ही नहीं, अपितु बोलना बन्द।।

बेवकूफ वाचाल है, समझदार हैं मौन।
उस संस्था परिवार को, बचा सके फिर कौन।।

वृद्धावस्था का नहीं, सही सहारा पूत।
सही सहारा तो बहू, दे सुख-शांति अकूत।।

अगर शिकायत एक से, करिये वार्तालाप।
किन्तु कई से है अगर, सुधर जाइये आप।।

नहीं बिछाते बल्कि वे, रहे बड़प्पन ओढ़।
अगर बिछाते तो कभी, उन्हें न होता कोढ़।।

दो मंजिल का चढ़ गया, उस छत पर सामान।
जिसे उच्चता का रहा, कल तक बड़ा गुमान।।

जब दिमाग-वाला मनुज, दिल मे करे प्रवेश।
हो खराब तब, जिंदगी, दे भर-जीवन क्लेश।।

वास्तु-दोष से मुक्त घर, ले रविकर पहचान।
हर कोने हर कक्ष में, जब नेटवर्क समान।।

प्यार एकतरफा जहाँ, पुष्पित होती चाह।
दोतरफे का हश्र तो, रविकर केवल व्याह।

नानी के घर ही नहीं, छुट्टी किया व्यतीत।
दादी के घर भी गया, तोड़ पुरातन रीत।।

पैसों में गर्मी बहुत, रही जमाती धाक।
रविकर रिश्तों को यही, करे जलाकर खाक।।

कूलर में कितने घड़े, डाल रहे जल आप।
सींचे होते पेड़ यदि, कभी न बढ़ता ताप।।

अजब मुहब्बत का गणित, दो से घटता एक।
बचे मात्र तब शून्य ही, हैं दृष्टांत अनेक।।।
हो खराब तब, जिंदगी, दे भर-जीवन क्लेश।।

वास्तु-दोष से मुक्त घर, ले रविकर पहचान।
हर कोने हर कक्ष में, जब नेटवर्क समान।।

प्यार एकतरफा जहाँ, पुष्पित होती चाह।
दोतरफे का हश्र तो, रविकर केवल व्याह।

नानी के घर ही नहीं, छुट्टी किया व्यतीत।
दादी के घर भी गया, तोड़ पुरातन रीत।।

पैसों में गर्मी बहुत, रही जमाती धाक।
रविकर रिश्तों को यही, करे जलाकर खाक।।

कूलर में कितने घड़े, डाल रहे जल आप।
सींचे होते पेड़ यदि, कभी न बढ़ता ताप।।

अजब मुहब्बत का गणित, दो से घटता एक।
बचे मात्र तब शून्य ही, हैं दृष्टांत अनेक।।

Wednesday, 19 June 2019

पैसों में गर्मी बहुत, रही जमाती धाक


नानी के घर ही नहीं, छुट्टी किया व्यतीत।
दादी के घर भी गया, तोड़ पुरातन रीत।।

प्यार एकतरफा जहाँ, पुष्पित होती चाह।
दोतरफे का हश्र तो, रविकर केवल व्याह।।😊

सदियों से रविकर बड़े, रहे बड़प्पन ओढ़।
अगर बिछाते तो कभी, उन्हें न होता कोढ़।।

हर साया घोषित करे, खुद को असली राम।
इंतजार रविकर करे, ताकि खत्म हो घाम।।

उतावलेपन पर लगा, अपने-आप लगाम।
सुबह-सुबह क्यों ला रहा, रविकर मादक शाम।।

पैसों में गर्मी बहुत, रही जमाती धाक।
रविकर रिश्तों को यही, करे जलाकर खाक।।

कूलर में कितने घड़े, डाल रहे जल आप।
सींचे होते पेड़ यदि, कभी न बढ़ता ताप।।


अजब मुहब्बत का गणित, दो से घटता एक।
बचे मात्र तब शून्य ही, हैं दृष्टांत अनेक।।

गलतफहमियों के भरे, किस्से कई हजार।
सोच यही हर ईंट की, मुझपर टिकी दिवार।।

चेहरे से करते प्रथम, रविकर परिचय प्राप्त।
वाणी कर्म विचार से, करते उसे समाप्त।।

सुनी न जाती चीख भी, ऐसा जब परिवेश।
व्यर्थ सीख साखी सहित, रविकर हर उपदेश।।
प्रियतम के मुस्कान की, देती कीमत बोल।
पर आँसू के मूल्य पर, करती टालमटोल ||

