Friday, 8 March 2013

नारीवादी किन्तु, विष्णु पर हैं भन्नाए-


NAVIN C. CHATURVEDI 
विष्णु-प्रिया पद चापती, है लक्ष्मी साक्षात |
उधर कालिका दाबती, रख कर शिव पर लात |

रख कर शिव पर लात, रूप दोनों ही भाये |
नारीवादी किन्तु, विष्णु पर हैं भन्नाए |


शिव के सिर पर गंग, उधर कैकेयी की हद |
इत लक्ष्मी को मिला, प्यार से विष्णु-प्रिया पद ||



  पी.सी.गोदियाल "परचेत" 

 अंधड़ !
हदे पार करते रहे, जब तब दुष्टाबादि |
*अहक पूरते अहर्निश, अहमी अहमक आदि |

अहमी अहमक आदि, आह आदंश अमानत |
करें नारि-अपमान, इन्हें हैं लाखों लानत |

बहन-बेटियां माय, सुरक्षित प्रभुवर करदे |
नाकारा कानून  व्यवस्था व्यर्थ ओहदे ||

*इच्छा / मर्जी

"महिला दिवस" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)


डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) 



गोया गैया गोपियाँ, गोरखधंधा गोप |
बन्धन में वे बाँध के,  मन की मर्जी थोप | 

मन की मर्जी थोप, नारि को हरदम लूटा |
कर इनको आजाद, अन्यथा तोड़े खूंटा |

वही काटते आज, जमाने ने जो बोया |
रहें कुंवारे पुरुष, अश्रु से नयन भिगोया ||




 " जीवन की आपाधापी "

 नारि-सशक्तिकरण में, जगह जगह खुरपेंच |
राम गए मृग छाल हित, लक्ष्मण रेखा खेंच |

 

लक्ष्मण रेखा खेंच, नीच रावण है ताके |
साम दाम भय भेद, प्रताणित करे बुलाके |

 

अक्षम है कानून, पुलिस अपनों से हारी |
नारि नहीं महफूज, लूटते रहे *अनारी ||

 nayee udaan
हारा कुल अस्तित्व ही, जीता छद्म विचार |
वैदेही तक देह कुल, होती रही शिकार |


होती रही शिकार, प्रपंची पुरुष विकारी |
चले चाल छल दम्भ, मकड़ जाले में नारी |


सहनशीलता त्याग, पढाये पुरुष पहारा |
ठगे नारि को रोज, झूठ का लिए सहारा ||

सकते में हैं जिंदगी, माँ - बहनों की आज |
सकते में हैं जिंदगी, माँ - बहनों की आज |

प्रश्न चिन्ह सम्बन्ध पर, आय नारि को लाज |



आय नारि को लाज, लाज लुट रही सड़क पर |

दब जाए आवाज, वहीँ पर जाती है मर |



कहीं नहीं महफूज, दुष्ट मिल जाँय बहकते |

बने सुर्खियाँ न्यूज, नहीं कुछ भी कर सकते ||

नि:संदेह देह देह ही है देह भी नहीं नि:संदेह (कविता विशेष)


अविनाश वाचस्पति 

कहता जिन्हें विदेह युग, उनकी भी थी देह |
काली कुबड़ी देह धर, करता वह भी नेह |


करता वह भी नेह, नहीं संदेह जरा भी  |
देहाती की देह, देहली भरा पड़ा जी |


तरह तरह के वाद, तभी तो  मानव सहता ||
मानो अब देहात्म, वाद यह नुक्कड़ कहता |

निष्फल करना कठिन, दुर्जनों के मनसूबे 
-बेसुरम्

 मन सूबे से स्वार्थ से, जुड़े धर्म से सोच ।
गर्व करें निज वंश पर, रहा अन्य को नोंच ।

रहा अन्य को नोंच, बढ़ी जाती कट्टरता ।
जिनकी सोच उदार, मूल्य वह भारी भरता ।

 भारी पड़ते दुष्ट, आज सज्जन मन ऊबे ।
निष्फल करना कठिन,  दुर्जनों के मनसूबे ॥ 
 

 सोने पे सुहागा  

औरत रत निज कर्म में, मिला सफलता मन्त्र ।  
सेहत से हत भाग्य पर, नरम सुरक्षा तंत्र । 

