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Wednesday, 19 October 2011

आ० श्याम गुप्त की रचना से सीखी हरिगीतिका ||

 हरिगीतिका में  
कई  गलतियाँ  हैं --
क्षमा करें श्रीमन | 
फिलहाल अपने बस का नहीं है यह छंद--
 कुछ  मदद  करो  भाई 
  वीभत्स-टिप्पणीकार 
जब टिप्पणी में वो समेटे,  हर फ़साना लसलसा |
अलल-बछेड़ा का अल्लाना,  बजे  डेंगू  का  मसा |
हो  पूँछ  सीधी  भौंक  भूला,  है अलर्की की दशा |
अनुरोध करना व्यर्थ है जो, कर चुका भारी नशा ||  

अलल-बछेड़ा=अनभिग्य बालक    अलर्क=पागल कुत्ता

  भूषण-भूषित अन्ना टोपी
 मरजादा को भूल सयाना,  देश-द्रोह अनुशंसा |
इक तिनका भी नहीं उगे उत, वही जवाहर मंसा |
  भूषण-भूषित अन्ना टोपी,  की  'रविकर' परशंसा  |
बिना कसौटी कसे मान मत, कागा है या हंसा  ||

त्यौहार 

जीवन की इकरसता करती, है अवसादी वर्षा |
समयबद्ध हो जाती चर्या, फुर्सत के पल तरसा |
जोश और उत्साह  काटता,  नीरसता का फरसा |
पर्व और त्यौहार देखकर,  मन-मयूर जन हरसा | 


लोकपाल का नहीं समर्थक 

केजरी कसौटी से कसता, है सौ फीसदी खरा |
जूताबाजी  माफ़ी  पाती, नव-गाँधी रूप धरा | 
त्योहारों का पावन मेला, सबसे अनुरोध करा |
लोकपाल का नहीं समर्थक, भरसक लग उसे हरा ||
की रचना
अनुरोध है हरिगीतिका में छंद एक रचाइए।
सुंदर सरस शब्दावली में उचित भाव सजाइए।।

सोलह तथा बारह कला फिर  अंत में लधु-दीर्घ हो।
मिल जाय शुभ शुचि छंद कोई पूर्ण यह अनुरोध हो ।१।