मुर्दे से बदतर दिखा, जीवन जोश-विहीन।
जो जीवन मदहोश वो, अंधे से भी दीन।।

मत पालो खुद शत्रुता, पा लो उच्चस्थान।
शत्रु मिलें खैरात में, हों पूरे अरमान।।

रविकर प्रायः गिफ्ट में, देता अपना वक्त।
वक्त नहीं, जीवन अपितु, करता सतत विभक्त।।

जिसके तन-मन से कभी, पा न सका वह पार |
चाहे उसकी रूह से, करना साक्षात्कार ||


😊😊
हाय- हाय री नौकरी, बिडम्बना भरपूर।
अपने घर जाना, करें, अब दूजे मंजूर।।

देह-पर्स में श्वांस-धन, दोनो करे गुमान।
दोनों किन्तु उधार के, सका न रविकर जान।।



Wednesday, 21 November 2018

ग़ज़ल


अॉफिस समय से आ गया, आखिर खुशी का मामला।
दिनभर लतीफे, मौज-मस्ती, चाय-पानी भी चला।

हँसते हुए रविकर प्रफुल्लित, एक दिन लौटा मगर
कारण बताते रात बीती, पर न टल पाई बला।

रहते हुए मेरे भला, कैसे प्रफुल्लित हो रहे
है कौन जिसने दी खुशी पति हो रहा क्यों बावला।

पत्नी परेशां प्यार से पुचकार कारण पूछती।
तब फूँक कर पति छाछ पीता, दूध से जो कल जला।

हर काम बाखूबी करो, हँसते-हँसाते नित रहो
रोनी-शकल गरदन-झुका, चालाक पति अब घर चला।।

है बेमुरौव्वत यह जगत।
करना भरोसा आप मत।

देता रहा प्रवचन मगर
था ताक में बगुला-भगत।

आकाश कुसुमों की ललक-
पर छू न पाता एक छत।

आया चुनावी साल तो
वादे करे वह अनवरत।

बेसब्र रविकर घूमता
गिनता नखत पाया न खत।।

मिलते रहे हर दिन मगर जाना नहीं।
जाना अगरचे छोड़ कर जाना नहीं।

नाराज होकर मुँह फुलाकर तुम रहो-
मैं तो तुम्हारे पास, घर जाना नहीं।।

पेट्रोल मँहगा हो रहा हर दिन मगर
यह कार मेरी छोड़कर जाना नहीं।

बैठो जरा सा पास मेरे ऐ प्रिया
जब गाँव जाना तो शहर जाना नहीं।

वातावरण पूरा चुनावी हो गया
मतदान कर रविकर पसर जाना नहीं।

सियासत हो रही भारी, सिया सतनाम् जपती है।
तिरस्कारे दशानन को,नही डरती सिहरती है।।

भरोसा राम-लक्ष्मण पर, भरोसा रीछ वानर पर
उन्ही के इस भरोसे से, स्वयं से युद्ध लड़ती है।।

मनोबल तोड़ रावण का, जलाया माह भर पहले-
जली सम्पूर्ण लंका पर, बुराई जोश भरती है।

जलेगा शर्तिया रावण, सवा सौ सुत दफन होंगे
मिटेगा सुपनखा का वंश, जिससे त्रस्त धरती है।

उठो सुग्रीव अंगद नील नल हनुमान सेनापति
जिताओ धर्म को फिर से धरा आह्वान करती है।

दशानन था बलात्कारी, उसे ज्ञानी बताओ मत।
नहीं था संयमी, पंडित प्रशंसा व्यर्थ गाओ मत।

किया था छेड़खानी भी गवाही वेदवति देती
नकारो मत प्रमाणों को उसे नायक बनाओ मत।

किया अपनी बहू का रेप, रंभा नाम था जिसका
उसे कहकर सदाचारी, गुनाहों को छुपाओ मत।

छुवेगा नारि सहमति बिन, मरे बेमौत सिर फूटे
दिया था शाप नल ने तब, हकीकत यह भुलाओ मत।।

रही श्रीराम की ताकत, सिया का धैर्य था उत्तम
कुकर्मी को महात्मा कह कभी रविकर बुलाओ मत।।