नरम सुरक्षा तंत्र, जरायम बढ़ते जाते । 
करता हवश शिकार, नहीं कामुक घबराते । 

जिन्सी ताल्लुकात, तरक्की करता भारत । 
शादी बिन बारात, बिचारी अब भी औरत ॥


Thursday, 7 March 2013

दिलचस्प बहस डॉ अयाज अहमद और श्री प्रवीन शाह




प्रवीण शाह 

आला आशिक आस्तिक,  आत्मिक आद्योपांत ।
आत्म-विस्मरित आत्म-रति, रहे हमेशा शांत ।

रहे हमेशा शांत, ईष्ट से लौ लग जाए ।
उधर नास्तिक देह, स्वयं को केवल भाये ।

कहते मिथ्या मोक्ष, नकारे खुदा, शिवाला ।
भटके बिन आलम्ब, जला के प्रेम-पुआला ॥ 
आत्म-विस्मरित=अपना ध्यान ना रखने वाला 
आत्मरत नहीं बल्कि 
आत्म-रति=ब्रह्मज्ञान 

अबला-गुहार !

पी.सी.गोदियाल "परचेत" 
 अंधड़ !
हदे पार करते रहे, जब तब दुष्टाबादि |
*अहक पूरते अहर्निश, अहमी अहमक आदि |
अहमी अहमक आदि, आह आदंश अमानत |
करें नारि-अपमान, इन्हें हैं लाखों लानत |
बहन-बेटियां माय, सुरक्षित प्रभुवर करदे |
नाकारा कानून  व्यवस्था व्यर्थ ओहदे ||

*इच्छा / मर्जी
सकते में हैं जिंदगी, माँ - बहनों की आज |
सकते में हैं जिंदगी, माँ - बहनों की आज |
प्रश्न चिन्ह सम्बन्ध पर, आय नारि को लाज |

आय नारि को लाज, लाज लुट रही सड़क पर |
दब जाए आवाज, वहीँ पर जाती है मर |

कहीं नहीं महफूज, दुष्ट मिल जाँय बहकते |
बने सुर्खियाँ न्यूज, नहीं कुछ भी कर सकते ||

"महिला दिवस" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) 
गोया गैया गोपियाँ, गोरखधंधा गोप |
बन्धन में वे बाँध के,  मन की मर्जी थोप | 


मन की मर्जी थोप, नारि को हरदम लूटा |
कर इनको आजाद, अन्यथा तोड़े खूंटा |


वही काटते आज, जमाने ने जो बोया |
रहें कुंवारे पुरुष, अश्रु से नयन भिगोया ||

निष्फल करना कठिन, दुर्जनों के मनसूबे 
-बेसुरम्
 मन सूबे से स्वार्थ से, जुड़े धर्म से सोच ।
गर्व करें निज वंश पर, रहा अन्य को नोंच ।

रहा अन्य को नोंच, बढ़ी जाती कट्टरता ।
जिनकी सोच उदार, मूल्य वह भारी भरता ।

 भारी पड़ते दुष्ट, आज सज्जन मन ऊबे ।
निष्फल करना कठिन,  दुर्जनों के मनसूबे ॥ 
 

बीजेपी -बड़ी जालिम पार्टी

डॉ शिखा कौशिक ''नूतन '' 
 नेता जी क्या कहते हैं ?
दादी दिल दिखता दुखित, द्रवित दिव्यतम तेज ।
देख पार्टी की दशा, रही लानतें भेज ।

रही लानतें भेज, किया था प्राण निछावर ।
सत्ता लोलुप लोग, चाहते केवल पावर ।

कल बेटा कुर्बान, टले पोते की शादी ।
लगा वंश पर दाँव, दुखी हो जाए दादी ॥

 " जीवन की आपाधापी "
नारि-सशक्तिकरण में, जगह जगह खुरपेंच |
राम गए मृग छाल हित, लक्ष्मण रेखा खेंच |


लक्ष्मण रेखा खेंच, नीच रावण है ताके |
साम दाम भय भेद, प्रताणित करे बुलाके |


अक्षम है कानून, पुलिस अपनों से हारी |
नारि नहीं महफूज, लूटते रहे *अनारी ||

कल बेटा कुर्बान, टले पोते की शादी -


सकते में हैं जिंदगी, माँ - बहनों की आज |


सकते में हैं जिंदगी, माँ - बहनों की आज |
प्रश्न चिन्ह सम्बन्ध पर, आय नारि को लाज |

