Friday, 25 August 2017

संगीत से इलाज-

सुना दो राग दरबारी हृदय आघात टल जाये।
अनिद्रा दूर हो जाए अगर तू भैरवी गाये।
हुआ सिरदर्द कुछ ज्यादा सुना दो राग भैरव तुम
मगर अवसाद में तो राग मधुवंती बहुत भाये।

विहागी राग गा लेना अगर वैराग्य आये तो।
अजी मल्हार गा लेना गरम ऋतु जो सताये तो।
जलाया राग दीपक से दिया संगीत कारों ने।
चलो शिवरंजनी गाओ अगर विद्या भुलाये तो।

ललित से अस्थमा थमता पुराने गीत कुछ गाओ।
हुआ कमजोर तन तो राग जयवंती सुना जाओ।
बढ़े एसीडिटी जब भी खमाजी राग भाता है
करें संगीत भी उपचार प्रिय नजदीक तो आओ।।

जंगली पॉलिटिक्स

सरासर झूठ सुन उसका उसे कौआ नहीं काटा।
चपाती बिल्लियों को चंट बंदर ठीक से बाँटा।

परस्पर लोमड़ी बगुला निभाते मेजबानी जब।
घड़े में खीर यह खाया उधर वह थाल भी चाटा।

युगों से साथ गेंहूँ के सदा पिसता रहा जो घुन 
बनाया दोस्त चावल को नहीं जिसका बने आटा।।

मरा हीरा कटा मोती किसानों की बिकी खेती
खिला पीजा खिला बर्गर भरे फिर कार फर्राटा।

कभी खरगोश कछुवे को नहीं कमजोर समझा था
करा के मैच फिक्सिंग वो करेगा पूर्ण फिर घाटा।।

कुएं तक सिंह तो आया मगर झांका नही अन्दर
बुला खरगोश को रविकर अकेले में बहुत डाटा।।

Tuesday, 22 August 2017

चले यह जिंदगी लेकर हमेशा शाम तक रिश्ते-

कहीं बेनाम हैं रिश्ते, कहीं बस नाम के रिश्ते।
चतुर मानुष बनाते हैं हमेशा काम से रिश्ते।

मुहब्बत मुफ्त में मिलती सदा माँ बाप से लेकिन
लगाये दाम की पर्ची धरे गोदाम में रिश्ते।

शुरू विश्वास से होते समय करता इन्हे पक्का
अगर धोखा दिया इनको गये फिर काम से रिश्ते।।

रहो चुपचाप गलती पर, बहस बिल्कुल नही करना
खतम नाराजगी हो तो चले आराम से रिश्ते।।

बड़ा भारी लगे मतलब, निकलते ही किया हलका
कई मन के रहे थे जो बचे दो ग्राम के रिश्ते।

कभी भी जिंदगी के साथ रिश्ते चल नही पाते
चले यह जिंदगी लेकर हमेशा शाम तक रिश्ते।।

पड़ी हैं स्वार्थ में दुनिया नहीं वे याद करते हैं
पड़े जब काम तो भेजें इधर पैग़ाम वे रिश्ते।।

रवैया मूढ़ता उनकी अहम् उनका पड़े भारी
नहीं वे रख सके रविकर हमेशा थाम के रिश्ते।।

Sunday, 13 August 2017

हथियार के सौदागरों यूँ खून तुम पीते रहो।

ग्राहक तुम्हें मिलते रहें, हर मौत के सामान के ।
व्यापार खुब फूले फले संग्राम बर्बर ठान के।
जब जर जमीं जोरू सरीखे मंद कारक हो गये।
तब युद्ध छेड़े जाति के कुछ धर्म के कुछ आन के।
विध्वंश हो होता रहे नुकसान मत रविकर सहो।।
हथियार के सौदागरों यूँ खून तुम पीते रहो।।

आदेश दे उपदेश दे हर देश का शासक सदा।
जनता भरे सैनिक मरे परिवार भोगे आपदा।
दुल्हन नई नवजात भी करता प्रतीक्षा अनवरत्
करते रहेंगे जिन्दगी भर युद्ध की कीमत अदा।
दस लाख देकर धन्य है इस देश का शासक अहो।
हथियार के सौदागरों यूँ खून तुम पीते रहो।।

प्रतीक्षा हो रही लम्बी, भुलाओ मत चले आओ-

अजी अब देर क्यों करते, चले आओ चले आओ।
प्रतीक्षा हो रही लम्बी, भुलाओ मत चले आओ।।

यहाँ तू शर्तिया आये,खबर सुन मौत की मेरी।
दुखी जब सब सुजन मेरे, सुनें वे सांत्वना तेरी।
नहीं मैं सुन सकूँगा तब, अभी आके सुना जाओ।
अजी अब देर क्यों करते, चले आओ चले आओ।

करोगे माफ मरने पर, हमारे पाप तुम सारे ।
करोगे कद्र भी मेरी, पड़ा निर्जीव जब द्वारे।
नहीं मैं देख पाऊँगा, यही तुम आज दिखलाओ।
अजी अब देर क्यों करते, चले आओ चले आओ।

अभी कुछ व्यस्त ज्यादा हो, तुम्हें फुरसत नहीं मिलती ।
कहोगे व्यक्ति उम्दा था, मगर तब देह ना हिलती।
घरी भर साथ बैठो तुम, नही यूँ आज इतराओ।
अजी अब देर क्यों करते, चले आओ चले आओ।

Saturday, 1 July 2017

रविकर के दोहे


जब गठिया पीड़ित पिता, जाते औषधि हेतु।
डॉगी को टहला रहा, तब सुत गाँधी सेतु।।

यदि दुख निन्दा अन्न सुख, पचे न अपने-आप।
बढ़े निराशा शत्रुता, क्रमश: चर्बी पाप ।।

अपनी गलती पर बने, रविकर अगर वकील।
जज बन के खारिज़ करे, पत्नी सभी दलील।।

प्रीति-पीर पर्वत सरिस, हिमनद सा नासूर।
रविकर की संजीवनी, रही दूर से घूर।।

जीवन-नौका तैरती, भव-सागर विस्तार।
लोभ-मोह सम द्वीप दस, रोक रहे पतवार।।

किया बुढ़ापे के लिए, जो लाठी तैयार।
मौका पाते ही गयी, वो तो सागर पार।

रविकर पल्ला झाड़ दे, देख दीन मेह`मान।
लेकिन पल्ला खोल दे, यदि आये धनवान।

वैसे तो टेढ़े चलें, कलम शराबी सर्प।
पर घर में सीधे घुसें, छोड़ नशा विष दर्प।।

Wednesday, 28 June 2017

नारी कटा के चोटियाँ तब चोटियाँ चढ़कर दिखाये।


पुचकारते पापा मगर भाई लताड़े मर्द ताड़े।
आँखे तरेरे पुत्र भी तो आ रहा पति दम्भ आड़े।
जब पैर की जूती कहे जग अक्ल चोटी में बताये।
नारी कटा के चोटियाँ तब चोटियाँ चढ़कर दिखाये।।