करके परीक्षण भ्रूण-हत्या कर रहे जो नर अभी।
वे पुत्रवधु के हाथ से पानी न पायेंगे कभी।
कोई कहीं दुर्गा अगर, अब देश में रविकर मरी
तो पाप का परिणाम दुष्कर, दंड भोगेंगे सभी ।

मजबूर होकर पाठशाला छोड़ती यदि शारदा।
करना सुनिश्चित नारि-शिक्षा हाथ में लेकर गदा।
लक्ष्मी कभी क्यों खर्च माँगे, सुत पिता पति भ्रात से
उपलब्ध उसको भी रहे, घरबार दौलत सम्पदा।।

क्यों कुंड में कोई उमा, बाजी लगाये जान की।
क्यों अग्नि लेती है परीक्षा, जानकी के मान की।
काली बने अब कालिका, संहार दुर्जन का करे।
नवरात्रि की पूजा तभी होगी सफल इन्सान की।।


नमन हे मातु शतरूपा-सरस्वति-शारदे मैया।
करें हम नित्य आराधन, तनिक स्वीकार ले मैया।

अधिष्ठात्री तुम्ही तो माँ, कला-विज्ञान-विद्या की ।
दमन कर मूर्खता-जड़ता करो उद्धार हे मैया।

खिला दो मन कमल जैसा, बना दो श्वेत-निर्मल तन । 
बनाकर हंस सा जीवन, विराजो पीठ पे मैया।।

तपस्या-साधना भूला, अभी तक मूढमति प्राणी
जरा उन मूढ़-भक्तों सा, मुझे भी मंत्र दे मैया।।

कहाँ वीणा बजाती हो, नहीं आवाज आती है
सुना दे सप्त-स्वर-मंजुल विनय रविकर करे मैया।।

Monday, 22 October 2018

खुशी तो हड़बड़ी में थी


खुशी तो हड़बड़ी में थी, घरी भर भी नहीं ठहरी।

मगर गम को गजब फुरसत, करे वो मित्रता गहरी।।
उदासी बन गयी दासी दबाये पैर मुँह बाये

सुबह तक तो गिने तारे, कटे काटे न दोपहरी।।

हुआ यूँ शान्तिमय जीवन, तड़प मिट सी गई तन की।

सहन ताने करे नियमित, व्यथा कैसे कहे मन की।
सवेरे काम पर जाता, अँधेरे लौटकर आता-
मशीनी आदमी रविकर, मगर दुनिया कहे सनकी।।

कभी पूरी कहाँ होती जरूरत, जिंदगी तेरी।
हुई कब नींद भी पूरी, तुझे प्रत्येक दिन घेरी।
करे जद्दोजहद रविकर, हुई कल खत्म मजबूरी।
अधूरी नींद भी पूरी, जरूरत भी हुई पूरी।

अच्छे विचारों से हमेशा मन बने देवस्थली।
शुभ आचरण यदि हैं हमारे, तन बने देवस्थली।
व्यवहार यदि अच्छा रहे तो धन बने देवस्थली।
तीनो मिलें तो शर्तिया, जीवन बने देवस्थली।।

किसी का दिल दुखाकर के तुम्हें यदि चैन आता है।
किसी को चोट पहुँचाना, तुम्हे यदि खूब भाता है।
मिलेगा शर्तिया धोखा, सुनो चेतावनी देता-
दुखेगा दिल तुम्हारा भी, तुम्हे रविकर बताता है।।

किसी की माँ पहाड़ों से हुकूमत विश्व पर करती।
बुलावा भेज पुत्रों के सिरों पर हाथ है धरती।
किसी की मातु मथुरा में भजन कर भीख पर जीवित
नहीं सुत को बुला पाती, अकेली आह भर मरती ।।

कभी क्या वक्त रुकता है, घड़ी को बंद रखने से ।
कभी क्या सत्य छुपता है, अनर्गल झूठ बकने से।
रुके फिर क्यों कभी कविता, सतत् बहती रहे अविरल
नहीं चूके बुराई पर, कभी कवि चोट करने से।।

करीने से सजा करके, चिता मेरी जलाई थी।
सितमगर हाथ भी सेंकी, धुँवे से तिलमिलाई थी।
मुहब्बत फिर शुरू कर दी, कदम पीछे हटाकर वो- 
उडी जब राख रविकर की, उठाकर फूल लाई थी ।।

जलेगी देह जब तेरी जलेगा पेड़ भी आधा।
लगा दे पेड़ दो ठो तो, कटेगी प्रेत-भवबाधा।
अगर दो वृक्ष का रोपण लगे भारी तुझे रविकर
बदन ही दान तू कर दे, करेंगे शोध ही डाक्टर।।

