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Sunday, 1 December 2013

गर्मी पल में सिर चढ़े, पल दो पल में सर्द-


माहिरों की राय : आसान नहीं रहता है औरतों का कामानन्द को प्राप्त होना आखिर क्यों ?

Virendra Kumar Sharma 

गोरी *गोही आदतन, द्रोही हरदम मर्द |
गर्मी पल में सिर चढ़े, पल दो पल में सर्द |

पल दो पल में सर्द, दर्द देकर था जाता |
करता था बेपर्द, रहा हर वक्त सताता |

बदली सबला रूप, खींच कर रखती डोरी |
होय श्रमिक या भूप, नचा सकती है गोरी ||
*छुपा कर रखने में सक्षम  



लेकिन बंद कपाट, दनुजता बाहर आई-
खोजा-खाजी खुन्नसी, खड़ी खुद-ब-खुद खाट |
रेशम के पैबंद से, बहुत सुधारा टाट |

बहुत सुधारा टाट, ठाठ से करे कमाई |
लेकिन बंद कपाट, दनुजता बाहर आई |

कर के नोच-खसोट, बने जब खुद से काजी |
सम्मुख आये खोट, शुरू फिर खोजा-खाजी || 

देवेन्द्र पाण्डेय 

केले सा जीवन जियो, मत बन मियां बबूल |
सामाजिक प्रतिबंध कुल, दिल से करो क़ुबूल |

दिल से करो क़ुबूल, अन्यथा खाओ सोटा  |
नहीं छानना ख़ाक, बाँध कर रखो लंगोटा |

दफ्तर कॉलेज हाट, चौक घर मेले ठेले |
रहो सदा चैतन्य, घूम मत कहीं अकेले |

हथेली में तिनका छूटने का अहसास

समय की मृत्‍यु
संतरी, पीले, भूरे, लाल रंग से 
सजा क्षितिज


यादें सुखद अतीत की, उज्जवल दिखे भविष्य |
वर्त्तमान की क्या कहें, भटके चंचल *ऋष्य |

भटके चंचल *ऋष्य, दृश्य दिखता है मारक |
थामे विशिख कराल, खड़ा सम्मुख संहारक |

यह रहस्य है गूढ़, तवज्जो इनपर ना दे |
वर्त्तमान को बूझ, याद कर कर के यादें-
*विशेष मृग 


हमने तो भोट डाल दिया आज ही 

अच्छा है यह फैसला, टाला सदन त्रिशंकु |
आप छोड़ते आप को, पैर पड़े नहीं पंकु |

पैर पड़े नहीं पंकु, हाथ का साथ निभाया |
दो बैलों का जोड़, लौट के घर को आया |

टाल खरीद फरोख्त, करो दिल्ली की रच्छा |
पाये बहुमत पूर्ण, यही तो सबसे अच्छा ||


और ये हो गयी पाँच सौंवी बकवास

सुशील कुमार जोशी 
 वासी मिले पहाड़ के, नामी डाक्टर जान |
बीमारी हमको बड़ी, झट भूलूं पहचान |

झट भूलूं पहचान, बड़ा दौड़ाया घोड़ा |
गया सूर्य इत डूब, किन्तु पहुंचा अल्मोड़ा |

इत बोलूं मैं मर्ज, उधर रविकर इक राशी |
लम्बी कविता दर्ज, इकठ्ठा दो बकवासी ||




करते उंगली लिफ्ट में, गिरती लिफ्ट धड़ाम |
ऊपर तो जा ना सके, रहा तड़पता काम |

रहा तड़पता काम, नाम की लिफ्ट कहाये |
गिर गिर के इन्सान, कमाई सकल गंवाए |

नीचे ऊपर जाय, रहे उच्छवासें भरते |
पर पाये ना चैन, नैन दो चुगली करते ||

कार्टून :-एक तहलके के सूर्यास्‍त का स्‍टिंग ऑपरेशन


हलके में मत लीजिये, हलका नहीं हमार |
हलका-इन्स्पेक्टर कहे, फोटो रखे उतार |

फोटो रखे उतार, नहीं दाढ़ी में तिनका |
तिनका बेड़ापार, खींच ले फोटो जिनका |

है यह बन्दा तेज, हाथ रह जाता मलके |
नहीं कैमरा साथ, अन्यथा मचे तहलके ||

(हल्का-फुल्का)

भैया की खो ही गईं, रंगीनियां तमाम 
कपडा झक्क सफ़ेद हैं, लेकिन मुखड़ा श्याम |


लेकिन मुखड़ा श्याम , नहीं ना  ढूंढे राधा |
काम काम पर काम, निशाना किसपर साधा |


अब कवि की नहिं खैर, बचो अखबार लिखैया |
कर नागिन से बैर, कोबरा डरता भैया -

8 comments:

  1. भैया की खो ही गईं, रंगीनियां तमाम
    कपडा झक्क सफ़ेद हैं, लेकिन मुखड़ा श्याम |

    लेकिन मुखड़ा श्याम , नहीं ना ढूंढे राधा |
    काम काम पर काम, निशाना किसपर साधा |

    अब कवि की नहिं खैर, बचो अखबार लिखैया |
    कर नागिन से बैर, कोबरा डरता भैया -
    ==================
    नई पोस्ट-: चुनाव आया...

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  2. और ये हो गयी पाँच सौंवी बकवास को स्थान दिया आभार सुंदर चर्चा सुंदर टिप्प्णियों के साथ !

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  3. धन्‍यवाद एवं शुभकामनाएं।

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  4. बहुत सुन्दर प्रस्तुति...!
    --
    आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा आज सोमवार (02-112-2013) को "कुछ तो मजबूरी होगी" (चर्चा मंचःअंक-1449)
    पर भी है!
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  5. बढ़िया लिंक ,मेरी रचना को शामिल करने के लिए आभार !

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