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Sunday, 2 June 2013

लम्बी चादर तान के, सोया था लिक्खाड़-

लम्बी चादर तान के, सोया था लिक्खाड़ । 
गुजरे झंझावात सौ, खेल खेत खिलवाड़ । 

खेल खेत खिलवाड़, गाँव की गर्मी झेली । 
रेप झेंप अपहरण, सताई गई सहेली । 

कैसे सह चुपचाप, पड़ा रह सकता रविकर । 
हुआ बड़ा यह पाप, छोड़ता लम्बी चादर ॥

8 comments:

  1. तपे आग में जब जब कोई ,स्वर्ण निखर कर होवे सोई,गावं
    गए गरिमा बढ़ी .मन अति हर्षित ही होई ,लम्बे अंतराल के उपरांत स्वागत है

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  2. बहुत सुंदर रचना,,,बहुत दिनों बाद यहाँ आपको देख अच्छा लगा पिछली दो पोस्टो पर आपकी एक नजर चाहता हूँ,

    recent post : ऐसी गजल गाता नही,

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  3. स्वागत है आदरणीय गुरुदेव श्री आते ही सुन्दर कुण्डलिया छंद रच दिया, हार्दिक बधाई स्वीकारें.

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  4. आपका सादर स्वागत है !!

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  5. आपकी इस उत्कृष्ट प्रविष्टि की चर्चा कल मंगलवार ४ /६/१३ को चर्चामंच पर राजेश कुमारी द्वारा की जायेगी आप का वहां हार्दिक स्वागत है ।

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  6. आपकी यह रचना कल मंगलवार (04 -06-2013) को ब्लॉग प्रसारण पर लिंक की गई है कृपया पधारें.

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