किसी की राय से राही पकड़ ले पथ सही अक्सर।
मगर मंज़िल नही मिलती, बिना मेहनत किए डटकर।
तुम्हें पहचानते होंगे प्रशंसक, तो कई बेशक
मगर शुभचिंतकों की खुद, करो पहचान तुम रविकर।।

बहस माता-पिता गुरु से, नहीं करता कभी रविकर |
अवज्ञा भी नहीं करता, सुने फटकार भी हँसकर।
कभी भी मूर्ख पागल से नहीं तकरार करता पर
सुनो हक छीनने वालों, करे संघर्ष वह डटकर।।

गगन जब साफ़-सुथरा तो कुशल पायलट' नहीं बनते।
सड़क दुर्गम अगर है तो भले ड्राइवर' वहीं बनते।
नहीं यूँ जिंदगी चलती, कहीं ठोकर कहीं गड्ढे
तनिक जोखिम उठाते जो वहीं इंसाँ सही बनते।।

भला क्या चाहते बनना बड़े होकर, बताओ तो।
यही तो प्रश्न सब पूछें, कभी नजदीक जाओ तो।
बुढापा आज ले आया, अनोखे प्रश्न का उत्तर।

बड़े होकर बनूँ बच्चा, चलो मुझको बनाओ तो।।

विदेशी आक्रमणकारी बड़े निष्ठुर बड़े बर्बर |
पराजित शत्रु की जोरू-जमीं-जर छीन लें अकसर |
कराओ सिर कलम अपना, पढ़ो तुम अन्यथा कलमा 
जिन्हें थी जिंदगी प्यारी, बदल पुरखे जिए रविकर ||

उमर मत पूछ औरत की, बुरा वह मान जायेगी।
मरद की आय मत पूछो, उसे ना बात भायेगी।
फिदाइन यदि मरे मारे, मियाँ तुम मौन रह जाना।
धरम यदि पूछ बैठे तो, सियासत जान खायेगी।।

मदर सा पाठ लाइफ का पढ़ाता है सिखाता है।
खुदा का नेक बन्दा बन खुशी के गीत गाता है।
रहे वह शान्ति से मिलजुल, करे ईमान की बातें
मगर फिर कौन हूरों का, उसे सपना दिखाता है।।

अपेक्षा मत किसी से रख, किसी की मत उपेक्षा कर ।
सरलतम मंत्र खुशियों का, खुशी से नित्य झोली भर।
समय अहसास बदले ना, बदलना मत नजरिया तुम
वही रिश्ते वही रास्ता वही हम सत्य शिव सुंदर।।

आलेख हित पड़ने लगे दुर्भाग्य से जब शब्द कम।
श्रुतिलेख हम लिखने लगे, नि:शब्द होकर के सनम।
तुम सामने मनभर सुना, दिल की सुने बिन चल गयीं
हम ताकते ही रह गये, अतिरेक भावों की कसम।।

अकेले बोल सकते हो मगर वार्त्ता नहीं मुमकिन।
अकेले खुश रहे लेकिन मना उत्सव कहाँ तुम बिन।
दिखी मुस्कान मुखड़े पर मगर उल्लास गायब है
तभी तो एक दूजे की जरूरत पड़ रही हरदिन।।

बड़ी तकलीफ़ से श्रम से, रुपैया हम कमाते हैं ।
उसी धन की हिफाज़त हित बड़ी जहमत उठाते हैं।
कमाई खर्चने में भी, निकलती जान जब रविकर
कहो फिर जिंदगी को क्यों कमाने में खपाते हैं।।

मनाओ मूर्ख अधिकारी, अधिक सम्मान दे करके।
अगर लोभी प्रशासक है, मनाओ दान दे करके।
प्रशासक क्रूर यदि मिलता, नमन करके मना लेना।
मगर विद्वान अफसर को, हकीकत सब बता देना।।

समस्यायें समाधानों बिना प्राय: नहीं होती।
नजर आता नहीं हल तो, बढ़ा है आँख का मोती।
करो कोशिश मिलेगा हल, समस्या पर न पटको सिर।
नही हल है अगर उसका, उसे प्रभु-कोप समझो फिर।।

