Tuesday, 26 February 2013

जगह जगह विस्फोट, मारता खाली-मूली -

दिलसुख नगरवासी दुखी हैं : दैनिक जनसंदेश टाइम्‍स 26 फरवरी 2013 स्‍तंभ 'उलटबांसी' में प्रकाशित


अविनाश वाचस्पति   

खा ली मूली काल ने, सुधरा पाचन-तंत्र ।
जगह जगह यमदूत कुल, मारें मारक मन्त्र ।  

मारें मारक मन्त्र, महामारी मंहगाई ।
नित-प्रति एक्सीडेंट, मार मौसम की खाई । 

इत नक्सल के वार, उधर आतंक वसूली ।
जगह जगह विस्फोट, मारता खाली-मूली ॥


नहीं हिन्दु में ताब, पटे ना मोदी सौदा-

सौदायिक बिन व्याहता, करने चली सिंगार |
गहने पहने मांग कर, लेती कई उधार |

(भाजपा की ओर इशारा)


 लेती कई उधार, खफा पटना पटनायक | 
 खानम खाए खार, करे खारिज खलनायक |
(जदयू, बीजद , मुस्लिम) 
हौदा हाथी रहित, साइकिल बिना घरौंदा |
 नहीं हिन्दु में ताब, पटे ना मोदी सौदा ||

(माया-मुलायम)
सौदायिक= स्त्री-धन नइखे= नहीं 





पिस्सू-मच्छर-खटमल Vs जूँ-चीलर
पिस्सू मच्छर तेज हैं, देते खटमल भेज । 
जगह जगह कब्जा करें, खटिया कुर्सी मेज ।  
खटिया कुर्सी मेज, कान पर जूँ  ना रेंगे । 
देते कड़े बयान, किन्तु विस्फोट सहेंगे । 
चीलर रक्त सफ़ेद, लाल तो बहे सड़क पर। 
करके धूम-धड़ाक, चूसते पिस्सू मच्छर।। 
 


Police and pedestrians look on at the site of the bomb blast at Dilsukh Nagar in Hyderabad on Saturday. Photo: AFP
 मसले सुलझाने चला, आतंकी घुसपैठ । 
खटमल स्लीपर सेल सम, रेकी रेका ऐंठ । 

रेकी रेका ऐंठ, मुहैया असल असलहा । 
विकट सीरियल ब्लास्ट, लाश पर लगे कहकहा । 

सत्ता है असहाय, बढ़ें नित बर्बर नस्लें । 
मसले होते हिंस्र, जाय ना खटमल मसले । 
The Prime Minister, Manmohan Singh, being briefed by the Andhra Pradesh Chief Minister, N. Kiran Kumar Reddy, at the site of the bomb blast at Dilsukhnagar in Hyderabad on Sunday. (From left) DGP V. Dinesh Reddy, AP Governor E.S.L. Narasimhan, Union Minister of State for Surface Transport, Sarve Satyanarayana, and the state's Home Minister, Sabitha Indra Reddy, are alos seen. Photo: P.V. Sivakumar

 

Monday, 25 February 2013

वोट बैंक का खेल, नजर सबकी हाउस पर-




पीएम पद की मिठाई खाने की लालसा : दैनिक जनवाणी 26 फरवरी 2013 स्‍तंभ 'तीखी नज़र' में प्रकाशित




 मायावी दिल्ली किला, जिला-जीत जम जाँय । 
जिला मिला मुर्दा रखें, मुद्दा दें भटकाय । 


मुद्दा दें भटकाय, नजर तख्ते-ताउस पर । 
वोट बैंक का खेल, नजर सबकी हाउस पर । 

पटना पटनाएक, जया ममता बहकाया ।  
 चूक रहे चौहान, चूकते मोदी माया ॥ 


  (विष्णु बैरागी) 

 एकोऽहम्
सौदायिक बिन व्याहता, करने चली सिंगार |
गहने पहने मांग कर, लेती कई उधार |

(भाजपा की ओर इशारा)


