Tuesday, 1 September 2015

रविकर मन हलकान, निठल्ला फेरे माला-

सालाना जलसे किये, खूब बढ़ाई शाख |
 लेकिन पति भाये नहीँ, अब तो फूटी आँख | 

अब तो फूटी आँख, रोज बच्चों से अम्मा |
कहती आँख तरेर, तुम्हारा बाप निकम्मा । 

रविकर मन हलकान, निठल्ला फेरे माला |
वह तो रही सुनाय, लगा के मिर्च-मसाला ||

Monday, 22 June 2015

बिना दवा सेहत सही, तन मन रहे निरोग-

योगी भोगी योगमय, अच्छा है संयोग |
बिना दवा सेहत सही, तन मन रहे निरोग |
तन मन रहे निरोग, दवा के बचते पैसे |
फिर भी हैं कुछ लोग, मिले हैं ऐसे-वैसे |
इनमे से ही एक, मिला है रविकर ढोंगी |
करता हर दिन योग, किन्तु है बड़ा वियोगी ||

Wednesday, 6 May 2015

दोहे -

(1)
ओवर-कॉन्फिडेंट हैं, इस जग के सब मूढ़ |
विज्ञ दिखे शंकाग्रसित, यही समस्या गूढ़ || 

(2)
चौथेपन तक समझ पर, उँगली रही उठाय । 
माँ पत्नी क्रमश: बहू, किन्तु समझ नहिं आय ॥ 


Monday, 16 February 2015

आज वही माँ-बाप, भटकते मारे मारे-


हारे पापा हर समय, रहे जिताते पूत |
मुड़कर पीछे देखते, बिखरे पड़े सुबूत |

बिखरे पड़े सुबूत, आज नाराज विधाता |
हर दुख से हर बार, उबारी अपनी माता |

आज वही माँ-बाप, भटकते मारे मारे |
कह रविकर घबराय, परस्पर बने सहारे || 

Thursday, 5 February 2015

जब ताने में धार, व्यर्थ क्यों बेलन ताने

मेरी टिप्पणियां 
(२)
ताने बेलन देख के, तनी-मनी घबराय  |
पर ताने मारक अधिक, सुने जिया ना जाय |
सुने जिया ना जाय, खाय ले मन का चैना |
रविकर गया अघाय, खाय के चना च बैना |
मनमाने व्यवहार, नहीं ब्रह्मा भी जाने |
जब ताने में धार, व्यर्थ क्यों बेलन ताने || 
(१)
सिहरे रविकर तन-बदन, भयकारी यह चित्र |
चिमटा बेलन तवा का, नाम न लीजै मित्र |
नाम न लीजै मित्र, हृदय कमजोर हमारा |
वो तो बड़ी विचित्र, रोज चढ़ जाता पारा |
अभी हमारी मौज, गई जो बीबी पिहरे | 
पढूं आप का काव्य, बदन रह रह कर सिहरे ||

दोहे 
खोटे सिक्के चल रहे, गजब तेज रफ़्तार |

गया जमाना यूँ बदल, अब इक्के बेकार || 

Sunday, 18 January 2015

फैला रही प्रकाश, चिता जब धू धू जलती-

जलती जाए जिंदगी, ज्योति न जाया जाय । 
आँच साँच को दे पका, कठिनाई मुस्काय । 

कठिनाई मुस्काय, जिंदगी कागद लागे । 
अपनी मंजिल पाय,  देखते उससे आगे । 

गूढ़ कहानी आप, यहाँ स्वाभाविक चलती । 
फैला रही प्रकाश, चिता जब धू धू जलती॥ 

दोहा 
जाति ना पूछो साधु की, कहते राजा रंक |

मजहब भी पूछो नहीं, बढ़ने दो आतंक ||  

Thursday, 25 December 2014

मेरे सुपुत्र कुमार शिवा "कुश" की रचना -

http://kushkikritiyan.blogspot.in/
नहाकर नज्म निकली है, बालकोनी में आज अपनी ।
मेरी कलम को मिली वज्म , बालकोनी में आज अपनी ॥ 

बन गया चाय का कप, अचानक मदिरा का प्याला 
उम्र भर की फ़िक्र हुई ख़त्म,  बालकोनी में आज अपनी ।

 करे आजाद जुल्फों को, खींचकर तौलिया ऐसे 
गिरा बिजुली दिया है जख्म, बालकोनी में आज अपनी ।

गरदन झटक के जब जुल्फों को लहराया
हुई शीत लहरी सी सिहरन,  बालकोनी में आज अपनी ।

ek or kar k keshu unhe toliye se jhatka
baarish hui jhama jham, balcony me aaj apni

meri or mudi gardan to suraj pe se hata badal
satrangi hua mausam, balcony me aaj apni

nazar "kush" ki atak jaaye, juban kuch bhi na keh paaye
per lekhni fir bani humdam, balcony me aaj apni.!!



रविकर की रचना -


 नहाकर नज्म निकलेगी, अगर यूँ रोज छज्जे पर ।
 जमा दे वज्म गैरों की, गजल पुर-जोर छज्जे पर || ॥ 

> बने तब चाय प्याले की, अचानक हुश्न की मदिरा ।
> गिरे अखबार हाथों से, बहकता इश्क छज्जे पर ॥


> करे आजाद जुल्फों को, झटक कर तौलिया ऐसे
> गरजकर मेघ से बिजली, गिरे नि:शब्द छज्जे पर ।

> छुई पुरवा हुई सिहरन, बरसती बूँद नहलाये ।
> नहा के रेशमी काया, भिगो दे देह छज्जे पर ॥

> नजर रविकर अटक जाए, जुबाँ कुछ भी न कह पाये ।
> बदल ऐसा गया मौसम, हुआ मदहोश छज्जे पर ।।