परिस्थितियाँ अगर विपरीत, यदि व्यवहार बेगाना।
सुनो कटु शब्द मत उनके, कभी उस ओर मत जाना।
नहीं हर बात पर उनकी, जरूरी प्रतिक्रिया देना-
मिले परिणाम प्राणान्तक, पड़े दृष्टाँत हैं नाना।

फिसलकर सर्प ऊपर से गिरा जब तेज आरे पर।
हुआ घायल, समझ दुश्मन, लिया फिर काट झुँझलाकर।
हुआ मुँह खून से लथपथ, जकड़ता शत्रु को ज्यों ही
मरे वह सर्प अज्ञानी, कथा-संदेश अतिसुंदर।।

होता अकेला ही हमेशा आदमी संघर्ष मे ।
जग साथ होता है सफलता जीत में उत्कर्ष में।
दुनिया हँसी थी मित्र, जिस जिस पर यहाँ गत वर्ष तक
इतिहास उस उस ने रचा इस वर्ष भारत वर्ष में।।

हाँ हूँ नकलची तथ्य का, हाँ कथ्य भी चोरी किए।
पर शिल्प यति गति छंद रस लय सर्वथा अपने लिए।
वेदों पुराणों उपनिषद को विश्व को किसने दिए।
क्यों नाम के पीछे पड़े, क्यों मद्य मद रविकर पिये।।

भरोसे में बड़ी ताकत, विजयपथ पर बढ़ाता है।
खुशी संतुष्टि जीवन में हमें रविकर दिलाता है।
मगर विश्वास खुद पर हो तभी ताकत मिले वरना
भरोसा गैर पर करना हमें निर्बल बनाता है।।

हक छोड़ते श्रीराम तो, शुभ ग्रन्थ रामायण रचा।
इतिहास उन्नति का समाहित विश्व में मानव बचा।
लेकिन बिना हक जब हड़पता सम्पदा बरबंड तब
इतिहास अवनति का रचा रविकर महाभारत मचा।।

कामार्थ का बैताल जब शैतान ने रविकर गढ़ा।
तो कर्म के कंधे झुका, वो धर्म के सिर पर चढ़ा।
मुल्ला पुजारी पादरी परियोजना लाकर कई
पूजाघरों से विश्व को वे पाठ फिर देते पढा।

जब धाक, धाकड़-आदमी छल से जमाना सीख ले ।
सारा जमाना नाम, धन-दौलत कमाना सीख ले |
ईमान रिश्ते दीनता तब बेंच खाना सीख तू
फिर कर बहाना बैठकर आंसू बहाना सीख ले

सडे़ दोनों गले दोनों, गले मिलना नहीं भाया।
सलामी के लिए दिल को नहीं रविकर मना पाया।
वही खाकी वही खादी सभी के आचरण गंदे
चरण कुछ साफ़ देखे तो, उन्हें गणतंत्र छू आया।

शैतानियाँ शिशु कर रहा, मैया डराती ही रही।
बाबा पकड़ ले जायगा, हर बात पर मैया कही।
खाया पिया सोया डरा, पर आज खुश है शिशु बड़ा
पकड़े गये बाबा कई, तो जिद करे शिशु फिर अड़ा।।

किसी की राय से राही पकड़ ले पथ सही रविकर।
मगर मंज़िल नही मिलती, बिना मेहनत किए डटकर।
तुम्हें पहचानते बेशक प्रशंसक, तो बहुत सारे
मगर शुभचिंतकों की खुद, करो पहचान तुम प्यारे।।

बहस माता-पिता गुरु से, नहीं करता कभी रविकर ।
अवज्ञा भी नहीं करता, सुने फटकार भी हँसकर।
कभी भी मूर्ख पागल से नहीं तकरार करता पर-
सुनो हक छीनने वालों, करे संघर्ष बढ़-चढ़ कर।।

पतन होता रहा प्रतिपल, मगर दौलत कमाता वो ।
करे नित धर्म की निन्दा, खजाना लूट लाता वो।
सहे अपमान धन खातिर, बना गद्दार भी लेकिन
पसारे हाथ आया था, पसारे हाथ जाता वो।।

जब मूढ़ अपने मुँह मियाँ मिट्ठू बना तो जग हँसा।
जब ठोक पाया खुद नहीं वह पीठ अपनी, तो फँसा।
रविकर कभी तुम पीठ अपनी मत दिखाना यूँ कहीं
शाबासियाँ मिलती यहीं, मिलता यहीं खंजर धँसा।