Wednesday, 6 July 2011

तन के घाव, मन के लड्डू ||

नहीं  चाहिए  मरहम  सुन  रे  बे-दर्दी।
नहीं   चाहिए   तेरी   कोई   हमदर्दी।।

घाव  हमारे  बे-हद  हमें अज़ीज़ लगें,
सादे  जीवन  में  इसने  रौनक भर दी।

ठहर-ठहर  कर  भरता  उच्छवासें जैसे
"रविकर"  को  है  हुई  ज़रा खाँसी-सर्दी।

तड़पूं   चाहे  तड़प-तड़प  के  मर  जाऊं,
तुमने  सिलवा  दी  मेरी  फौजी  वर्दी |

तन  के  घावों  की चिंता अब नहीं मुझे
अंतर-मन  में  विरह-वेदना  की *कर्दी | 

17 comments:

  1. घाव हमारे बे-हद हमें अज़ीज़ लगें,
    सादे जीवन में इसने रौनक भर दी।

    वाह .. क्या बात है ..

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  2. हाय रे बेदर्दी क्या हुआ, देख लेना लवेरिया तो नहीं हुआ।

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  3. तड़पूं चाहे तड़प-तड़प के मर जाऊं,
    तुमने कम एहसान नहीं मुझपर कर दी।

    सुंदर
    विवेक जैन vivj2000.blogspot.com

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  4. कविता अभ्यास अच्छा चल रहा है... लगे रहो..

    शुरू के तीन छंद बेहद अच्छे हैं. बाद के दो छंद जबरदस्ती के लग रहे हैं.

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  5. आपकी इस उत्कृष्ट प्रवि्ष्टी की चर्चा आज शुक्रवार के चर्चा मंच पर भी की गई है!

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  6. क्या बात है ..

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  7. बहुत ही बढि़या ...।

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  8. घाव हमारे बेहद हमें अज़ीज़ लगें ,
    सादे जीवन में इसने रौनक भर दी.
    बहुत खूबसूरत करीब ज़िन्दगी के -
    गर्दिशे ऐयाम तेरा शुक्रिया ,
    हमने हर पहलू से दुनिया देख ली .

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  9. वाह भाई! बहुत बढ़िया पोस्ट... क्या बात है... बहुत-बहुत बधाई

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  10. बहुत खूब .. काफी दर्दभरी है आपकी रचना

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  11. रोचक ढंग में लिखा...बधाई.

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  12. रविकर जी बहुत ही गंभीर -और किस सहजता से इसे सहा गया -झेलने वाले को दुवाएं हौंसला ....

    घाव हमारे बे-हद हमें अज़ीज़ लगें,
    सादे जीवन में इसने रौनक भर दी।
    भ्रमर 5

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  13. क्या होगा

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  14. बहुत सुन्दर

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  15. beautiful poem
    hurt and love

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