 लेती कई उधार, खफा पटना पटनायक | 
 खानम खाए खार, करे खारिज खलनायक |
(जदयू, बीजद , मुस्लिम) 

हौदा हाथी रहित, साइकिल बिना घरौंदा |
 नहीं हिन्दु में ताब, पटे ना मोदी सौदा ||

(माया-मुलायम)
सौदायिक= स्त्री-धन नइखे= नहीं

गोरु गोरस गोरसी,  गौरैया गोराटि ।
  गो गोबर गोसा गणित, गोशाला परिपाटि । 
 
गोशाला परिपाटि, पञ्च पनघट पगडंडी ।
पीपल पलथी पाग, कहाँ सप्ताहिक मंडी । 
 
गाँव गाँव में जंग,  जमीं जर जल्पक जोरू । 
 भिन्न भिन्न दल हाँक, चराते रहते गोरु ॥ 
गोसा=गोइंठा / उपला
गोरसी = अंगीठी 
गोरु = जानवर 
गोराटि = मैना 
पाग=पगड़ी  
जलपक =बकवादी  

"ओ बी ओ चित्र से काव्य तक छंदोत्सव" अंक-23

सुंदरी सवैया 
बलुई कलकी ललकी पिलकी जल-ओढ़ सजी लटरा मुलतानी ।
मकु शुष्क मिले कुछ गील सने तल कीचड़ पर्वत धुर पठरानी ।
कुल जीव बने सिर धूल चढ़े, शुभ *पीठ तजे, मनुवा मनमानी ।
मटियावत नीति मिटावत मीत, हुआ *मटिया नहिं पावत पानी ||
*देवस्थान / आसन                       *लाश
कुंडलिया 
गीली ठंडी शुष्क मकु, मिटटी *मिट्ठी मीठ |
मिटटी के पुतले समझ, मिटटी ही शुभ पीठ |
मिटटी ही शुभ पीठ, ढीठ काया की गड़बड़ |
मृदा चिकित्सा मूल, करो ना किंचित हड़-बड़ |
त्वचा दोष ज्वर दर्द, देह पड़ जाए पीली |
मिटटी विविध प्रकार, लगा दे पट्टी गीली ||

कुल का प्यार दुलार, सभी का अक्षय नटखट-




विन्ध्येश्वरी प्रसाद त्रिपाठी
 गांव से (दो कुंडलिया)
गोरु गोरस गोरसी,  गौरैया गोराटि । 
गो गोबर *गोसा गणित, गोशाला परिपाटि । 
*गोइंठा / उपला
 गोशाला परिपाटि, पञ्च पनघट पगडंडी । 
पीपल पलथी पाग, कहाँ सप्ताहिक मंडी । 

गाँव गाँव में जंग,  जमीं जर जल्पक जोरू । 
 भिन्न भिन्न दल हाँक, चराते रहते गोरु ॥
 एकोऽहम्
*सौदायिक बिन व्याहता, करने चली सिंगार |
लेकर आई मांग कर,  गहने कई उधार |


गहने कई उधार, इधर पटना पटनायक |
खानम खाए खार, समझ ना पावे लायक |


बिन हाथी के ख़्वाब, सजाया हाथी हौदा |
^नइखे खुद में ताब, बड़ा मँहगा यह सौदा ||

*स्त्री-धन
^ नहीं
 
ये है मेरा नन्हा अक्षय @[100001428676499:2048:Akshay Vashisht] आज पूरे सत्रह साल का हो गया है... बहुत ही खुशमिज़ाज़। घर में सब इसे नटखट कहते हैं। सचमुच बहुत नटखट है मगर नटखट सिर्फ़ बातों मे है, किसी अपने की जरा सी चोट उसे रुला देती है। इश्वर ऎसा बेटा हर जनम में हर माँ को दे... आज उसके जन्म-दिन पर आप सब की दुआओं की अपेक्षा करती हूँ...
झटपट चढ़ ले सीढियाँ, बाढ़े बुद्धि-विवेक |
शिक्षा विधिवत पूर्ण कर, बन जा इन्सां नेक |


