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Thursday, 14 November 2013

रोना धोना चुल्लुओं, पाँच साल फिर होय-




चुल्लू में उल्लू बना, सुध बुध देता खोय |
रोना धोना चुल्लुओं, पाँच साल फिर होय |

पाँच साल फिर होय, खिला के टॉफ़ी-कम्पट |
चढ़ जाती फिर भाँग, मौज करते कुल-लम्पट |

कैबिनेट -सेट होय, बने फिर पी एम् गुल्लू |
रविकर कर अफ़सोस, भरे पानी इक चुल्लू ||



तू भी कर मत दान, सामने पा इक कपटी-

रविकर 

इक कप टी बिस्कुट सहित, सकता हमें खरीद |
फूड-सिक्युरिटी जब दिया, क्यूँ ना होवे ईद |

क्यूँ ना होवे ईद, हुआ मन रेगा अपना |
मिट्टी करे पलीद, विपक्षी सत्ता सपना |

हम तो सत्ता भक्त, खाय रेवड़ियां बटती |
तू भी कर मत दान, सामने पा इक कपटी |


"हो गया इन्सान बौना" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक 



कितना मनभावन रचा, अद्भुत रचनाकार |
जीव-जंतु पगडंडियां, शिखर स्रोत्र जलधार |

शिखर स्रोत्र जलधार, पार  मानव ना पावे  |
बहुत बहुत आभार, शैल वन हृदय सुहावे |

है धरती पर स्वर्ग, घूम लो चाहे जितना |
शांत होय मन व्यग्र, दृश्य मनभावन कितना ||

अंग अंग दे बेंच, देख रविकर का बूता-

रविकर 

खलियाना खलता नहीं, चमड़ी धरो उतार |
मँहगाई की मार से, बेहतर तेरी मार |

बेहतर तेरी मार, बना के पहनो जूता |
अंग अंग दे बेंच, देख रविकर का बूता |

जीना हुआ मुहाल, भला है बूचड़-खाना -
झटका अते हलाल, शुरू कर तू खलियाना ||

सृंगी जन्मकथा : भगवती शांता : मर्यादा पुरुषोत्तम राम की सगी बहन

 सर्ग-२ 

भाग-4 
सृंगी जन्मकथा

 रिस्य विविन्डक कर रहे, शोध कार्य संपन्न ।
विषय परा-विज्ञान मन, औषधि प्रजनन अन्न ।

विकट तपस्या त्याग तप, इन्द्रासन हिल जाय ।
तभी उर्वशी अप्सरा, ऋषि सम्मुख मुस्काय ।

शोध कार्य हित हो रही, स्वयं उर्वशी पेश ।
ऋषि-पत्नी रखने लगी, उसका ध्यान विशेष ।

इस अतीव सौन्दर्य पर, होते ऋषि आसक्त ।
औषधि प्रजनन शोध पर, अधिक दे रहे वक्त ।

लगे डॉक्टर हर्ष पर, फिर झूठा आरोप -


 खता लता की बता के, जता रहे हैं रोष |
सावरकर-नाटक खले, दल्ले खोते होश |

दल्ले खोते होश, बड़े झंडे के तल्ले |
मांगे सत्ता कोष, अकेले सतत निठल्ले |

जो भी करे विरोध, मजा वो ही तो चखता |
भोंके जीभ कटार, पास वो हरदम रखता ||

छड पी एम दा ख़्वाब, अरे हलवाई हरिया-

जरिया रोटी का अगर, होवे चाय दुकान |
सदा बेचिए चाय ही, कर देना मत-दान |

कर देना मत-दान, नहीं नेता बन सकता |
बैठ जलेबी छान, कहाँ तू अलबल बकता |

छड पी एम दा ख़्वाब, अरे हलवाई हरिया ||
यस पी नेता तंग, कहे है तंग नजरिया |


8 comments:

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  2. बहुत सुन्दर।
    आपका आभार रविकर जी।

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  3. बहुत सुन्दर आभार आदरणीय..

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  4. सुन्दर भावों को सजोये लिंक ,सादर

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  5. बहुत सुन्दर प्रस्तुति...!
    --
    आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा आज शनिवार (16-11-2013) को "जीवन नहीं मरा करता है" : चर्चामंच : चर्चा अंक : 1431 पर भी होगी!
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    मुहर्रम की हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  6. बढ़िया लिंक के साथ सार्थक प्रस्तुति !

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  7. सुन्दर भावों की संकलन ,

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