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Friday, 28 June 2013

ये जनसंख्या बोझ, चलो इस तरह निबटते-



Rajesh Kumari 


 आल्हा में दुर्लभ चित्रण है, दीदी कहों कहाँ तक जाय |
नदियाँ बादल मलबा पत्थर, भवन पुलों को रहे बहाय |

शंकर नंदी मगन भंग में, रचना सारी भंग कराय |
चेताते मूरख मानव को, कुदरत को अब चले बराय ||

आपदाओं के प्रबंधक

Virendra Kumar Sharma 

बटते दल बादल फटे, दलदल लेते लील | 
दलते ग्राम दलान घर, देत दलाल दलील |

देत दलाल दलील, आपदा है अब आई |
राहुल लाखों मील, रसद कैसे पहुंचाई |  

बैठक ठक ठक रोज, बड़े मसले हैं घटते |
ये जनसंख्या बोझ, चलो इस तरह निबटते || 



लोकसेवकों में लोकसेवक होनें का भाव भी तो होना चाहिए !!

पूरण खण्डेलवाल 
 
मत की कीमत मत लगा, जब विपदा आसन्न ।
आहत राहत चाहते, दे मुट्ठी भर अन्न ॥



आहत राहत-नीति से, रह रह रहा कराह |

अधिकारी सत्ता-तहत, रिश्वत रहे उगाह ॥



घोर-विपत आसन्न है, सकल देश है सन्न ।

सहमत क्यूँ नेता नहीं, सारा क्षेत्र विपन्न ॥



नेता रह मत भूल में, मत-रहमत अनमोल |

ले जहमत मतलब बिना, मत शामत से तोल ॥
नष्ट हुवा घर-ग्राम कुटी जब क्रोध करे दल बादल देवा -
सवैया -


(1)
बाँध बनावत हैं सरकार वहाँ पर मूर्ति हटावत त्यूँ |



गान्धि सरोवर हिंसक हो मलबा-जल ढेर बहावत क्यूँ |



शंकर नेत्र खुला तिसरा करते धरती पर तांडव ज्यूँ |



धारिणि धारि महाकलिका कर धारण खप्पर मारत यूँ |





(2)

नष्ट हुवा घर-ग्राम कुटी जब क्रोध करे दल बादल देवा |
कष्ट बढ़ा गतिमान नदी करती कलिका किलकार कलेवा |

दूर रहे सरकार जहाँ बस खाय रही कुरसी-कर-मेवा | 
हिम्मत से तब फौज डटी इस आफत में करती जन-सेवा ||



12 comments:

  1. सुन्दर प्रस्तुति !!
    सादर आभार आदरणीय !!

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  2. बहुत लाजबाब प्रस्तुति

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  3. सुन्दर प्रस्तुति !

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  4. आपकी इस प्रविष्टी की चर्चा कल रविवार (30-06-2013) के चर्चा मंच 1292 पर लिंक की गई है कृपया पधारें. सूचनार्थ

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  5. बैठक ठक ठक रोज, बड़े मसले हैं घटते |
    ये जनसंख्या बोझ, चलो इस तरह निबटते ||

    बहुत खूब .

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  6. बहुत सुंदर संकलन. बड़े अच्छे लिंक का समावेश है इस प्रस्तुति में.

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  7. बहुत ही सुन्दर और सराहनीय

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  8. लाज़वाब प्रस्तुति...

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