आय नारि को लाज, लाज लुट रही सड़क पर |
दब जाए आवाज, वहीँ पर जाती है मर |

कहीं नहीं महफूज, दुष्ट मिल जाँय बहकते |
बने सुर्खियाँ न्यूज,  नहीं कुछ भी कर सकते ||

दादी दिल दिखता दुखित, द्रवित दिव्यतम तेज ।
देख पार्टी की दशा, रही लानतें भेज ।

रही लानतें भेज, किया था प्राण निछावर ।
सत्ता लोलुप लोग, चाहते केवल पावर ।

कल बेटा कुर्बान, टले पोते की शादी ।
लगा वंश पर दाँव, दुखी हो जाए दादी ॥

क्यूँ नेहरू की रेस, मिटाए बबलू देता-
आमोदी दादी दुखी, जा दोजख में देश |

पोते को लेता फँसा, पी एम् पद की रेस |



पी एम् पद की रेस, मरे क्या सारे नेता  |

क्यूँ नेहरू की रेस, मिटाए बबलू देता  |



रे पोते नादान, खिलाया तुझको गोदी |

झटपट करले व्याह, छोड़ मोदी आमोदी | 

मर्यादा पुरुषोत्तम राम की सगी बहन : भगवती शांता -12

सर्ग-3

भाग-1 ब
एक दिवस की बात है, बैठ धूप सब खाँय |

घटना बारह बरस की, सौजा रही सुनाय ||


 सौजा दालिम से कहे, वह आतंकी बाघ |

बारह मारे पूस में, पांच मनुज को माघ ||

सेनापति ने रात में, चारा रखा लगाय |

पास ग्राम से किन्तु वह, गया वृद्ध को खाय ||

 " प्राञ्जल की 14वीं वर्षगाँठ" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')


प्रिय प्राञ्जल आशीष है, कल था नेट से दूर |
छिन्नमस्तिके मातु से, मिले प्यार भरपूर |


मिले प्यार भरपूर, शक्तिपीठों में आये |
बावन हैं यह पीठ, सती ने स्वयं बनाए |


यश फैले चहुँओर, होय मंगल ही मंगल |
बाढ़े बुद्धि विवेक, स्वास्थ्य उत्तम प्रिय प्राञ्जल |

दीमक बिच्छू साँप से, पाला पड़ता जाय-

 दीमक बिच्छू साँप से, पाला पड़ता जाय । 

पाला इस गणतंत्र ने, पाला आम नशाय । 

 

पाला आम नशाय, पालता ख़ास सँपोला । 

भानुमती ने पुन:, पिटारा कुनबा खोला । 

 

पालागन सरकार, बनाओ रविकर अहमक । 

निगलो भारत देश,  मौज में रानी दीमक ।।
पाला पड़ना= मुहावरा
पाला= पालना / जल की बूंदे जो सर्दियों में (आम ) फसल बर्बाद कर देती है /
पालागन = प्रणाम

निष्फल करना कठिन, दुर्जनों के मनसूबे -

मन सूबे से स्वार्थ से, जुड़े धर्म से सोच । 
गर्व करें निज वंश पर, रहा अन्य को नोंच । 
रहा अन्य को नोंच, बढ़ी जाती कट्टरता । 
जिनकी सोच उदार, मूल्य वह भारी भरता ।
 भारी पड़ते दुष्ट, आज सज्जन मन ऊबे । 
निष्फल करना कठिन,  दुर्जनों के मनसूबे ॥ 


Wednesday, 6 March 2013

आमोदी दादी दुखी, जा दोजख में देश-



क्यूँ नेहरू की रेस, मिटाए बबलू देता-
आमोदी दादी दुखी, जा दोजख में देश |
पोते को लेता फँसा, पी एम् पद की रेस |

पी एम् पद की रेस, मरे क्या सारे नेता  |
क्यूँ नेहरू की रेस, मिटाए बबलू देता  |

रे पोते नादान, खिलाया तुझको गोदी |
झटपट करले व्याह, छोड़ मोदी आमोदी | 

मर्यादा पुरुषोत्तम राम की सगी बहन : भगवती शांता -12

सर्ग-3

भाग-1 ब
एक दिवस की बात है, बैठ धूप सब खाँय |

घटना बारह बरस की, सौजा रही सुनाय ||


 सौजा दालिम से कहे, वह आतंकी बाघ |

बारह मारे पूस में, पांच मनुज को माघ ||

सेनापति ने रात में, चारा रखा लगाय |

पास ग्राम से किन्तु वह, गया वृद्ध को खाय ||



 " प्राञ्जल की 14वीं वर्षगाँठ" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')