बन जा इन्सां नेक, चतुर्दिक कीर्ति-पताका |
दिल में प्रभु की टेक, दुलारा अपनी माँ का |


कुल का प्यार दुलार, सभी का अक्षय नटखट |
रहे स्वस्थ सानन्द, चरण अब छू ले झटपट ||




मसले होते हिंस्र, जाय ना खटमल मसले-

Police and pedestrians look on at the site of the bomb blast at Dilsukh Nagar in Hyderabad on Saturday. Photo: AFP
 मसले सुलझाने चला, आतंकी घुसपैठ ।

खटमल स्लीपर-सेल बना, रेकी रेका ऐंठ ।

 (सेल = २ मात्रा उच्चारण की दृष्टि से )
रेकी रेका ऐंठ, मुहैया असल असलहा ।

विकट सीरियल ब्लास्ट, लाश पर लगे कहकहा । 


सत्ता है असहाय, बढ़ें नित बर्बर नस्लें । 

मसले होते हिंस्र, जाय ना खटमल मसले । 

मासूमों के खून से, लिखते नई किताब |
पड़े लोथड़े माँस के, खाते पका कबाब |
खाते पका कबाब, पाक की कारस्तानी |
जब तक हाफिज साब, कहेंगे हिन्दुस्तानी |
तब तक सहना जुल्म, मरेंगे यूं ही भोले |
सत्ता तो है मस्त, घुटाले कर कर डोले |||

जवानी धर्म से भटके, हुआ वह शर्तिया "भटकल"-

लगा ले मीडिया अटकल, बढ़े टी आर पी चैनल ।
 जरा आतंक फैलाओ, दिखाओ तो तनिक छल बल ।।

फटे बम लोग मर जाएँ, भुनायें चीख सारे दल ।
धमाके की खबर तो थी, कहे दिल्ली बताया कल ॥

 हुआ है खून सादा जब, नहीं कोई दिखे खटमल ।
घुटाले रोज हो जाते, मिले कोई नहीं जिंदल ।।

कहीं दोषी बचें ना छल, अगर सत्ता करे बल-बल ।
नहीं आश्वस्त हो जाना, नहीं होनी कहीं हलचल ॥ 

जवानी धर्म से भटके, हुआ वह शर्तिया "भटकल" ।
मरे जब लोग मेले में, उड़ाओ रेल मत नक्सल ॥ 








Sunday, 24 February 2013

विकट सीरियल ब्लास्ट, लाश पर लगे कहकहा-



कल रांची प्रवास पर था- 

मसले होते हिंस्र, जाय ना खटमल मसले-

Police and pedestrians look on at the site of the bomb blast at Dilsukh Nagar in Hyderabad on Saturday. Photo: AFP
 मसले सुलझाने चला, आतंकी घुसपैठ । 

खटमल स्लीपर-सेल बना, रेकी रेका ऐंठ । 

 (सेल = २ मात्रा उच्चारण की दृष्टि से )
रेकी रेका ऐंठ, मुहैया असल असलहा । 

विकट सीरियल ब्लास्ट, लाश पर लगे कहकहा । 



सत्ता है असहाय, बढ़ें नित बर्बर नस्लें । 

मसले होते हिंस्र, जाय ना खटमल मसले । 
मासूमों के खून से, लिखते नई किताब |
पड़े लोथड़े माँस के, खाते पका कबाब |
खाते पका कबाब, पाक की कारस्तानी |
जब तक हाफिज साब, कहेंगे हिन्दुस्तानी |
तब तक सहना जुल्म, मरेंगे यूं ही भोले |
सत्ता तो है मस्त, घुटाले कर कर डोले |||

जवानी धर्म से भटके, हुआ वह शर्तिया "भटकल"-

लगा ले मीडिया अटकल, बढ़े टी आर पी चैनल ।
 जरा आतंक फैलाओ, दिखाओ तो तनिक छल बल ।।

फटे बम लोग मर जाएँ, भुनायें चीख सारे दल ।
धमाके की खबर तो थी, कहे दिल्ली बताया कल ॥

