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Thursday, 10 October 2013

दादा दादी को मिली, इक नन्हीं सी जान-

चित्र के विचारों से कैसे करोगे मुकाबला (कविता) दादाभाई

नुक्‍कड़ 
आओ मिल स्वागत करें, सोहर मंगल गान |
दादा दादी को मिली, इक नन्हीं सी जान |

इक नन्हीं सी जान, जान लो माता आई |
माता के गुणगान, करो मुन्ना पहुनाई |

रविकर का आशीष, बुद्धि बल विद्या पाओ |
रहो स्वस्थ सानन्द, विराजो गुड़िया आओ || 


नवरात्रि और विजयादशमी की शुभकामनायें 
१२ से फ़ैजाबाद / लखनऊ प्रवास पर-
१९-२० को दिल्ली में-
२३ को वापसी-रविकर  

हवस में अंधे नारी और पुरुष:एक ही रथ के सवार


koushal  
 डंका बाजे हवश का, बढे-चढ़े नर-नारि |
देह हुई परवश अगर, होय सबल कुविचार |

होय सबल कुविचार, बुद्धि पर लगते ताले |
घटित होय व्यभिचारि, मिटाते घर मतवाले |

सूर्पनखा की चाह, दाह देती कुल-लंका |
संयम नियम सलाह, धर्म का बाजे डंका || 


लेकिन बचपन आज, महज दिखता दो साला-

तब का बचपन और था, अब का बचपन और |
दादी की गोदी मिली, नानी से दो कौर |

नानी से दो कौर, दौर वह मस्ती वाला | 
लेकिन बचपन आज, महज दिखता दो साला | |

भोजन डिब्बा बंद, अक्श आया में रब का |
कंप्यूटर में कैद, अधिकतर अबका तबका ||

kabhee kabhee

अतीत के पन्ने


झाँको सुन्दर दृश्य भी, जीवन अल्बम पूर्ण |
करो कल्पना सुखद की, दुखद करे दिल चूर्ण |

दुखद करे दिल चूर्ण, सीख ले करके छोड़ो |
जीवन बड़ा अमूल्य, नजाकत से यह मोड़ो |

रविकर का सन्देश, भूत से जीवन आँको |
वर्तमान का मोल, समझ के आगे झाँको ||

 

लक्ष्मणपुर बाथे नरसंहारः जब कांप उठा था देश

Jai Sudhir 
बाथे-नरसंहार का, मिट जाता कुल दोष |
उलट गया अब फैसला, इत खुशियाँ उत रोष |

इत खुशियाँ उत रोष, बिछी अट्ठावन लाशें |
तड़प रहीं दिन रात, कातिलों तुम्हें तलाशें |

माना तुम निर्दोष, क़त्ल फिर किसके माथे |
मांग रहा इन्साफ, पुन: लक्ष्मण पुर बाथे |


 नैना साहनी हत्याकांड -उच्चतम न्यायालय अपने निर्णय पर पुनर्विचार करे .




Supreme Court

तन्दूरी में दे पका, जिससे रहा सनेह |
टोटे-टोटे दिल किया, बोटी बोटी देह |

बोटी बोटी देह, उसे तड़पाया काटा |
लगा लगा अवलेह, दुष्ट हर टुकड़ा चाटा |

फाँसी करती मुक्त, सजा होती ना पूरी  |
अब आजीवन कैद, खाय खुद की तन्दूरी |



हाँ से खेलें देह दो, वर्षों कामुक खेल-

हाँ से खेलें देह दो, वर्षों कामुक खेल |
दर्ज शिकायत इक करे, हो दूजे को जेल |

हो दूजे को जेल, नौकरी शादी झाँसा |
यह सिद्धांत अपेल, बना अब अच्छा-खाँसा |

हुई मौज वह झूठ, कौन अब किसको फाँसे 
रिश्ते की शुरुवात, हुई थी लेकिन हाँ से |

9 comments:

  1. क्या कह सकता हूँ मैं ... बस यही कि ......


    शब्दों का है खेल,शब्द के जादूगर हैं
    शब्द सरल हैं लेकिन भाव प्रखर हैं
    पंक्ति पंक्ति में जीवन बहता है 'जय'
    कुंडलियों के राजा, अपने रविकर हैं

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  2. स्वागत है नन्ही जान का
    दादा नहीं दिखाया लड्डू
    अभी तक किसी को भी
    है किस काम का :)

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    1. आप लड्डू खिलाएं
      बदले में तरबूज पाएं

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  3. बधाई और 'नन्ही परी ' को बहुत बहुत शुभ कामनाएं ..एक से बढ़ एक सुन्दर शब्दों से सजी रचनाएँ
    जय माता दी

    भ्रमर ५

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    1. शुक्रिया मित्रों और ब्‍लॉग के जादूगरों

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  4. सुन्दर प्रस्तुति ....!
    आपको सूचित करते हुए हर्ष हो रहा है कि आपकी इस प्रविष्टी की चर्चा कल शनिवार (12-10-2013) को "उठो नव निर्माण करो" (चर्चा मंचःअंक-1396) पर भी होगी!
    शारदेय नवरात्रों की हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  5. आओ मिल स्वागत करें, सोहर मंगल गान |
    दादा दादी को मिली, इक नन्हीं सी जान |

    इक नन्हीं सी जान, जान लो माता आई |
    माता के गुणगान, करो मुन्ना पहुनाई |

    रविकर का आशीष, बुद्धि बल विद्या पाओ |
    रहो स्वस्थ सानन्द, विराजो गुड़िया आओ ||
    स्वागत महालक्ष्मी का .सुन्दर बंदिश .

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