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Sunday, 1 December 2013

मारक धारा का कहीं, दुरुपयोग ना होय-

श्याम स्मृति....अनावश्यक व्यर्थ के समाचार व टीवी चर्चाएँ .... डा श्याम गुप्त ....

 दुर्घटना लागे भली, ये मीडिया तमाम |
ताम-झाम दिनभर करे, बाकी न्यूज हराम |

बाकी न्यूज हराम, फैसला तेजपाल का |
आशा का दुष्कर्म, धमाका अभी हाल का |

कुछ फुरसतिया विज्ञ, खा पीकर के डटना |
चर्चा में मशगूल, यही असली दुर्घटना ||

बा -मुश्किल ही पहुँच पातीं हैं औरतें काम शिखर पर (दूसरी किश्त )

Virendra Kumar Sharma 

श्वासों से सरगम बजे, गम से तो उच्छ्वास |
क्या है कामानन्द का, सजना सजनी पास |

सजना सजनी पास, बराबर चूमाचाटी |
पारस्परिक विलास, मार नहिं व्यर्थ गुलाटी |

है मैराथन रेस, आतंरिक शक्ति हुमा सो |
बाकी है कुछ काम, ठहर जा लम्बी श्वासों ||

फंदे में निर्दोष, फंसे फंदे पे झूलें-

मारक धारा का कहीं, दुरुपयोग ना होय |
हँसी ख़ुशी सह शान्ति भी, जाए नहीं बिलोय |

जाये नहीं बिलोय, कहीं षड्यन्त्रिण छूले  |
फंदे में निर्दोष, फंसे फंदे पे झूलें |

है रविकर शंकालु, तथ्य पर सोच दुबारा |
मिला बड़ा हथियार, दीखती मारक धारा ||

वो दूल्हा....

कालीपद प्रसाद 








बड़ी दुकानें हैं सजी, जा सीधे बाजार |
ढूँढे दूल्हा ना मिले, जाकर वहाँ निहार |

जाकर वहाँ निहार, हार इक मस्त खरीदें |
लख लखपति पति एक, जाग जाती उम्मीदें |

किन्तु भरी नहिं मांग, मांग के अपने माने |
जाय हार भी हार, हार से  बड़ी दुकानें ||


समय की मृत्‍यु

संतरी, पीले, भूरे, लाल रंग से 
सजा क्षितिज


यादें सुखद अतीत की, उज्जवल दिखे भविष्य |
वर्त्तमान की क्या कहें, भटके चंचल *ऋष्य |

भटके चंचल *ऋष्य, दृश्य दिखता है मारक |
थामे विशिख कराल, खड़ा सम्मुख संहारक |

यह रहस्य है गूढ़, तवज्जो इनपर ना दे |
वर्त्तमान को बूझ, याद कर कर के यादें-
*विशेष मृग 
पाये कटक कमान तो, ताने विशिख कराल |
भूले लेवी अपहरण, भूले नक्सल चाल |
भूले नक्सल चाल, बंद हो जाये हमला |
फिर गांधी मैदान, बनेगा नहीं कर्बला |
करिये पुनर्विचार, पुलिस नित मुंह की खाये  |
रविकर आखिर कौन, रखे गद्दार छुपाये ||

बंदर बालक एक समान !!

anamika singh 

अपने में मशगूल हैं, धमा-चौकड़ी जंग |
इक बगिया के फूल हैं, भिन्न भिन्न हैं रंग |

भिन्न भिन्न हैं रंग, निराला रंग-ढंग है |
देते हैं आनंद, किन्तु क्यूँ मातु तंग है |

दुनिया करती ढोंग, दिखाए दिन में सपने |
पर निश्छल व्यवहार, देख पुत्रों में अपने | 

6 comments:

  1. बहुत सुन्दर लिंक रविकर जी !
    नई पोस्ट वो दूल्हा....

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  2. कलिकाल के लिए मन्त्र है -हरे रामा हरे रामा रामा रामा हरे हरे ,हरे कृष्णा हरे कृष्णा कृष्णा कृष्णा हरे हरे। फिलवक्त प्रकृति और पुरुष का परस्पर संपर्क टूटा हुआ है काम क्रोध लोभ मद की चलती है प्रकृति नटी पिसती सिसकती है। एक सूक्ष्म परिवरतन की टोह लेती चलती है आपकी यह पोस्ट।

    हथेली में तिनका छूटने का अहसास

    समय की मृत्‍यु

    संतरी, पीले, भूरे, लाल रंग से
    सजा क्षितिज


    यादें सुखद अतीत की, उज्जवल दिखे भविष्य |
    वर्त्तमान की क्या कहें, भटके चंचल *ऋष्य |

    भटके चंचल *ऋष्य, दृश्य दिखता है मारक |
    थामे विशिख कराल, खड़ा सम्मुख संहारक |

    यह रहस्य है गूढ़, तवज्जो इनपर ना दे |
    वर्त्तमान को बूझ, याद कर कर के यादें-

    बढ़िया टोह ली है आपने इस पोस्ट की आत्मा की।

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  3. एक और सुंदर चर्चा बेहतरीन टिप्पणियों से आच्छादित !

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  4. आपकी इस उत्कृष्ट रचना की चर्चा कल मंगलवार ३ /१२ /१३ को चर्चामंच पर राजेश कुमारी द्वारा की जायेगी आपका वहाँ हार्दिक स्वागत है

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  5. सुन्दर सुन्दर लिंक हैं धूम धडाका धूम,
    कुण्डलिया रविकर की,झूम झूम कर झूम |
    झूम झूम कर झूम, कहीं है दूल्हा,दुलहन,
    सजना सजनी साथ काम क्यों करे न नर्तन |
    धमा चौकड़ी खूब करें बालक औ बन्दर ,
    श्याम' कुंडली रविकर की ये सुन्दर सुन्दर ||

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  6. सुन्दर सूत्र संयोजन आदरणीय और आपकी कुण्डलियाँ .. बहुत खूब .

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