 हुआ है खून सादा जब, नहीं कोई दिखे खटमल ।
घुटाले रोज हो जाते, मिले कोई नहीं जिंदल ।।

कहीं दोषी बचें ना छल, अगर सत्ता करे बल-बल ।
नहीं आश्वस्त हो जाना, नहीं होनी कहीं हलचल ॥ 

जवानी धर्म से भटके, हुआ वह शर्तिया "भटकल" ।
मरे जब लोग मेले में, उड़ाओ रेल मत नक्सल ॥ 

कल गुरू को मूँदा था, आज चेलों ने रूँदा है-
पिलपिलाया गूदा है ।
छी बड़ा बेहूदा  है । ।
मर रही पब्लिक तो क्या -
आँख दोनों मूँदा है ॥
जा कफ़न ले आ पुरकस
इक फिदाइन कूदा है ।
कल गुरू को मूँदा था
आज चेलों ने रूँदा है ॥
पाक में करता अनशन-
मुल्क भेजा फालूदा है ॥

बम फटे हैं बेशक - एलर्ट करते तो हों -


 लोग मरते तो हैं । 
जख्म भरते तो हैं ॥ 
बम फटे हैं बेशक -
एलर्ट करते तो हों । 
पब्लिक परेशां लगती 
कष्ट हरते तो हैं ॥ 
 देते गीदड़ भभकी 
दुश्मन डरते तो हैं । 
 दोषी पायेंगे सजा 
हम अकड़ते तो हैं  । 
 बघनखे शिवा पहने -
गले मिलते तो हैं ॥  
कंधे मजबूत हैं रविकर-
लाश धरते तो हैं ।


खून में लटपटाय

चहुँ-ओर हाय-हाय,  हाथ-पैर खोय-खाय
खून में लटपटाय, मरा  या  बेहोश है |

 नहीं  काहू से डरत, बम-विस्फोट करत,
बेकसूर ही मरत,  करे  जय-घोष  है |

टका-टका बिकाय के, ब्रेन-वाश कराय के,
आका बरगलाय के, रहा  उसे  पोस है |

पब्लिक पूरी पस्त है, सत्ता अस्त-व्यस्त है
सरपरस्त मस्त है, मौत का आगोश है ||
 

चुप क्यूँ हो पापियों, कहाँ चरती है अक्कल-

 
 काट कपाल धरे कपटी, कटुता हर बार बढ़ावत है ।
भूल गया अघ मानवता, फिर भी नित पाक कहावत है ।
नक्सल भी बम प्लांट करे, शव में अब दुष्ट लगावत है ।
अन्दर बाहर घात हुवे, सरदी सरदार भगावत  है ।

 

नक्सल मारे जान से, फाड़ फ़ोर्स का पेट।
 करवाता बम प्लांट फिर, डाक्टर सिले समेट ।

डाक्टर सिले समेट, कहाँ मानव-अधिकारी ।
हिमायती हैं कहाँ, कहाँ करते मक्कारी ।
चुप क्यूँ हो पापियों, कहाँ चरती है अक्कल ?
 शत्रु देश नापाक, कहाँ का है तू नक्सल ??
Indian bomb plant
सीमा पर उत्पात हो, शत्रु देश का हाथ ।
फेल खूफिया तंत्र है, कटते सैनिक माथ ।
कटते सैनिक माथ, रहे पर सत्ता सोई ।
रचि राखा जो राम,  वही दुर्घटना होई ।
इत नक्सल आतंक, पुलिस का करती कीमा ।
पेट फाड़ बम प्लांट, पार करते अब सीमा ।। 

शब्दों से आक्रोश को, व्यक्त करे आकाश ।
देश रसातल में धंसे, देख लाल की लाश ।
देख लाल की लाश, अनर्गल बकती सत्ता ।
लेकिन पाकी फांस, घुसे हरदम अलबत्ता ।
इत नक्सल दुर्दांत, उधर आतंकी पोसे ।
करिए अब तो क्रान्ति, भावना से शब्दों से ।।


