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Tuesday, 8 October 2013

रविकर नाक घुसेड, थोपते मर्जी पातक



सांत्वना (लघु कथा) : अरुण निगम

पैसा बप्पा से बड़ा, पैसा करे इलाज |
लाज नहीं आती दिखी, आई पर आवाज |

आई पर आवाज, हमी ने था सिखलाया |
चाचा मामा बुआ, कई रिश्ते छुड़वाया |

सदा पढ़ाया पाठ, आज जैसे को तैसा |
सोलह दूनी आठ, मँगा लो रविकर पैसा ||

अपनी राम कहानी में.

धीरेन्द्र सिंह भदौरिया
दिल के दौर तीन पड़े पर, गति समुचित है नाड़ी की |
लश्कर बिन हथियार दिखे अब, धार तेज पर वाणी की |

शब्दों के व्यवहार बदलते, जब से जग में देखा है-
भावों पर विश्वास करें नहिं-बातें समझ अनाड़ी की |

दे लालू पर दाग, दगा दे दहुँदिश दरजी-

दरजी दहुँदिश दर्जनों, कैंची सरिस जुबान |
काट-छाँट में रत मगर, मुखड़े पर मुस्कान |

मुखड़े पर मुस्कान, दिखी खुदगर्जी घातक |
रविकर नाक घुसेड, थोपते मर्जी पातक |

सी बी आई तेज, मुलायम माया गरजी |
दे लालू पर दाग, दगा दे दहुँदिश दरजी ||


अपने-अपने ज़माने का .....ये बचपन !!!

Ashok Saluja 
बचपन तब का और था, अब का बचपन और |

दादी की गोदी मिली, नानी हाथों कौर |


नानी हाथों कौर, दौर वह मस्ती वाला |
लेकिन बचपन आज, निकाले स्वयं दिवाला |

आया की है गोद, भोग पैकट में छप्पन |
कंप्यूटर के गेम, कैद में बीते बचपन ||

....

दौरे दिल का दर्द इत, उत दौरे पर पूत |

सुतके दौरे बेधड़क, *पिउ बे-धड़कन *सूत ||

*पिता
*सो गया
.

ये दिल मांगत मोर-


दुर्मिल सवैया

पुरबी उर-*उंचन खोल गई, खुट खाट खड़ी मन खिन्न हुआ |

कुछ मत्कुण मच्छर काट रहे तन रेंगत जूँ इक कान छुआ |

भडकावत रेंग गया जब ये दिल मांगत मोर सदैव मुआ  |

फिर नारि सुलोचन ब्याह लियो शुभचिंतक मांगत किन्तु दुआ  |

उंचन=खटिया कसने वाली रस्सी , उरदावन
मत्कुण=खटमल


दुरवाणी ही याद रहेगी यूँ आखिर -सतीश सक्सेना

सतीश सक्सेना 
लगे लड़ाका लड़कियां, निश्चय होवे भोर |
सुनता सुरवाणी सरस, हरस रहा मन मोर |


हरस रहा मन मोर, बात दिल की कह देती |
मैया दिखे प्रसन्न, बलैयाँ सौ सौ लेती |

कह रविकर आशीष, मिले नित दुर्गे माँ का |
पाती वे अधिकार, आज जो लगे लड़ाका ||

बस्ती कई बसाय, खेत उपजाऊ करती -

सरिता का उद्गम कहाँ, कहाँ नहीं चल जाय |
करे लोकहित अनवरत, बस्ती कई बसाय |

बस्ती कई बसाय, खेत उपजाऊ करती |
नाले मिलते आय, किन्तु गन्दगी अखरती |

रखते गन्दी नियत, दुष्ट फैले हैं परित: |
सह सकती नहिं और, मिले सागर में सरिता-

सुन्दर मन के भाव अति, सधे सधाए वर्ण |
सुनकर के संतृप्त हुवे,, परिणीता के कर्ण |
परिणीता के कर्ण, युगल को बहुत बधाई |
शुद्ध समर्पण देख, ख़ुशी घर आँगन छाई |

ठुमुक ठुमुक शिशु देख, खिले रविकर का अन्तर |
यही आज आशीष, बने जीवन यह सुन्दर ||

उठाओ कुदाल !

Amrita Tanmay 

करती आवाह्न दिखे, करती तन्मय कर्म |
जीवन यात्रा क्यूँ रुके, प्रेषित गीता मर्म |

प्रेषित गीता मर्म, धर्म अपना अपनाओ |
खिले धूप से चर्म, हाथ फावड़ा उठाओ |

हल से हल हो प्रश्न, छोड़ मत धरती परती |

मनें रोज ही जश्न, जाति जब कोशिश करती || 

4 comments:

  1. सदा पढ़ाया पाठ, आज जैसे को तैसा |
    सोलह दूनी आठ, मँगा लो रविकर पैसा ||

    क्या बात है .

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  2. सदा पढ़ाया पाठ, आज जैसे को तैसा |
    सोलह दूनी आठ, मँगा लो रविकर पैसा ||

    सुंदर अभिव्यक्ति...!

    RECENT POST : अपनी राम कहानी में.

    ReplyDelete
    Replies
    1. काफी दिनों बाद मेरे पोस्ट पर काव्यमय टिप्प्णी करने के लिए आभार,,,रविकर जी,,,

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  3. बहुत सुन्दर प्रस्तुति...!
    --
    आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा आज बृहस्पतिवार (10-10-2013) "दोस्ती" (चर्चा मंचःअंक-1394) में "मयंक का कोना" पर भी है!
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का उपयोग किसी पत्रिका में किया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    शारदेय नवरात्रों की हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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