ग्राहक तुम्हें मिलते रहें, हर मौत के सामान के ।
व्यापार खुब फूले फले संग्राम बर्बर ठान के।
जब जर जमीं जोरू सरीखे मंद कारक हो गये।
तब युद्ध छेड़े जाति के कुछ धर्म के कुछ आन के।
विध्वंश हो होता रहे नुकसान मत रविकर सहो।।
हथियार के सौदागरों यूँ खून तुम पीते रहो।।
आदेश दे उपदेश दे हर देश का शासक सदा।
जनता भरे सैनिक मरे परिवार भोगे आपदा।
दुल्हन नई नवजात भी करता प्रतीक्षा अनवरत्
करते रहेंगे जिन्दगी भर युद्ध की कीमत अदा।
दस लाख देकर धन्य है इस देश का शासक अहो।
हथियार के सौदागरों यूँ खून तुम पीते रहो।।