पाकी सिर काटे अगर, व्यक्त सही आक्रोश ।
मरे पुलिस के पेट में, नक्सल दे बम खोंस ।
नक्सल दे बम खोंस, आधुनिक विस्फोटक से ।
करे धमाका ठोस, दुबारा पूरे हक़ से ।
अन्दर बाहर शत्रु, बताओ अब क्या बाकी ।
नक्सल पीछे कहाँ, तनिक आगे है पाकी ।।

पाकी दो सैनिक हते, इत नक्सल इक्कीस ।
रविकर इन पर रीस है, उन पर दारुण रीस ।
उन पर दारुण रीस, देह क्षत-विक्षत कर दी ।
सो के सत्ताधीश, गुजारे घर में सर्दी ।
बाह्य-व्यवस्था फेल, नहीं अन्दर भी बाकी ।
सीमोलंघन खेल, बाज नहिं आते पाकी ।। 
आई मौनी अमाँ है, तमा तमीचर तीर |
नारी मरती सड़क पर, सीमा पर बलवीर |
सीमा पर बलवीर, देश में अफरा तफरी |
सत्ता की तफरीह, जेब लोगों की कतरी |
बेलगाम है लूट, समंदर पार कमाई |
ढूँढ़ दूज का चाँद, अमाँ यह लम्बी आई || 

Saturday, 23 February 2013

फटे बम लोग मर जाएँ, भुनायें चीख सारे दल-



"कैसी है ये आवाजाही" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)




बालू शाही है अगर, तो निकलेगा तेल |
आम रेत में क्या धरा, चढ़ टिब्बे पर खेल |
चढ़ टिब्बे पर खेल, खिलाती नौकर-शाही |
मँहगाई की आँच, बड़ी ही दारुण दाही |
लूट रहे हैं धन धान्य, होय हर जगह उगाही |
आम चाटते नमक, ख़ास की बालूशाही  ||


लगा ले मीडिया अटकल, बढ़े टी आर पी चैनल ।
 जरा आतंक फैलाओ, दिखाओ तो तनिक छल बल ।।

फटे बम लोग मर जाएँ, भुनायें चीख सारे दल ।
धमाके की खबर तो थी, कहे दिल्ली बताया कल ॥

 हुआ है खून सादा जब, नहीं कोई दिखे खटमल ।
घुटाले रोज हो जाते, मिले कोई नहीं जिंदल ।।

कहीं दोषी बचें ना छल, अगर सत्ता करे बल-बल ।
नहीं आश्वस्त हो जाना, नहीं होनी कहीं हलचल ॥ 

जवानी धर्म से भटके, हुआ वह शर्तिया "भटकल" ।
मरे जब लोग मेले में, उड़ाओ रेल मत नक्सल||

न इर्द-गिर्द तांकिये, अपने गिरेवाँ में झाँकिये !

पी.सी.गोदियाल "परचेत" 
मासूमों के खून से, लिखते नई किताब |
पड़े लोथड़े माँस के, खाते पका कबाब |
खाते पका कबाब, पाक की कारस्तानी |
जब तक हाफिज साब, कहेंगे हिन्दुस्तानी |
तब तक सहना जुल्म, मरेंगे यूं ही भोले |
सत्ता तो है मस्त, घुटाले कर कर डोले |||

ख्वाब


सुमन कपूर 'मीत' 

वाह वाह क्या बात है, कुछ सपने रंगीन । 
देखेंगे ये नयन भी, होकर के लवलीन । 
होकर के लवलीन, सखी पर बात बताना । 
इतना बढ़िया कथ्य, शिल्प सुन्दर कह जाना । 
आया कैसे भाव, अभी तो सु-प्रभात है । 
इन्तजार आनंद, बड़ी ही मधुर बात है  । । 


