'चित्र से काव्य तक' प्रतियोगिता अंक -२०
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रविकर की प्रविष्टियाँ
दुर्मिल सवैया
जलबिंदु जमें दस-बारह ठो, कवि वृन्द जमे जलसा जमता |
जलहार खड़ा पद-चिन्ह पड़ा जलकेश जले जल जो कमता ।
जलवाह खफा जलरूह मरे जलमूर्ति दिखे खुद में रमता ।
जलथान घटे जगदादि सुनो जलशायि जगो जड़ जी थमता ।।
जलहार=जल वाहक
जलकेश=सेंवार घास
जलवाह=बादल
जलारूह = कमल
जलथान =जलस्थान
जलमूर्ति = शंकर
जगदादि = ब्रह्मा
जलशायि = विष्णु
जड़ =अचेतन , चेष्टाहीन, मूर्ख
जी = चित्त मन दम संकल्प
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कुंडलियाँ
पानी जैसा धन बहा, मरते डूब कपूत ।
हुई कहावत बेतुकी, और आग मत मूत ।
और आग मत मूत, हिदायत गाँठ बाँध इक ।
बदल कहावत आज, खर्च पानी धन माफिक ।
कह रविकर कविराय, सिखाई दादी नानी ।
बन जा पानीदार, सुरक्षित रखना पानी ।।
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विधाता (शुद्धगा) छंद. (यगण + गुरु)x 4
घमंडी का सदा नीचा हुआ है सर सभी जानें । अकारथ ही बहा पानी हमारे घर गुशल-खाने । संभालो अब अगर अब भी हिदायत यह नहीं माने । मरोगे सब करोगे क्या अगर वर्षा उलट ठाने । |
विष्णुपद छंद
(अभ्यास किया है )
द्वि-चरणों के चिन्ह, पादोदक, भक्त हटे पा के ।
प्रतियोगिता भिन्न, मनमोहक, चित्र छापा ला के ।
आदरणीय नमन, महोत्सव, कहाँ छुपे जा के ।
आभारी रविकर, विष्णुपद, सिखा गए आ के ।।
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कुंडलियाँ
पावन पादोदक पियो, प्रभु पदचिन्ह प्रभाव ।
प्रथम-पहर प्रचरण प्रचय, पावो प्रग्य सुभाव ।
पावो प्रग्य सुभाव, पारदर्शी दस गोले ।
आयत हैं द्विदेह, गंगधर बोले भोले ।
परजा शील उपाय, ज्ञान सह दशबल वंदन ।
दान वीर्य बल ध्यान, क्षमा प्राणिधि पी पावन ।।
प्रचरण=विचरण
द्विदेह=गणेश
सवैया-
सूखत स्रोत सरोवर नित्य, सहे मन-मीन महा बाधा ।
पैर पखारन हेतु मंगावत, भक्त पखाल भरा आधा ।
बर्तन एक मंगाय भरा, इक यग्य बड़ा रविकर नाधा ।
साइत आकर ठाढ़ भई पद चिन्ह बनाय गए पाधा ।।
पखाल=मसक
पाधा=उपाध्याय
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