प्रिय प्राञ्जल आशीष है, कल था नेट से दूर |
छिन्नमस्तिके मातु से, मिले प्यार भरपूर |


मिले प्यार भरपूर, शक्तिपीठों में आये |
बावन हैं यह पीठ, सती ने स्वयं बनाए |


यश फैले चहुँओर, होय मंगल ही मंगल |
बाढ़े बुद्धि विवेक, स्वास्थ्य उत्तम प्रिय प्राञ्जल |


DR. ANWER JAMAL 


हरकत यह अच्छी नहीं, छोड़ सिपहसालार |

करे हवाले मौत के, होवें साथी पार |



होवें साथी पार, लड़ाई आर-पार की |

वर्दी को धिक्कार, जिंदगी ले उधार की -



होकर के सस्पेंड, दुबारा होगी शिरकत |

लेकिन अफसर अन्य, सहे ना इनकी हरकत ||


निष्फल करना कठिन, दुर्जनों के मनसूबे -

मन सूबे से स्वार्थ से, जुड़े धर्म से सोच । 
गर्व करें निज वंश पर, रहा अन्य को नोंच । 

रहा अन्य को नोंच, बढ़ी जाती कट्टरता । 
जिनकी सोच उदार, मूल्य वह भारी भरता । 

 भारी पड़ते दुष्ट, आज सज्जन मन ऊबे । 
निष्फल करना कठिन,  दुर्जनों के मनसूबे ॥ 


रविकर ताक अभेद, मिलें द्वय जुड़े चिरन्तन-


DR. ANWER JAMAL 

हरकत यह अच्छी नहीं, छोड़ सिपहसालार |
करे हवाले मौत के, होवें साथी पार |

होवें साथी पार, लड़ाई आर-पार की |
वर्दी को धिक्कार, जिंदगी ले उधार की -

होकर के सस्पेंड, दुबारा होगी शिरकत |
लेकिन अफसर अन्य, सहे ना इनकी हरकत ||



प्रवीण शाह
 गोड़े उर्वर खेत को, काटे सज्जन वृन्द । 

इसके क्रिया-कलाप है, जमींदार मानिन्द 

जमींदार मानिन्द , सताता  रहे रियाया । 

मुजरिम देख  दबंग, सामने जा रिरियाया । 

देख काल आपात, कमांडर तनहा छोड़े । 

लेकर भागे जान, पुलिस में भरे भगोड़े  ॥


शापित सुनार
प्रतुल वशिष्ठ 
    ॥ दर्शन-प्राशन ॥

विषयी वतसादन वेश धरे विषठा भख भीषण रूप धरे ।
हतवीर्य हरे हथियाय हठात हताहत हेय कुकर्म करे । 

विषयी=कामुक  वतसादन=भेड़िया  विषठा=मल  हतवीर्य=नपुंसक 


 सुकुमारि सकारण युद्ध लड़े विषपुच्छन को बहुतै अखरे ।
मनसा कर निष्फल दुष्टन की मन सज्जन में शुभ जोश भरे । 

 विषपुच्छन =विच्छू  


अभ्युदय के जन्मदिन पर


Kailash Sharma 

खुशियाँ हो भरपूर, कीर्तिवान हो जगत में ।
हो मनोकामना-पूर्ण, प्यारे बाबा के सकल ।।

बिद्या-बुद्धि शौर्य, शारद दुर्गा भेंटती ।
संयम निष्ठा धैर्य, मात-पिता गुरु से मिले ।।

अभ्युदय खुशहाल, होय निरोगी देह पुष्ट ।
बाबा रहे सँभाल, बाबा को नित पूज रे  ।।
 

मर्यादा पुरुषोत्तम राम की सगी बहन : भगवती शांता -12

सर्ग-3
भाग-1 ब
एक दिवस की बात है, बैठ धूप सब खाँय |
घटना बारह बरस की, सौजा रही सुनाय ||
 सौजा दालिम से कहे, वह आतंकी बाघ |
बारह मारे पूस में, पांच मनुज को माघ ||
सेनापति ने रात में, चारा रखा लगाय |
पास ग्राम से किन्तु वह, गया वृद्ध को खाय ||


