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Wednesday, 22 February 2012

अपने अंतरजाल पर, इक पीपल का पेड़ --

 उच्चारण -  

अपने अंतरजाल पर, इक पीपल का पेड़ ।
तोता-मैना बाज से, पक्षी जाते छेड़ ।
पक्षी जाते छेड़, बाज न फुदकी आती
उल्लू कौआ हंस, पपीहा कोयल गाती ।
 पल-पल पीपल प्राण, वायु ना देता थमने ।
पाले बकरी गाय, गधे भी नीचे अपने ।



नवगीत : चंचल मृग सा

भक्ति-भाव लख आपका, हिरदय भाव-विभोर ।
प्रभु के दर्शन हो गए, शैशव संगत शोर ।।

अनुभव कर के भूख का, उस गरीब को देख ।
दिन भर इक रोटी नहीं, मिटी हस्त आरेख ।।





आदत अपनी छोड़ के, बोले मीठे बोल ।
निश्चित मानो शख्स वो, धोखा देकर गोल ।। 


ए जी भारत रत्न को, काहे वे बेचैन ।
नव-धनाड्य से मूंदते, क्यूँ कर अपने नैन ।
क्यूँ कर अपने नैन, रत्न सारे *किन लायें ।*खरीद
भारत की क्या बात, जगत सिरमौर कहायें ।
रविकर उनकी पूँछ, स्वर्ग तक देखो बाढ़ी ।।
हैं ना सारे चोर, बिना तिनके की दाढ़ी ।।  




  लम्हों का सफ़र  

सात अरब की भीड़ में, अंतर-मन अकुलाय ।
तनकर तन्मय तन तपत, त्याग तमन्ना जाय ।।




 सरोकार  

सरोकार सारे रखें, अक्सर डिब्बा बन्द ।
बच्चों के इस प्रश्न को, गुणी उठायें चन्द ।
गुणी उठायें चन्द, रास्ता स्वयं निकालें ।
दें बेहतर जीवन, बना के अपना पालें ।
वन्दनीय सज्जन, सभी बच्चे हैं प्यारे ।
अभिभावक बिन किन्तु, अंध में भटकत सारे ।।


दिनेश की टिप्पणी - आपका लिंक
http://dineshkidillagi.blogspot.in

Monday, 22 August 2011

अन्ना बड़े महान


कद - काठी  से शास्त्री, धोती - कुरता श्वेत |
बापू  जैसी  सादगी,  दृढ़ता  सत्य  समेत ||

निश्छल  और  विनम्र  है, मंद-मंद मुस्कान |
मितभाषी मृदु-छंद है, उनका हर व्याख्यान ||

अभिव्यक्ति रोचक लगे, जागे मन विश्वास |  
बाल-वृद्ध-युवजन जुड़े, आस छुवे आकाश ||

दूरदर्शिता  की  करें,  कड़ी   परीक्षा  पास |
जोखिम से डरते नहीं, नहीं अन्धविश्वास ||

सद-उद्देश्यों  के  लिए, लड़ा  रहे  वे जान |
सिद्ध-पुरुष की खूबियाँ, अन्ना बड़े महान ||

Thursday, 21 July 2011

बहन ने परदेशी भाई को दिए जख्म ||

सम्बन्धों  में जब दिखे, अपने तनिक खटास |
बलि का बकरा ढूंढ़ लो,  जो   कोई   हो  पास || 

क्यों भाई जोशी  ?
हाँ पडोसी ||

जख्मों का दुर्गन्ध जो,  फ़ैल रहा है आज |
मरहम पट्टी का सही, रहा नहीं अन्दाज ||
                                                                     
क्यों भाई जोशी  ?
हाँ पडोसी ||

दुनिया  की  खातिर किया, भर्ती  नर्सिंग होम,
अग्नि में जलकर बंटा, धरा वायु जल व्योम ||

क्यों भाई जोशी  ?
हाँ पडोसी ||

चुनो फूल सम्मान से,  गये  छोड़ इहलोक |
सगे  हमारे बाप जी,  कर तेरह दिन शोक ||

क्यों भाई जोशी  ?
हाँ पडोसी || 

तेरहवीं  भी  हो  गई, विदा  हुए  मेहमान |
बहनोई-बहिने रुकी, लेकर जमी-मकान ||   

क्यों भाई जोशी  ?
हाँ पडोसी ||

घटी  रोशनी  में भला,  बटेगा  कैसे  माल |
फूल झाड़कर के जरा, फिरसे दीपक बाल ||

क्यों भाई जोशी  ?
हाँ पडोसी ||

अपना  हिस्सा  पाय  के,  धूनी  रहे  रमाय |
इक मकान में "सात" घर, देखो रहे समाय ||


क्यों भाई जोशी  ?
हाँ पडोसी ||

था  दहेज़  मोटा दिया, कर्जा  भरा कमाय,
बहिनों के वर्ताव से, घर-भर गए अघाय ||

क्यों भाई जोशी  ?
हाँ पडोसी || 

Monday, 27 June 2011

शुक्रिया ||

पूरी   होती
मन  की  मुराद 
जब   चाह से  |
या  किसी 
बन्दे की 
सलाह से |
शुक्रिया 
कहता रहे ,
अल्लाह से  ||
कहता रहे ,
अल्लाह से  ||

रहमो-करम
से ही चले 
कायनात सारी--
मुश्किलें 
हटती गईं --
दिखती गई