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Thursday, 4 August 2011

नाग-देवता माफ़ कीजिये ||

नाग-देवता माफ़ कीजिये,
मार  कुंडली  दूध  पीजिये |

पूज  पञ्चमी  पाँच पंच की,
विष-विशेष तो मंगा लीजिये || 

        पहला- रहा बहला 
 
वाणी इनकी मधुर-विषैली,
नित बाढ़े *विषयाधिप थैली |

जड़े जमा *विषयांत पार भी ,
*विषा स्विस-बैंकों तक फैली ||

बिल में गहरी सांस खींचिए,
नाग-देवता माफ़ कीजिये ||
 विषयाधिप = शासक   विषा = कडुवी-तरोई   विषयांत= देश की सीमा 
  
      दूसरा- सिरफिरा 

विष-विस्फोट कराता घूमे,
दर्दनाक  मंजर  पर  झूमे |

आयातित-विष का भंडारी
मौत भरी है इसके फू-में  ||

वारदात पर हाथ मींजिये,
नाग-देवता माफ़ कीजिये || 
           
         तीसरा- पशु निरा

दूध - दवा - फल - सब्जी - ठेला
*विष्कलन का व्याधिक खेला |

महा-मिलावट जहर-खुरानी,
विषान्नों  का  लागे  मेला ||

इन सबका इन्साफ कीजिये,
नाग-देवता माफ़ कीजिये ||
 विष्कलन = आहार 
           
    चार- खौफ का व्यापार

माफिया मर्फ़िया सा घातक
पुश्तों का  बड़-पापी पातक |

अपना हित साधे ये  प्राणी 
जन-संसाधन का है बाधक ||

इनको सारी जगह दीजिये,
नाग-देवता माफ़ कीजिये ||
           
    पांच-नंगा नाच   
जैसे जैसे पेट बढ़ रहा 
वैसे-वैसे रेट बढ़ रहा |

उन्नत विष का दंड मंगाया,
बेकसूर बे-मौत मर रहा ||

छटे-छ्टों को साफ़ कीजिये   ,
नाग-देवता माफ़ कीजिये ||
 

Monday, 11 July 2011

उठकर सुबह भूमि बन्दन कर किरतन-भजन बजाता था | नित्य-क्रिया से होकर निवृत्त, योगासन अजमाता था | ---- स्नान - ध्यान से फारिग होकर, गरम कलेवा खाता था |---- ट्वेंटी - ट्वेंटी समाचार से मन बहलाने जाता था

ट्वेंटी - ट्वेंटी  समाचार --

लेकिन दर्शन-दूर है |
हरदिन का दस्तूर है --

मोहन करते माँजी-माँजी,   आर एस एस ने लाठी भांजी |
राहुल मोस्ट वांटेड बेचलर,  दिग्गी  उनके  हाँजी  हाँजी |
महा-घुटाले-बाज तिहाड़ी,  फटकारे नित चाबुक  काजी |
कातिल का महिमा-मंडन,  जीते जालिम  हारी  बाजी--

आदत से मजबूर है |
हरदिन का दस्तूर है -

बड़ी शान से अपनी करनी हारर-किलर सुनाता जाये |
सालों  बन्द कोठरी अन्दर बहिना अपनी मौत बुलाएं |
कहीं  बाप  के अनाचार  का  घड़ा    फूटने  को आये |
बेटी - नौकर - चाकर  सारे  फूटी   आँख   नहीं  भाये--

बनता कातिल क्रूर  है |
हरदिन का दस्तूर है --

भाई   भाई   काट रहा , तो  कही  भीड़  का  न्याय है |
उधर  नक्सली रेल  उडाता, इधर पुलिस असहाय है |
कालेधन  के   भूखेपन   पर  बाबा   गया  अघाय है |
लोकपाल के दल-दल पर दल जुदा-जुदा दस राय है--
 