  Dr.J.P.Tiwari 
 pragyan-vigyan
चिंतन दर्शन सम हुआ, कविता है अभिव्यक्ति |
वैज्ञानिक अध्यात्म से, ग्रहण करें नहिं शक्ति | 


ग्रहण करें नहिं शक्ति, भेद करना ही सीखा -
करते वर्गीकरण, तर्क  कर जाते तीखा |


रविकर ताक अभेद, मिलें द्वय जुड़े चिरन्तन |
कर मानव कल्याण, धर्म से सम्यक चिंतन ||

Tuesday, 5 March 2013

हों बुजुर्ग खुशहाल, सही सेहत आजादी-




हैप्पी बर्थड़े ... अम्मा !!

शिवम् मिश्रा 


दादी को शुभकामना, कार्तिक का अंदाज |
प्यारा प्यारा पौत्र दे, गोदी रहा विराज |

गोदी रहा विराज, नाज करता दादी पर |
मिला पिता विद्वान, शुक्रिया का यह अवसर |

हों बुजुर्ग खुशहाल, सही सेहत आजादी |
रविकर करे प्रणाम, खिलाये कार्तिक दादी ||



अभ्युदय के जन्मदिन पर


Kailash Sharma 

खुशियाँ हो भरपूर, कीर्तिवान हो जगत में ।
हो मनोकामना-पूर्ण, प्यारे बाबा के सकल ।।

बिद्या-बुद्धि शौर्य, शारद दुर्गा भेंटती ।
संयम निष्ठा धैर्य, मात-पिता गुरु से मिले ।।

अभ्युदय खुशहाल, होय निरोगी देह पुष्ट ।
बाबा रहे सँभाल, बाबा को नित पूज रे  ।।

....बोझ


Saras 



पोसा जाता इत अहम्, उत एक्स्ट्रा की चाह |
अपने अपने कर्म पर, रखते युगल निगाह |


रखते युगल निगाह, घरेलू जिम्मेदारी |
मिलकर लेते बाँट, नहीं कोई आभारी |


बढती जाए आयु, बढे कुछ अधिक भरोसा |
ह्यूमर होता शून्य, अहम् दोनों ने पोसा ||



शापित सुनार
प्रतुल वशिष्ठ 
    ॥ दर्शन-प्राशन ॥

विषयी वतसादन वेश धरे विषठा भख भीषण रूप धरे ।
हतवीर्य हरे हथियाय हठात हताहत हेय कुकर्म करे । 

विषयी=कामुक  वतसादन=भेड़िया  विषठा=मल  हतवीर्य=नपुंसक 


 सुकुमारि सकारण युद्ध लड़े विषपुच्छन को बहुतै अखरे ।
मनसा कर निष्फल दुष्टन की मन सज्जन में शुभ जोश भरे । 

 विषपुच्छन =विच्छू  

प्रवीण शाह 

 गोड़े उर्वर खेत को, काटे सज्जन वृन्द । 

इसके क्रिया-कलाप है, जमींदार मानिन्द । 


जमींदार मानिन्द , सताता  रहे रियाया । 

मुजरिम देख  दबंग, सामने जा रिरियाया । 


देख काल आपात, कमांडर तनहा छोड़े । 

लेकर भागे जान, पुलिस में भरे भगोड़े  ॥

ज़िया उल हक़ सीओ की हत्या पर समाज का एक विश्लेषण


DR. ANWER JAMAL 

हरकत यह अच्छी नहीं, छोड़ सिपहसालार |
करे हवाले मौत के, होवें साथी पार |

होवें साथी पार, लड़ाई आर-पार की |
वर्दी को धिक्कार, जिंदगी ले उधार की -

होकर के सस्पेंड, दुबारा होगी शिरकत |
लेकिन अफसर अन्य, सहे ना इनकी हरकत ||

 pragyan-vigyan
चिंतन दर्शन सम हुआ, कविता है अभिव्यक्ति |
वैज्ञानिक अध्यात्म से, ग्रहण करें नहिं शक्ति | 


ग्रहण करें नहिं शक्ति, भेद करना ही सीखा -
करते वर्गीकरण, तर्क  कर जाते तीखा |


रविकर ताक अभेद, मिलें द्वय जुड़े चिरन्तन |
कर मानव कल्याण, धर्म से सम्यक चिंतन ||