पिलपिलाया गूदा है । 
छी बड़ा बेहूदा  है । । 

मर रही पब्लिक तो क्या -
आँख दोनों मूँदा है ॥ 

जा कफ़न ले आ पुरकस 
इक फिदाइन कूदा है । |

कल गुरू को मूँदा था 
आज चेलों ने रूँदा है ॥

पाक में करता अनशन-
मुल्क भेजा फालूदा है ॥


कुण्डलिया छंद



 अरुण जी की कुंडली 
 अनगढ़ मिट्टी पा रही , शनै: - शनै: आकार
दायीं  -  बायीं  तर्जनी  ,  देती  उसे  निखार
देती  उसे  निखार , मध्यमा संग कनिष्का
अनामिका  अंगुष्ठ , नाम छोड़ूँ मैं किसका

मिलकर  रहे सँवार , रहे ना कोई घट - बढ़
शनै: - शनै: आकार , पा रही मिट्टी अनगढ़ ||
रविकर की टिप्पणी 
भगदड़ दुनिया में दिखे, समय चाक चल तेज |
कुम्भकार की हड़बड़ी, कृति अनगढ़ दे भेज |

कृति अनगढ़ दे भेज, बराबर नहीं अंगुलियाँ |
दिल दिमाग में भेद, मसलते नाजुक कलियाँ |

ठीक करा ले चाक, हटा मिटटी की गड़बड़ |
जल नभ पावक वायु, मचा ना पावें भगदड़ || 

"ओ बी ओ चित्र से काव्य तक छंदोत्सव" अंक-23

सुंदरी सवैया 
बलुई कलकी ललकी पिलकी जल-ओढ़ सजी लटरा मुलतानी ।
मकु शुष्क मिले कुछ गील सने तल कीचड़ पर्वत धुर पठरानी ।
कुल जीव बने सिर धूल चढ़े, शुभ *पीठ तजे, मनुवा मनमानी ।
मटियावत नीति मिटावत मीत, हुआ *मटिया नहिं पावत पानी ||
*देवस्थान / आसन                       *लाश
Virendra Kumar Sharma 
 लोग मरते तो हैं । 
जख्म भरते तो हैं ॥ 

बम फटे हैं बेशक -
एलर्ट करते तो हों । 

पब्लिक परेशां लगती 
कष्ट हरते तो हैं ॥ 

 देते गीदड़ भभकी 
दुश्मन डरते तो हैं ।

मैं आप की पोस्ट नही पढ़ पाया ???


Ashok Saluja  
शल्य-क्रिया हो आँख पर, चश्मा काला मोर । 
पढ़ने से करता  मना, किन्तु जोश पुरजोर । 
किन्तु जोश पुरजोर, दिवस दस और लगेंगे । 
रहूँ ब्लाग से दूर, नैन कुछ और ठगेंगे । 
रविकर भी बेचैन, ठीक यह देंह जिया हो । 
करिए कुछ आराम, सफल यह शल्य क्रिया हो ॥ 



Friday, 22 February 2013

बम फटे हैं बेशक - एलर्ट करते तो हों-




कुण्डलिया छंद



 अरुण जी की कुंडली 
 अनगढ़ मिट्टी पा रही , शनै: - शनै: आकार
दायीं  -  बायीं  तर्जनी  ,  देती  उसे  निखार
देती  उसे  निखार , मध्यमा संग कनिष्का
अनामिका  अंगुष्ठ , नाम छोड़ूँ मैं किसका

मिलकर  रहे सँवार , रहे ना कोई घट - बढ़
शनै: - शनै: आकार , पा रही मिट्टी अनगढ़ ||
रविकर की टिप्पणी 
भगदड़ दुनिया में दिखे, समय चाक चल तेज |
कुम्भकार की हड़बड़ी, कृति अनगढ़ दे भेज |

कृति अनगढ़ दे भेज, बराबर नहीं अंगुलियाँ |
दिल दिमाग में भेद, मसलते नाजुक कलियाँ |

ठीक करा ले चाक, हटा मिटटी की गड़बड़ |
जल नभ पावक वायु, मचा ना पावें भगदड़ || 



"कैसी है ये आवाजाही" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)




बालू शाही है अगर, तो निकलेगा तेल |
आम रेत में क्या धरा, चढ़ टिब्बे पर खेल |
चढ़ टिब्बे पर खेल, खिलाती नौकर-शाही |
मँहगाई की आँच, बड़ी ही दारुण दाही |
लूट रहे हैं धन धान्य, होय हर जगह उगाही |
आम चाटते नमक, ख़ास की बालूशाही  ||

