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Wednesday, 13 November 2013

लगे डॉक्टर हर्ष पर, फिर झूठा आरोप -


 खता लता की बता के, जता रहे हैं रोष |
सावरकर-नाटक खले, दल्ले खोते होश |

दल्ले खोते होश, बड़े झंडे के तल्ले |
मांगे सत्ता कोष, अकेले सतत निठल्ले |

जो भी करे विरोध, मजा वो ही तो चखता |
भोंके जीभ कटार, पास वो हरदम रखता ||

छड पी एम दा ख़्वाब, अरे हलवाई हरिया-

जरिया रोटी का अगर, होवे चाय दुकान |
सदा बेचिए चाय ही, कर देना मत-दान |

कर देना मत-दान, नहीं नेता बन सकता |
बैठ जलेबी छान, कहाँ तू अलबल बकता |

छड पी एम दा ख़्वाब, अरे हलवाई हरिया ||
यस पी नेता तंग, कहे है तंग नजरिया |


बाल दिवस : एक आयोजन !!

डॉ.ज्योत्स्ना शर्मा 










सुन्दर क्षणिकाएं रची, रची बसी हरमेल |
बाल दिवस कैसे मना, मना कर दिया खेल |

मना कर दिया खेल, बाल की खाल निकाले |
किटी पार्टी जाय, कार को साफ़ धुला ले |

नहीं बाल कानून, बाल बांका कर पाये |
चाचा चाची मस्त, रची सुन्दर क्षणिकाएं ||

मर्यादा का हो गया, सह-सत्ता के लोप |
लगे डॉक्टर हर्ष पर, फिर झूठा आरोप |

फिर झूठा आरोप, नहीं सह पाये दिल्ली |
लिए सहारा झूठ, उड़ाने निकली खिल्ली |

यद्यपि पिछली बार, उठा ना सके फायदा |
लिया थूक के चाट, भूलते फिर मर्यादा ||


चुका रहा वो लोन, बाप का खर्च भेज के-

बिन दहेज़ के व्याहता, पत्नी बी टेक पास |
ली थी शैक्षिक लोन पर, नहीं जॉब की आस |

नहीं जॉब की आस, पटा ली मूरख बच्चा |
होवे सफल प्रयास, मिल गया प्रेमी सच्चा |

चुका रहा वो लोन, बाप का खर्च भेज के |
गौण हुई सुख-शान्ति, शादियां बिन दहेज़ के ||



'खीझ का रिश्ता'...(संस्मरण )

स्वप्न मञ्जूषा 

बड़ा मार्मिक दृश्य यह, अंतर गया कचोट |
चोट व्यवस्था पर लगे, धत दहेज़ का खोट |

धत दहेज़ का खोट, बाप बेटी हित हारे |
करे भिखारी भेंट, मुहल्ले अपने सारे |

यह दहेज़ का दैत्य, होय दिन प्रति दिन तगड़ा |
जाय लील सुख चैन, बड़ा फैलाये जबड़ा |


10 comments:

  1. सभी सार्थक, सटीक लगी रचनाएं !

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  2. बहुत सुंदर !
    हैप्पी चिल्ड्रंस डे !

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  3. बहुत सुन्दर प्रस्तुति...!
    --
    आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल शुक्रवार (15-11-2013) को "आज के बच्चे सयाने हो गये हैं" (चर्चा मंचःअंक-1430) पर भी होगी!
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  4. मांगे सत्ता कोष, अकेले सतत निठल्ले |

    जो भी करे विरोध, मजा वो ही तो चखता |
    भोंके जीभ कटार, पास वो हरदम रखता ||

    सुन्दर

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  5. जरिया रोटी का अगर, होवे चाय दुकान |
    सदा बेचिए चाय ही, कर देना मत-दान |

    कर देना मत-दान, नहीं नेता बन सकता |
    बैठ जलेबी छान, कहाँ तू अलबल बकता |

    छड पी एम दा ख़्वाब, अरे हलवाई हरिया ||
    यस पी नेता तंग, कहे है तंग नजरिया |

    क्या बात है जमीन से उड़के ही रॉकेट आसमान में पहुंचता है .

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  6. ड़ा मार्मिक दृश्य यह, अंतर गया कचोट |
    चोट व्यवस्था पर लगे, धत दहेज़ का खोट |

    धत दहेज़ का खोट, बाप बेटी हित हारे |
    करे भिखारी भेंट, मुहल्ले अपने सारे |

    यह दहेज़ का दैत्य, होय दिन प्रति दिन तगड़ा |
    जाय लील सुख चैन, बड़ा फैलाये जबड़ा |

    बहुत सुन्दर रविकर जी मार्मिक प्रसंग में मानवीय रंग भरे हैं

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  7. सुन्दर रचनाएँ

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  8. सुंदर लिंक्स। आपकी कुंडलियां हमेशा की तरह सटीक।

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