दिल्ली लगती दूर है 
हरदिन का दस्तूर है --

बड़ी सोनिया सा चल करके  छटी-सानिया ने देखा 
हाथ  पे  उसने  अपने  पाई  तब पाकिस्तानी  रेखा |
सट्टेबाज - खिलाड़ी सबकी लाजवाब लगती एका |
बेशुमार ताकत से  हरदिन  बदल रहे  रब का लेखा --

ताकत से मगरूर है | 
हरदिन का दस्तूर है --

Sunday, 19 June 2011

रक्त-कोष की पहरेदारी--(पूरी रचना)

मिला बाज को काज अनोखा, करता चिड़ियों की रखवाली |

शीत-घरों की सकल व्यवस्था, चूहों ने चुपचाप सँभाली |

दुग्ध-केंद्र मे धामिन ने जब, गाय-भैंस पर छान्द लगाया |
मगरमच्छ ने अपनी हद में, मत्स्य-केंद्र मंजूर कराया ||

महाघुटाले - बाजों ने ली, जब तिहाड़ की जिम्मेदारी |
अंग-रक्षकों ने मालिक की, ले ली जब से मौत-सुपारी |

तिलचट्टों ने तेल कुओं पर, अपनी कुत्सित नजर गढ़ाई |
जल्लादों ने झपटी झट से, पूजा-घर की कुल मुख्तारी ||

संविधान की रक्षा करने, चले उचक्के अत्याचारी ||
तो रक्त-कोष की पहरेदारी, नर-पिशाच के जिम्मे आई ||

Wednesday, 15 June 2011

रक्त-कोष की पहरेदारी

चालबाज, ठग, धूर्तराज   सब,   पकडे   बैठे   डाली - डाली |
आज बाज को काज मिला जो करता चिड़ियों की रखवाली |

दुग्ध-केंद्र मे धामिन ने जब, सब गायों पर छान्द लगाया |
मगरमच्छ ने  अपनी हद में,  मत्स्य-केंद्र  मंजूर  कराया ||            

महाघुटाले - बाजों   ने   ली,  जब तिहाड़ की जिम्मेदारी |
जल्लादों ने झपटी झट  से, मठ-महन्त की कुल मुख्तारी||

तिलचट्टों ने तेल कुओं पर, अपनी कुत्सित नजर गढ़ाई |
तो रक्त-कोष  की  पहरेदारी,  नर-पिशाच के जिम्मे  आई ||

छोड़ के अपने गाँव

Friday, 10 June 2011

माथे से अब खून बहेगा

कोठर  में  सोई  गौरैया ,   मार  झपट्टा  बाज  उठाये |
बिन प्रतिरोध सभी चूजों को , वो अपना आहार बनाए ||
पाण्डव  के  बच्चे  सोये  थे,  अश्वस्थामा  महाकुकर्मी  |
गला रेत कर, बहुतै खुश हो, दुर्योधन को खबर सुनाये ||

उस भारत की दुखती घटना, नव-भारत फिर से दोहराए
राम की लीला से घबरा कर, आत्मघात हित कदम उठाये | 
पागल सा भटकेगा शापित, जन्म से शोभित मणि छिनाये--
सदा  खून   माथे   से   बहता,  अश्वस्थामा  नजर  चुराए  ||

 

Wednesday, 8 June 2011

पहचानो लोकतंत्र के कातिलों को

उन  दरख्तों  के  बगल  में  खून  के  छींटे  दिखे |
तख्तियों पर  कातिलों  के  नाम  यूँ  पाए  लिखे ||

गुरुमुखी में था लिखा "भलभेचना" पढ़कर लगा |
पहचानता मकतूल होगा, था कोई उसका सगा ||

पास  काले  कोट  सा  गाउन  पड़ा  था  घास  पर |
खून-कीचड़ में सना था, "सिलवटें-बल" तर-बतर ||

गोल त्रिभुज और डब्ल्यू सी  दिखी इक वर्ण-माला |
भारी तबाही थी मचाई, जुड़ गया अध्याय काला ||
 
जो उधर  जिन्दा  बचे,  उनका यही पैगाम है --
संघर्ष  का आगाज  होवे,  राष्ट्र-हित  अंजाम  है ||