लगा ले मीडिया अटकल, बढ़े टी आर पी चैनल ।
 जरा आतंक फैलाओ, दिखाओ तो तनिक छल बल ।।

फटे बम लोग मर जाएँ, भुनायें चीख सारे दल ।
धमाके की खबर तो थी, कहे दिल्ली बताया कल ॥

 हुआ है खून सादा जब, नहीं कोई दिखे खटमल ।
घुटाले रोज हो जाते, मिले कोई नहीं जिंदल ।।

कहीं दोषी बचें ना छल, अगर सत्ता करे बल-बल ।
नहीं आश्वस्त हो जाना, नहीं होनी कहीं हलचल ॥ 

जवानी धर्म से भटके, हुआ वह शर्तिया "भटकल" ।
मरे जब लोग मेले में, उड़ाओ रेल मत नक्सल||
न इर्द-गिर्द तांकिये, अपने गिरेवाँ में झाँकिये !

पी.सी.गोदियाल "परचेत" 
मासूमों के खून से, लिखते नई किताब |
पड़े लोथड़े माँस के, खाते पका कबाब |
खाते पका कबाब, पाक की कारस्तानी |
जब तक हाफिज साब, कहेंगे हिन्दुस्तानी |
तब तक सहना जुल्म, मरेंगे यूं ही भोले |
सत्ता तो है मस्त, घुटाले कर कर डोले |||

ख्वाब


सुमन कपूर 'मीत' 

वाह वाह क्या बात है, कुछ सपने रंगीन । 
देखेंगे ये नयन भी, होकर के लवलीन । 
होकर के लवलीन, सखी पर बात बताना । 
इतना बढ़िया कथ्य, शिल्प सुन्दर कह जाना । 
आया कैसे भाव, अभी तो सु-प्रभात है । 
इन्तजार आनंद, बड़ी ही मधुर बात है  । । 

"ओ बी ओ चित्र से काव्य तक छंदोत्सव" अंक-23

सुंदरी सवैया 
बलुई कलकी ललकी पिलकी जल-ओढ़ सजी लटरा मुलतानी ।
मकु शुष्क मिले कुछ गील सने तल कीचड़ पर्वत धुर पठरानी ।
कुल जीव बने सिर धूल चढ़े, शुभ *पीठ तजे, मनुवा मनमानी ।
मटियावत नीति मिटावत मीत, हुआ *मटिया नहिं पावत पानी ||
*देवस्थान / आसन                       *लाश

Virendra Kumar Sharma 
 लोग मरते तो हैं । 
जख्म भरते तो हैं ॥ 

बम फटे हैं बेशक -
एलर्ट करते तो हों । 

पब्लिक परेशां लगती 
कष्ट हरते तो हैं ॥ 

 देते गीदड़ भभकी 
दुश्मन डरते तो हैं ।

मैं आप की पोस्ट नही पढ़ पाया ???


Ashok Saluja  

शल्य-क्रिया हो आँख पर, चश्मा काला मोर । 
पढ़ने से करता  मना, किन्तु जोश पुरजोर । 
किन्तु जोश पुरजोर, दिवस दस और लगेंगे । 
रहूँ ब्लाग से दूर, नैन कुछ और ठगेंगे । 
रविकर भी बेचैन, ठीक यह देंह जिया हो । 
करिए कुछ आराम, सफल यह शल्य क्रिया हो ॥ 


कल गुरू को मूँदा था, आज चेलों ने रूँदा है-

पिलपिलाया गूदा है । 
छी बड़ा बेहूदा  है । । 

मर रही पब्लिक तो क्या -
आँख दोनों मूँदा है ॥ 

जा कफ़न ले आ पुरकस 
इक फिदाइन कूदा है । |

कल गुरू को मूँदा था 
आज चेलों ने रूँदा है ॥

पाक में करता अनशन-
मुल्क भेजा फालूदा है ॥