मेरे मित्र दीपक की, महा -लफंगों में
गिनती होती है यहाँ |
उनकी डायरी का एक पन्ना मिला मुझे
जस का तस प्रस्तुत है --
शंका के बादल मंडराए उनको दूर करो |
तुम अपने विश्वास सूर्य से जीवन धूप भरो ||
रिस-रिस रिश्ते, रिसते-रिसते रीते हुए नयन |
शादी मुझसे प्यार किसी से कैसा किया चयन ||
होंठ से बाहर निकले नगमें तेरा नाम लिए |
और किसी की खातिर हमने अपने होंठ सिये ||
सिले होंठ की कसम खामियां कभी नहीं देखी-
तू ही मेरी एक अकेली कष्ट अपार हरो ||
शंका के बादल मंडराए उनको दूर करो |
तुम अपने विश्वास सूर्य से जीवन धूप भरो ||
चाहत की स्वप्निल दुनिया में तिनका-तिनका जोड़ा |
प्रिये बताओ कारण क्या जो मेरा सपना तोडा | |
दर्द से व्याकुल जीवन में तुम नश्तर चुभा रहे |
तड़पाने से अंत भला क्यों दुनिया लुभा रहे ||
सारी खुशियाँ सारा वैभव अपने प्रियतम पर |
करूँ निछावर अपना जीवन होगी प्रीति अमर ||
अमर प्रीति की खातिर दीपक तिल-तिल जलता है |
जलते दीपक की बाती को यूँ न *पूर करो || *बुझाना
शंका के बादल मंडराए उनको दूर करो |
तुम अपने विश्वास सूर्य से जीवन धूप भरो ||